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शर्मनाक..... चिकित्सा शिक्षा का लाभ प्राप्त कर रही एक विद्यार्थी #सेजल द्वारा सार्वजनिक मंच पर प्रणीत मोरे के कार्यक्रम में देहदान से प्राप्त शवों (कैडेवर) के संबंध में अशोभनीय एवं आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गईं। यह न केवल देहदाताओं और उनके परिवारों की भावनाओं को आहत करता है, बल्कि #चिकित्सा #शिक्षा की गरिमा तथा उस पवित्र परंपरा का भी अनादर है, जिसके कारण लाखों विद्यार्थियों को सीखने का अवसर मिलता है। @dadhichidehdan समिति का स्पष्ट मत है कि #देहदान केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं बल्कि समाज और #मानवता के प्रति, सर्वोच्च #सेवा एवं #समर्पण का प्रतीक है। हमारे देश में अनेक जागरुक एवं प्रतिष्ठित नागरिक #आध्यात्मिक एवं #सामाजिक जीवन से जुड़े लोग, अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ अपनी देह चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान के लिए दान करते हैं, ताकि भावी चिकित्सक बेहतर प्रशिक्षण प्राप्त कर सकें और समाज की सेवा कर सकें। हमें संतोष है कि इस विषय को समाज ने गंभीरता से लिया। सोशल मीडिया सहित विभिन्न वर्गों ने इस कृत्य की व्यापक आलोचना की और इसके प्रति अपना स्पष्ट विरोध दर्ज कराया। जनभावनाओं तथा नैतिक उत्तरदायित्व के दबाव में संबंधित विद्यार्थी को सार्वजनिक रूप से क्षमा याचना भी करनी पड़ी, जो यह दर्शाता है कि समाज देहदान जैसी महान परंपरा के सम्मान के प्रति सजग और संवेदनशील है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस प्रकरण को लेकर विभिन्न स्तरों पर गंभीर संज्ञान लिया गया है। मामले में शिकायतों एवं एफआईआर की कार्यवाही की जानकारी सामने आई है। राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) तथा महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग द्वारा भी इस विषय पर संज्ञान लेते हुए संबंधित पक्षों से जानकारी एवं स्पष्टीकरण मांगा गया है। वहीं, ऑल इंडिया मेडिकल स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AIMSA) ने भी इस प्रकार की टिप्पणियों की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि चिकित्सा शिक्षा में कैडेवर विद्यार्थियों के ‘प्रथम शिक्षक’ होते हैं और उनके प्रति सम्मान बनाए रखना प्रत्येक चिकित्सा विद्यार्थी का नैतिक एवं व्यावसायिक दायित्व है। इन सभी घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि समाज, चिकित्सा जगत एवं संस्थागत निकाय, देहदान और चिकित्सा शिक्षा की गरिमा से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। हम यह आशा करते हैं कि यह मामला केवल सेजल के क्षमा मांगने से पूरा नहीं होता। जो FIR हुई है, उसमे पूरी जांच होने के बाद कोर्ट में यह विषय जाना चाहिए और सेजल व #प्रणीत_मोरे को इसका दंड मिलना चाहिए।
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"... We obtained information from the Shri Ram Janmabhoomi Teerth Kshetra Trust. When arrangements were being set up, discussions were held to ensure a structural system with full security and no lapses. It was decided that the entire process be recorded, with joint duties assigned to bank staff and trust employees, overseen by two supervisors. Experts assured that with these measures in place, money could be properly counted and recorded. However, once media reports emerged, it was felt that an internal audit alone was insufficient, and any doubts must be resolved..."
#WATCH | Raipur, Chhattisgarh: At a press conference, Vishwa Hindu Parishad International President, Alok Kumar, says, "... We obtained information from the Shri Ram Janmabhoomi Teerth Kshetra Trust. When arrangements were being set up, discussions were held to ensure a structural system with full security and no lapses. It was decided that the entire process be recorded, with joint duties assigned to bank staff and trust employees, overseen by two supervisors. Experts assured that with these measures in place, money could be properly counted and recorded. However, once media reports emerged, it was felt that an internal audit alone was insufficient, and any doubts must be resolved..."
