सौ बात की एक बात, भगवान को पैसे की जरूरत नहीं, सरकार इस इस पैसे को रख नहीं सकती, श्रृद्धालुओं पर सारा पैसा ख़र्च हो नहीं सकता, फिर दान उतना ही क्यों न लिया जाए जितना मंदिर का खर्च है, ना फालतू होगा ना लूट होगी, जैसे सामाजिक धर्मशालाओं में होता है, जैसे मस्जिदों में होता है, जितना मस्जिद का ख़र्च होता है उतना ही हर साल मस्जिद की सीमा में आने वाले लोगों से दान लिया जाता है, ऐसा ही सामाजिक धर्मशालाओं में होता है, किसी समाज कि धर्मशाला है समाज के लोग हर साल उसके ख़र्च के हिसाब से प्रति व्यक्ति या प्रति घर से चंदा लेते हैं, छोटे गांवों, कस्बों शहरों के मंदिरों में भी ऐसा ही होता है, एक बार हिसाब लगा लें मंदिर का महिने भर का इतना खर्च है, उसी के हिसाब से उतनी ही रसीद बुक छपवा लेनी चाहिए, बस उन रसीदों से ही दान स्वीकार होना चाहिए,