मर्दों की आज़ादी में औरत की देह भी शामिल है क्या?
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ये अपनी औरतों को ढँक कर रखते हैं और हमारी औरतों को ताड़ते हैं- बहुत साल पहले एक दोस्त ने कहा था और मैंने मासूमियत से पूछा था “कौन हैं तुम्हारी औरतें? कभी मिलवाओ!” सब हँस पड़े। बात हँसी की नहीं थी। लड़ाई की थी। जो हुई। तुम भी उनकी औरतों को ताड़ना चाहते हो, या अपनी औरतों को भी बुर्क़ा पहनाना चाहते हो? उसने कहा तुम समझ नहीं रहीं।
कैसे समझूँ?
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आप समझ सकते हैं उस अधिकार भाव को जो एक आदमी के अंदर होता है जिसके चलते वह किसी महिला का नक़ाब खींच दे? किसी की छाती पर हाथ मरकर भाग जाए? किसी का दुपट्टा नोचकर फरार हो जाए?
नौकरी का लेटर पकड़ाते-पकड़ाते नीतीश कुमार ने एक महिला का हँसते-हँसते नक़ाब नोच दिया। उनके पीछे खड़े मंगल पांडे को यह देखकर हँसते हुए किसी ने देखा।
हँसते-हँसते ही उत्तर प्रदेश के मंत्री संजय निषाद ने कहा कल “हे,हे,हे...वो भी तो आदमी हैं न, पीछे नहीं पड़ जाना चाहिए, छू दिया नकाब तो इतना हो गया, कहीं और छू दिया होता तब क्या हो जाता!” फिर माइक वाला पत्रकार और महोदय दोनों हँस रहे हैं और मेरे दिमाग़ में गूँज रहा है “कहीं और छू दिया होता तो, तब क्या हो जाता! ही,ही,ही।”
पलट कर महिला ने मुख्यमंत्री को चांटा मार दिया होता तब? तब भी हँसी आती?
हँसते-हँसते ही एक आदमी दूसरे आदमी को चुटकुला सुना रहा है-
--------------------------------------------एक बंदा अपनी बीवी फेंकने पहाड़ पर जा रहा था, दोस्त बोला मेरी भी ले जा, तो दोस्त ने कहा, बुरा न माने तो तेरी वाली को वापस आते हुए फेंक दूँ? ही, ही, ही। बीवी मायके जाए तो इन्हें ‘बैचलर अगेन’ होना है लेकिन चरित्र हमेशा औरत का ख़राब रहेगा। ही, ही,ही। बुर्क़ा क्यों कहते हैं...ही,ही,ही...
राखी सावंत पर लोगों को अक्सर हँसते हुए देखा। उसी राखी सावंत ने कह दिया –“नक़ाब खेंचना बुरा नहीं? मैं आपकी धोती खींच लूँ तो?”
अभी कुछ दिन पहले ही शेयर किया था एक जज का पुराना फ़ैसला “स्तन पकड़ना, नाड़ा खोलना, रेप की कोशिश नहीं है।” मेरे यहाँ ही किसी ने कॉमेंट किया था- इन जज साहब की पब्लिकली पैंट उतार लें तो?
एक संत (?) कह रहा था - बीवी तो मनोरंजन का खिलौना होती है। ख़ुद ही हँस रहा है अपनी बात पर। सामने बैठी जनता भी।
एक शास्त्री कह रहा है- ख़ाली प्लॉट है औरत बिना सिंदूर। ख़ुद ही हँस रहा है। सामने बैठी जनता हँस रही है। उसके आस्थावान दर्शक टीवी पर देखकर हँस रहे हैं।
मैं इस ब्रह्मांड में एक पैशाचिक हँसी को बार-बार सुन रही हूँ
--------------------------------------------जो द्रौपदी का वस्त्रहरण देखकर ख़ुश होती है। एक सभा और सभा में ठहाके। ऐसी औरत के साथ ऐसा ही होना चाहिए। भीड़ है तमाम लोगों की इस दुनिया में जो महिलाओं के रेप, हत्या, उत्पीड़न को किसी भी तरह जस्टीफाई करते हैं।
यह सब कोई अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं। यह एक ही मानसिकता के अलग-अलग दृश्य हैं जहाँ मर्द की आज़ादी हँसते-हँसते औरत के शरीर पर दर्ज की जाती है। जहाँ नक़ाब खींचना शरारत है, छू लेना भूल है, और पलटकर सवाल करना बदतमीज़ी। जहाँ सत्ता हँसती है, भीड़ हँसती है, और औरत की चुप्पी को सहमति मान लिया जाता है।
इस ब्रह्मांड में गूँजती वह पैशाचिक हँसी कोई मिथक नहीं है
--------------------------------------------वह हर उस ठहाके में है जो स्त्री की बेइज़्ज़ती पर फूटता है। वह हर उस चुटकुले में है जो बीवी, बहन, प्रेमिका को ‘वस्तु’ बना देता है। वह हर उस फ़ैसले में है जो औरत के शरीर को टुकड़ों में बाँटकर अपराध को छोटा कर देता है। सवाल यह नहीं है कि “कानून क्या कहता है” या “इरादा क्या था।” सवाल यह है कि हम कब तक हँसते रहेंगे? और कब तक यह हँसी ही हिंसा बनकर औरतों के कपड़े, हिम्मत और ज़िंदगी नोचती रहेगी?
औरत की उन्मुक्त हँसी को ताड़का की हँसी कहने वाले मर्दों ने लगता है अपनी
आज़ादी में औरत की देह को भी शामिल मान लिया है और जब औरत अपनी आज़ादी की बात करती है तब इन्हें हँसी आती है।
वही पैशाचिक हँसी।