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#WATCH | Raipur, Chhattisgarh: At a press conference, Vishwa Hindu Parishad International President, Alok Kumar, says, "... We obtained information from the Shri Ram Janmabhoomi Teerth Kshetra Trust. When arrangements were being set up, discussions were held to ensure a structural system with full security and no lapses. It was decided that the entire process be recorded, with joint duties assigned to bank staff and trust employees, overseen by two supervisors. Experts assured that with these measures in place, money could be properly counted and recorded. However, once media reports emerged, it was felt that an internal audit alone was insufficient, and any doubts must be resolved..."
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यह अमरकंटक में पुण्य सलिला नर्मदा मा का उद्गम है। नर्मदे हर!
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प्रेस वक्तव्य: गाजियाबाद जैसी जघन्य घटनाओं पर पूर्ण विराम के साथ जिहादी मनोवृति पर भी बुलडोजर जरूरी: आलोक कुमार राज समंद, (राजस्थान), 02 जून 2026। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता श्री आलोक कुमार ने ग़ाज़ियाबाद में नाबालिग हिंदू युवक सूर्य चौहान की ईद पर कुर्बानी के नाम पर की गई निर्मम हत्या सहित हाल के वर्षों में हिंदू समाज को लक्षित कर हुई अनेक हिंसक घटनाओं पर गहरी चिंता और रोष व्यक्त करते हुए कहा है कि गाजियाबाद, दिल्ली और उदयपुर जैसी घटनाएँ किसी सामान्य आपराधिक प्रवृत्ति का परिणाम नहीं हैं, बल्कि ऐसी जिहादी कट्टरपंथी मानसिकता की अभिव्यक्ति हैं जो हिंदुओं के प्रति घृणा और हिंसक मनोवृति को दर्शाती हैं। इस मनोवृत्ति के विरुद्ध शासन, सरकारों व समाज के जिम्मेदार लोगों को मिलकर पूरी तरह से मिटाना होगा। श्री आलोक कुमार ने कहा कि 28 मई 2026 को बकरीद पर मित्र के नाते बुलाकर गाजियाबाद के खोड़ा क्षेत्र में 17 वर्षीय हिंदू युवक सूर्य चौहान की निर्मम हत्या, 4 मार्च 2026 को दिल्ली के उत्तम नगर में होली के अवसर पर तरुण की हत्या, उदयपुर में विद्यालय परिसर में छात्र देवराज पर हुए प्राणघातक हमले तथा महाराष्ट्र में उमेश कोल्हे की हत्या जैसी घटनाएँ केवल अलग-अलग अपराध नहीं हैं। इन घटनाओं में एक समान प्रवृत्ति दिखाई देती है—धार्मिक पहचान के आधार पर वैमनस्य, असहिष्णुता और हिंसा का नग्न प्रदर्शन। उन्होंने कहा कि यदि किसी युवक को केवल इसलिए मार दिया जाए कि वह हिंदू है अथवा दोस्ती के रिश्ते और विद्यालय जैसे पवित्र स्थान में बच्चों के बीच भी कट्टरता और हिंसा प्रवेश कर जाए, तो यह पूरे समाज के लिए चेतावनी का विषय है। ऐसे घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि जिहादी कट्टरपंथी सोच का विष समाज के विभिन्न स्तरों तक पहुँच रहा है। श्री आलोक कुमार ने कहा कि यह समझना होगा कि हिंसा, आतंक और जिहादी कट्टरवाद की अवधारणा का आधुनिक विश्व में कोई स्थान नहीं हो सकता। ऐसी गंभीर घटनाओं को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानना भी पर्याप्त नहीं होगा। ये विश्व शांति और सामाजिक व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा हैं। उन्होंने कहा कि जितने दोषी ऐसे जघन्य कृत्य करने वाले लोग हैं, उतने ही दोषी वे लोग भी हैं जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उन्हें वैचारिक संरक्षण प्रदान करते हैं, उनके अपराधों पर पर्दा डालते हैं या सुविधानुसार मौन धारण कर लेते हैं। समाज को यह प्रश्न पूछना चाहिए कि जब पीड़ित हिंदू समाज का व्यक्ति होता है तब तथाकथित सेक्युलर समूहों, मानवाधिकारवादियों और अनेक राजनीतिक दलों की आवाज़ क्यों बंद हो जाती है। यह चयनात्मक मौन न केवल नैतिक दिवालियापन है, बल्कि कट्टरपंथ को प्रोत्साहन देने का माध्यम भी बनता है। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि विहिप संपूर्ण समाज, सभी धार्मिक नेताओं, सामाजिक संगठनों तथा सरकारों से आग्रह करती है कि वे ऐसी हिंसक मनोवृति का स्पष्ट और निर्भीक विरोध करें। कट्टरता के प्रति किसी भी प्रकार की नरमी भविष्य में और बड़ी त्रासदियों को जन्म दे सकती है। श्री आलोक कुमार ने हिंदू समाज का भी आह्वान किया कि वह संगठित, सजग और आत्मरक्षार्थ पुरुषार्थी बने। उन्होंने कहा कि शांति और सद्भाव तभी सुरक्षित रह सकते हैं जब समाज हिंसा करने वालों के साथ-साथ उनके समर्थकों और मौन दर्शकों को भी कठघरे में खड़ा करे। राजस्थान के राजसमन्द में एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए विहिप अध्यक्ष ने राजस्थान सरकार से इसी वर्ष राज्य में समान नागरिक संहिता लागू करने तथा केंद्र सरकार से अपने पुराने प्रेसिडेंशियल आदेश में संशोधन कर अनुसूचित जन जाति के धर्मांतरित लोगों को अनुसूचित जाति के सभी अधिकारों से बंचित करने की माँग भी की। जारी कर्ता: विनोद बंसल राष्ट्रीय प्रवक्ता विश्व हिंदू परिषद
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गाजियाबाद के खोड़ा में नावालिग हिंदू युवक की जिहादियों द्वारा ईद पर कुर्बानी के नाम पर की गई नृशंस हत्या पर विहिप अध्यक्ष श्री आलोक कुमार (@AlokKumarLIVE ) जी का मैंनपुरी में दिया गया वक्तव्य...
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मनीषा (@ManishaNarain) देखते-देखते इतनी बड़ी हो गई। आज उसकी वकालत के 20 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। यह उसके लिए उपलब्धियों का समय रहा है। एक पिता के लिए यह कितने आनंद का क्षण है। मनीषा तुम्हें बहुत आशीर्वाद।
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मंदिर मुक्ति हेतु सर्वोच्च न्यायालय में पुनः शुरू होगी ऐतिहासिक सुनवाई :आलोक कुमार (@AlokKumarLIVE), सीनियर एडवोकेट, (अंतराष्ट्रीय अध्यक्ष, विश्व हिन्दू परिषद् ) भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन काल में अंग्रेज अधिकारियों के द्वारा तमिलनाडु और बंगाल में हिन्दू मंदिरों का व्यापक सर्वेक्षण हुआ था। इस सर्वेक्षण से मालुम पड़ा कि लगभग सब हिन्दू मंदिरों में छोटा या बड़ा गुरुकुल और गौ-शाला थी। समाज अपने उत्सव जैसे नवरात्री और दीपावली इत्यादि मिलकर मंदिरों में मनाता था। परिवारों के शादी, मुंडन, शोकसभा जैसे सब कार्यक्रम भी मंदिरों में होते थे। समाज के झगड़े भी मंदिर में गर्भगृह की साक्षी में समाज के वरिष्ठ लोगों द्वारा निपटाएं जाते थे। अंग्रेजों ने समझ लिया कि हिन्दू धर्म के प्राण मंदिरों में बसते हैं। अंग्रेज सरकारों ने मंदिरों का प्रबंधन सुशासन के नाम पर अपने हाथों में ले लिया। धीरे-धीरे अब मंदिर केवल व्यक्तिगत पूजा के स्थान बन रहे हैं। इससे हिन्दू धर्म कमजोर हो रहा है। सरकार गुरुद्वारे, चर्च, मस्जिद, जैन-स्थानक और बौद्ध-विहार नहीं चलाती। भारत का शासन संविधान की मर्यादा में धर्मनिरपेक्ष है। फिर भी अनेक राज्यों में सरकारें हिन्दू मंदिरों को अपने मुट्ठी में क्यों दबाये हुए हैं। मंदिरों के चढ़ावे का एक बड़ा हिस्सा सरकारी खजाने में जाता है। मंदिरों में सरकार के ऑफिसर कार्यकारी अधिकारी के नाते लगा दिए जाते है और उनका वेतन और भत्ते मंदिर की आय में से लिए जाते है। मंदिरों और मठों का नियंत्रण मठाधिपति या धार्मिक संत इत्यादि के हाथों में न रहकर इन बाबुओं के हाथ में रहता है। हिन्दू समाज ने निर्णय किया है कि वह अपने मंदिरों का नियंत्रण सरकार के हाथों से वापस लेगा। समाज ने यह भी निर्णय किया कि हिन्दू मंदिरों का पैसा हिन्दुओं के लिए ही खर्च होना चाहिए। इस उद्देश्य से पूज्य स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सन 2012 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय में याचिका डाल कर कहा कि सरकार हिन्दू मंदिरों का सञ्चालन वापिस हिन्दू समाज को सौंपें। यह याचिका मुख्य रूप से तमिलनाडु, आंध्र, तेलंगाना और पुडुचेरी के सन्दर्भ में लगायी गयी थी। इसमें सरकारों को नोटिस हुआ और उनका जवाब रिकॉर्ड पर आया। कई बार इस याचिका में बहस के लिए तारीख निश्चित हुई पर किसी न किसी कारण से टलती गयी। अंततः अप्रैल 2025 को यह मामला न्यायालय के समक्ष रखा गया। प्रतिपक्षी वकीलों ने कहा कि इस याचिका में कई राज्यों के कानूनों को चुनौती दी गयी है। यह सब कानून एक जैसे नहीं हैं। मांग की गयी कि सर्वोच्च न्यायालय इस याचिका को ख़ारिज करके याचिकाकर्ताओं को अपने-अपने राज्य में इन कानूनों को चुनौती देने की छूट दे दें। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करके 13 साल से लंबित यह याचिका ख़ारिज कर दी। याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से याचिका को ख़ारिज करने के निर्णय पर पुनर्विचार याचिका करने का आग्रह किया। इस प्रक्रिया में समय लगा। याचिका पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने सोमवार 18 मई 2026 के आदेश में यह स्वीकार किया कि इस याचिका को गुण-दोष के आधार पर सुना जाना आवश्यक है। कोर्ट ने अप्रैल 2025 के उस आदेश को वापस ले लिया जिसके द्वारा इस याचिका को ख़ारिज कर दिया गया था। अब यह विषय जुलाई में सुनवाई के लिए नियत किया गया है। हिन्दू अपने मंदिरों का स्वयं सञ्चालन करें और मंदिरों पर सरकार का नियंत्रण पूरी तरह समाप्त हो। हिन्दुओं का पैसा हिन्दुओं के काम में आये। हिन्दू मंदिर स्वाधीन होने पर हिन्दू का संगठन, उसकी तेजस्विता और संस्कार युक्त जीवन पुनः अपने समाज को प्राप्त हो। मुकदमे में तथ्य और तर्क हमारे साथ हैं। श्री भगवान के आशीर्वाद से हम न्यायालय में सफल होंगे।
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युगप्रधान आचार्य पूज्य श्री महाश्रमणजी, जैन समाज में तेरापंथ संघ के आचार्य हैं। अभी समाज के योगक्षेम के लिए, साधु साध्वियों के प्रशिक्षण के लिए एक वर्ष राजस्थान के लाडनूं विराज रहे हैं। आचार्य श्री जैन समाज के संत व्रतों का कठोरता से पालन करते हैं। भारत भर का इतना पैदल प्रवास किया है वह सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा से कहीं ज्यादा है। अपनी भारत यात्रा में आपश्री ने समाज में सद्भावना, नैतिकता और नशाबंदी का अभियान चलाया।  आप के गंभीर स्वाध्याय से अनेक पुस्तकों का जन्म हुआ है। इनमें श्रीमद्भगवद्गीता की जैन धर्म ग्रंथों के साथ व्याख्या तथा बौद्ध धर्म ग्रंथों पर टीका भी शामिल है।  हम लोगों को 12 मई को लाडनूं जा कर उनके दर्शन किए, प्रवचन सुना और निर्दोष समाज बनाने पर चर्चा की। विश्व हिंदू परिषद के लिए हमें आचार्य श्री का मार्गदर्शन और आशीर्वाद मिला।  आप श्री ने कहा की सब संगठनों में एक टीम होती है जो मिलजुल कर संस्था के बारे में विचार करके निर्णय लेती है और उनका क्रियान्वयन करती है। आचार्य श्री ने कहा कि ऐसे चिंतन में आग्रहहीन हो कर भाग लेना चाहिए। सबको आदर और अनुकूल भाव से सुन कर सहमति तक पहुंचें। अगर सहमति न बने तो बहुमत की बात को ही अपनी ही बात मान लें। चिंतन में अनेकता हो सकती है पर निर्णय और क्रियान्वयन में एकता रहनी चाहिए।  यह तो किसी भी संगठन में काम करने वाले कार्यकर्ताओं के लिए अनमोल सीख है।  तेरापंथ के 9वें आचार्य पूज्य तुलसी ने सन्यासी के महाव्रतों को सांसारिकों के लिए सहज बनाया था और सर्वसमाज की मुक्ति की राह आसान की थी। यह अणुव्रत इस प्रकार हैं, अणुव्रत का अर्थ है 'छोटा व्रत' या आंशिक व्रत (Anu = Small/Partial Vrat)। जैन धर्म में गृहस्थों (सामान्य लोगों) द्वारा पालन किए जाने वाले पांच नैतिक व्रतों को अणुव्रत कहते हैं। जिनका स्थूल रूप से (सीमित या आंशिक रूप से) त्याग है। यह व्रत हैं: 1. अहिंसा अणुव्रत। जीवों की स्थूल हिंसा, यानी जानबूझ कर की गई हिंसा का त्याग।  2. सत्य अणुव्रत। स्थूल यानी बड़ा झूठ बोलने का त्याग।  3. अचौर्य अणुव्रत। चोरी न करना, यानी दूसरे की वस्तु को अनैतिक रूप से न लेना 4. ब्रह्मचर्य अणुव्रत। पर स्त्री या पर पुरुष का त्याग कर अपने पति य पत्नी में संतोष रखना।  5. अपरिग्रह अणुव्रत। धन, संपत्ति और वस्तुओं के संग्रह को अपनी आवश्यकता के अनुसार सीमित करना। आवश्यकता का सीमाकरण।
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प्रेस वक्तव्य: नई दिल्ली - 15 मई 2026. विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता श्री आलोक कुमार ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा भोजशाला संबंधी प्रकरण में दिए गए ऐतिहासिक निर्णय का स्वागत करते हुए कहा है कि यह निर्णय भारत की सांस्कृतिक चेतना, सत्य एवं सनातन परंपरा की महत्वपूर्ण पुष्टि है। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने यह निर्णय दे दिया है कि धार की भोजशाला हिन्दू मंदिर है। न्यायालय ने कहा कि सैदव ही भोजशाला के पूजा स्थान की पद्द्ति हिन्दू मंदिर की रही है। न्यायालय के निर्णय से भोजशाला में अब निरंतर पूजा का हिन्दुओं को अधिकार मिल गया है। मुसलमानो के लिए भी यह कहा गया है कि वह सरकार से मस्जिद के लिए जगह मांग सकते है। हम यह अपेक्षा करेंगे कि भोजशाला केवल माँ वाग्देवी की पूजा का स्थान न रहे अपितु पुरातन काल की तरह संस्कृत और धर्मशास्त्रों के अध्ययन का एक वैश्विक केंद्र बने। यह काम समाज और सरकार को मिलकर करना होगा। इस स्थान की ऊर्जा से पुरे जगत में आध्यात्मिक ज्योति फैलेगी। उन्होंने कहा कि यह फैसला पूरी न्यायायिक पद्धति का पालन करके हुआ है। कोर्ट ने उस ASI को जांच करने के लिए नियुक्त किया था जो इस बारे में भारत की सबसे विशेषज्ञ संस्था है। जांच की प्रतिलिपि दोनों पक्षों को दी गयी। दोनों पक्षों को अपना मत रखने के लिए पर्याप्त समय दिया। विद्वान न्यायाधीशों ने स्वयं मौके पर जाकर उस भवन का निरिक्षण भी किया। श्री आलोक कुमार ने यह भी कहा कि इस प्रकार से एक वैज्ञानिक विशलेषण करवाने के बाद, सबको सुनकर और प्रत्यक्ष भवन को देखने के बाद यह निर्णय आया है। माननीय उच्च न्यायालय ने उपलब्ध ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्यों एवं सतत हिन्दू उपासना की परंपरा के आधार पर यह स्पष्ट रूप से माना है कि भोजशाला देवी वाग्देवी माँ सरस्वती का प्राचीन मंदिर एवं संस्कृत शिक्षा का केंद्र था। यह निर्णय केवल एक स्थल से जुड़ा विषय नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और सभ्यतागत अस्मिता से जुड़ा हुआ है। यह निर्णय संतुलित है, अच्छा है। सब लोगो को यह निर्णय स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार को लंदन के ब्रिटिश म्यूज़ियम में स्थापित माँ सरस्वती की प्रतिमा को भारत वापस लाने हेतु प्रस्तुत अभ्यावेदनों पर विचार करने संबंधी टिप्पणी का भी स्वागत किया और कहा कि यह प्रतिमा भारत की सांस्कृतिक आत्मा का प्रतीक है, जिसे उसके मूल स्थान भोजशाला में पुनः स्थापित किया जाना चाहिए। श्री आलोक कुमार ने यह भी कहा कि यह विषय किसी के हार या जीत का नहीं है। हम सभी को न्यायालयों के आदेशों एवं संवैधानिक प्रक्रियाओं का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने सभी पक्षों से शांति, सौहार्द एवं सामाजिक समरसता बनाए रखने की अपील करते हुए कहा कि यह निर्णय किसी समुदाय की पराजय नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सत्य एवं सांस्कृतिक न्याय की पुनर्स्थापना है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार एवं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इस निर्णय के अनुरूप भोजशाला मंदिर के संरक्षण, व्यवस्थापन एवं संस्कृत अध्ययन की गौरवशाली परंपरा के पुनर्जीवन हेतु शीघ्र आवश्यक कदम उठाएंगे। जारी कर्ता: विनोद बंसल राष्ट्रीय प्रवक्ता विश्व हिन्दू परिषद
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आज 10 मई को वकालत के 50 साल पूरे हुए। एक सुहाना सफर जिसमें राष्ट्रीय और सामाजिक महत्व के अनेक मुद्दों पर सहभागिता मिली। सदैव इस खेल में शतरंज का सा मजा रहा।
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संस्कारित परिवार, हिंदुत्व और गोरक्षा आज की आवश्यकता आज रायपुर के शादानी दरबार में संपन्न छत्तीसगढ़ विहिप की संतो की मार्गदर्शक मंडल की बैठक हुई। इसमें निम्न विषयों पर विचार हुआ। #हिन्दू समाज को जीवंत बनाये रखने के लिए #कुटुंब_प्रबोधन का काम करना है। प्रत्येक हिन्दू घर अपने बच्चों को संस्कार देने की व्यवस्था करें और #हिंदुत्व को हम अपने जीवन मे अपना लें। हिंदू परिवारों में #संस्कार देनें की व्यवस्था बनाना चाहिए। #गौ_माता हमारी आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र हैं अतः हर घर में पाली जाना चाहिए। प्रभावी धर्म स्वातंत्र्य विधेयक के लिए संतों ने छत्तीसगढ़ सरकार को साधुवाद दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता शदाणी दरबार के पूज्य युधिष्ठिर लाल जी महाराज ने की। केंद्रीय मार्गदर्शक मण्डल के संत परमात्मानंद जी, पूज्य सर्वेश्वर दास जी, साध्वी चन्द्रकला साहेब, गहिरा गुरु जी के पुत्र संत खीरेंद्र जी, रामनामी संप्रदाय के अ भा प्रमुख संत कोशल महाराज, क्षेत्र संगठन मंत्री जितेंद्र सिंह, क्षेत्र धर्माचार्य प्रमुख मुन्नालाल पांडे, प्रांत धर्माचार्य प्रमुख ब्रह्मचारी राकेश आचार्य, महंत राधेश्याम महाराज, प्रांत मंत्री श्री पूर्णेन्द्र सिन्हा, श्री नंदूराम साहू आदि उपस्थित रहे । @VHPDigital @BajrangDalOrg @eHinduVishwa @epanchjanya @ivskdelhi @eOrganiser
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#छत्तीसगढ़ सरकार के यशस्वी #मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय (@vishnudsai) से सौजन्य भेट मैंने #नक्सलवाद से प्रदेश को मुक्ति एवं #धर्म स्वतंत्र अधिनियम 2026 की शुभकामनाएँ दी। #वक्फ बोर्ड के संशोधनों को कठोरता से लागू #जनजातीय अधिसूचित क्षेत्र में वक्फ को समाप्त करने पर भी जोर दिया। मुख्यमंत्री जी ने #समान नागरिक संहिता (#UCC) को लागू करने के लिए #आयोग का गठन किया है जिसको जल्द ही छत्तीसगढ़ में लागू किया जायेगा । साथ में विहिप के क्षेत्र संगठन मंत्री जितेंद्र जी, प्रांत उपाध्यक्ष शीशपाल जी, प्रांत मंत्री पूर्णेंद्र सिन्हा जी, प्रांत सह मंत्री नंदू राम साहू जी की भी उपस्थिति रही। @VHPDigital @BajrangDalOrg @eHinduVishwa @ivskdelhi @epanchjanya @eOrganiser
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विश्व को शांति, करुणा और अहिंसा का संदेश देने वाले भगवान गौतम बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति (निर्वाण) और महापरिनिर्वाण (मृत्यु) की त्रिविध स्मृतियों के पवित्र पर्व बुद्ध पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं!
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Press Statement of Sh. Alok Kumar, Sr. Advocate President Vishwa Hindu Parishad on the remarks made by Justice Atul Sreedharan, Allahabad High Court in the Madarasa matter JUDICIAL RESTRAINT ESSENTIAL TO MAINTAIN INSTITUTIONAL BALANCE 1. I am surprised by reading the order dated 27.04.2026 passed by Justice Sh. Atul Sreedharan of Allahabad High Court in the case filed by Teachers Association Madaries Arabia against the National Human Rights Commission (NHRC). 2.The challenge before the High Court was to an order passed by NHRC directing the DG Economic Offences Wing (EOW), Govt. of UP to look into the allegations including of financial mis-management in Madarasas and file an action taken report (ATR). 3.The Counsel for Petitioner had requested for an adjournment as the arguing Counsel was not available. None was present for the NHRC as it was a new case and no notice has been served upon NHRC. 4.The adjournment was granted. 5.However, Justice Sh. Atul Sreedharan in the absence of the Counsel for the parties and without any arguments expressed his prima facie opinion that the Order was beyond the jurisdiction of NHRC. Be that as it may. 6.The Hon’ble Judge thereafter went on a tirade against NHRC. The Hon’ble Judge alleged that NHRC has never taken cognizance “in which members of the muslim community are attacked and at times lynched in some cases…. The Court is not aware of the NHRC taking suo-moto cognizance in situations where vigilantes take the law in their own hands and harass the ordinary citizens of the country…” 7.The remarks of the Hon’ble Judge were so out of place that Justice Sh. Vivek Saran, the other judge on the bench dissented. He expressed his disagreement and observed that he differed “from the order as has been dictated by brother Justice Atul Sreedharan”. 8.We do feel that the lynching of any person irrespective of his religion is condemnable, unlawful and punishable. We further feel that the persons who indulge in offences should face the consequences irrespective of the religion they belong to. Criminals do not belong to any religion and their acts are against the civil Society as a whole. 9.Therefore, in the present matter it is inappropriate to take a position that such things are happening against the adherents of a particular religion. The remarks are factually wrong and have a potential to create disharmony between the major communities of Bharat. 10.The restraint is all the more required from persons holding high Constitutional Offices. - Alok Kumar, Sr. Advocate & President Vishwa Hindu Parishad 29.04.2025
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Video statement of hon. Shri @AlokKumarLIVE on the same subject...
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प्रेस विज्ञप्ति संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्षा को विहिप ने भेजा पत्र; पाकिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर बढ़ते अत्याचारों व धर्मांतरण पर रोक हेतु हस्तक्षेप की मांग नई दिल्ली, 27 अप्रैल, 2026। विश्व हिंदू परिषद ने पाकिस्तान और बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर लगातार हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों पर गहरी चिंता जताते हुए संयुक्त राष्ट्र से तत्काल और प्रभावी हस्तक्षेप की मांग की है। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष सीनियर एडवोकेट श्री आलोक कुमार ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्षा सुश्री अन्नालेना बेयरबॉक को पत्र लिख कर दोनों देशों में विशेष रूप से हिंदू, सिख, बौद्ध और ईसाई समुदायों के साथ हो रहे उत्पीड़न, जबरन धर्मांतरण और हिंसा के मामलों को उजागर किया गया है। पत्र में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार तंत्र की हालिया रिपोर्टों और विशेषज्ञों की टिप्पणियों का हवाला देते हुए बताया गया है कि पाकिस्तान में नाबालिग लड़कियों के जबरन धर्मांतरण और विवाह के मामलों में चिंताजनक वृद्धि हुई है। इन मामलों में अधिकांश पीड़ित महिलाएं हिंदू और ईसाई समुदाय से संबंधित हैं। विशेष रूप से सिंध प्रांत में ऐसी घटनाएं अधिक सामने आई हैं। पीड़ितों को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। ऐसे मामलों में पाकिस्तान की कानून प्रवर्तन एजेंसियों की प्रतिक्रिया भी कई बार अपर्याप्त बताई गई है। इसी तरह, पत्र में बांग्लादेश में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं के विरुद्ध हिंसा और भेदभाव के अनेक मामलों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्टों के अनुसार, अगस्त 2024 के दौरान ही बड़ी संख्या में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाया गया। श्री आलोक कुमार ने कहा है कि इन घटनाओं की निरंतरता और व्यापकता यह संकेत देती है कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए मौजूदा व्यवस्थाएं पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय और संयुक्त राष्ट्र की जिम्मेदारी है कि वे इन गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों को रोकने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाएं। संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष सुश्री अन्नालेना बेयरबॉक की मंगलवार से नई दिल्ली की यात्रा से ठीक एक दिन पूर्व ईमेल से भेजे अपने पत्र में विहिप अध्यक्ष श्री आलोक कुमार ने निम्नलिखित मांगें प्रमुख रूप से रखी हैं: * जबरन धर्मांतरण और अल्पसंख्यकों पर हिंसा की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय जांच * पीड़ितों की सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करने के लिए विशेष तंत्र की स्थापना * संबंधित देशों से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप जवाबदेही तय करना * महिलाओं और नाबालिगों की सुरक्षा के लिए सख्त कानूनी और संस्थागत उपाय लागू करना विश्व हिंदू परिषद ने संयुक्त राष्ट्र नेतृत्व से आग्रह किया है कि वह इस मुद्दे को प्राथमिकता देते हुए ठोस कार्रवाई सुनिश्चित करे, ताकि प्रभावित समुदायों के जीवन, स्वतंत्रता, गरिमा और अधिकारों की रक्षा की जा सके। पत्र की प्रति संयुक्त राष्ट्र महासचिव के साथ भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी व विदेश मंत्री श्री एस जय शंकर को भी भेजी गई है। जारी कर्ता: विनोद बंसल राष्ट्रीय प्रवक्ता विश्व हिंदू परिषद - नई दिल्ली
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Press Release: Day ahead of UNGA president's visit to New Delhi, VHP sent letter to raise alarm for Rising Atrocities on Religious Minorities in Pakistan and Bangladesh New Delhi, April 27, 2026. Expressing deep concern over the persistent human rights violations against religious minorities in Pakistan and Bangladesh, the Vishva Hindu Parishad (VHP) has called upon the United Nations to undertake immediate and effective intervention. A day before her visit to New Delhi, Advocate Shri Alok Kumar, International President of the Vishva Hindu Parishad, today written a letter to Ms. Annalena Baerbock, President of the United Nations General Assembly, highlighting instances of persecution, forced conversions, and violence being perpetrated against religious minorities—specifically the Hindu, Sikh, Buddhist, and Christian communities—in both the countries. Citing recent reports from UN human rights mechanisms and observations by experts, the letter notes a disturbing rise in cases of forced conversions and marriages involving minor girls in Pakistan. The majority of victims in these cases belong to the Hindu and Christian communities. Such incidents have been reported with particular frequency in the Sindh province. Victims are subjected to physical, psychological, and social abuse. The response of Pakistan's law enforcement agencies to such cases has also frequently been described as inadequate. Similarly, the letter cites numerous instances of violence and discrimination against religious minorities—particularly Hindus—in Bangladesh. According to reports, a large number of incidents of communal violence targeting minority communities were recorded during August 2024 alone. In the letter, Shri Alok Kumar stated that the persistence and widespread nature of these incidents indicate that the existing mechanisms for protecting the rights of minorities are insufficient. He further underscored that it is the responsibility of the international community and the United Nations to take concrete and effective measures to halt these grave human rights violations. Alok Kumar has primarily put forward the following demands: * An independent and impartial international investigation into forced conversions and violence against minorities. * The establishment of a special mechanism to ensure the safety of victims and secure justice. * Holding the concerned nations accountable in accordance with international human rights standards. * The implementation of strict legal and institutional measures to safeguard women and minors. The Vishva Hindu Parishad has urged the United Nations leadership to prioritize this issue and ensure concrete action, so that the lives, liberty, dignity, and rights of the affected communities may be protected. Copy of the letter has also been marked to the UN Secretary General shri António Guterres, PM shri Narendra Modi and the union minister for External affairs Shri S. Jaishankar. Released by: Vinod Bansal National spokesperson Vishva Hindu Parishad New Delhi
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