Joined February 2008
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"अभी तो इस बाज की असली उड़ान बाकी है। अभी तो इस परिन्दे का इम्तिहान बाकी है। अभी अभी मैने लांघा है समन्दर को। अभी तो पूरा आसमान बाकी है।"
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उम्र के साथ मुझे ऑस्टियोआर्थराइटिस हो गया। पहले पत्नीजी और मैं साथ-साथ टहलते थे—रेलवे कॉलोनी में, और बाद में गाँव में भी। फिर मैं साइकिल पर शिफ्ट हो गया और हमारी साझा सैर छूट गई। अब एक नया प्रयोग सूझा है। मैं अपनी साइकिल का हैंडल पकड़कर पत्नीजी के साथ रोज़ पास के गाँव तक पैदल जाऊँगा। वहाँ शंकरजी के मंदिर में प्रणाम कर लौटेंगे। कुल मिलाकर लगभग डेढ़-दो हजार कदम। साइकिल लाठी या वॉकर का काम करेगी—बस थोड़ा तेज चलने वाला वॉकर। इस सैर में केवल व्यायाम नहीं होगा। रास्ते में लोगों से नमस्कार, हालचाल, आपसी बातचीत, और दिन भर के नोट्स का आदान-प्रदान भी होगा। उम्र के साथ नई सीमाएँ आती हैं, पर कभी-कभी नए प्रयोग भी। 😊 (चित्र एआई का बनाया। मुझे थोड़ा पतला और खिचड़ी बालों वाला बना दिया जबकि मेरे बाल पूरे सफेद हैं)
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बेटे की तरह है। नालायक बेटे की तरह?!
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एक हफ्ते बाद बाजार गय — सब्जी, किराना, दूध जैसे सामान के लिए। हर सामान की कीमत पर झटका लगा। कहीं जोर से कहीं थोड़ा कम। पर लगा सब कीमतों पर। युद्ध होरमुज में हो रहा है, ताप यहां लग रहा है! 🙄
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कच्छा-बनियान गिरोह! लूट वाले घर के सदस्यों की बिना पुष्ट पिटाई किए लूट न करने के लिए संकल्पित... जिस घर में पिटाई करने का अवसर नहीं मिला-वहाँ से बिना एक सुई उठाए निकल जाने वाले! पिटाई तब तक करनी आवश्यक जब तक कि पीटने वाला स्वेदस्नात न हो जाये। तदुपरांत लूट का माल पसीने की कमाई!
किसी से कुछ लेने में अपनी "वीरता" का प्रदर्शन बहुत से समूहों की सहज प्रवृत्ति प्रतीत होती है। शूलपाणेश्वर की झाड़ियों में नर्मदा परिक्रमा करने वालों से तीन दशक पहले आदिवासी बहुत कुछ छीन लेते थे। कहते हैं कि सामान लेने के बाद एक-दो थप्पड़ या लात भी उस प्रक्रिया का हिस्सा होते थे। मानो केवल लेना पर्याप्त न हो; यह भी जताना हो कि वह लड़कर हासिल किया गया है। निहंगों में भी कुछ वैसा प्रतीकवाद दिखता है। कोई वस्तु भेंट की जाए तो वे उसके सामने कृपाण घुमाते हैं। भाव शायद यह कि वस्तु केवल प्राप्त नहीं हुई, उसे वीरता के संस्कार से ग्रहण किया गया है। हमारे घर की चर्खियां (बेबलर्स) झुंड में फीकी-नमकीन खाने आती हैं। पहले पंख फुलाकर आकार बड़ा करती हैं, खूब चांव-चांव मचाती हैं, फिर भोजन शुरू करती हैं। यह देखकर मुझे कभी-कभी लगता है कि शायद पशु-पक्षियों में भी संसाधन पाने से पहले उसका एक सार्वजनिक प्रदर्शन जरूरी होता हो। पक्षी मनोविज्ञान को मैं अक्सर मानव दृष्टांतों से समझने की कोशिश करता हूं। #बैठेठाले अनुभव मेरा, चित्र एआई निर्मित।
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मैं विकास को अपनी 12 किमी प्रति घंटा की साइकिल से देखता हूँ, इसलिए वह मुझे अक्सर कुरूप दिखता है। हाईवे के किनारे पुराने पेड़ काट डाले गए हैं। नए अभी दिखाई नहीं देते। मिट्टी के खनन और ढुलाई ने हवा में धूल घोल दी है। साँस लेना कठिन लगता है। बाज़ार जाओ तो मोटरसाइकिलें और ऑटो सड़कों की धमनियाँ जाम किए खड़े मिलते हैं। प्लास्टिक की पन्नियाँ हवा में उड़ती हैं। तालाबों में जलकुंभी पहले से अधिक फैल गई है। यही विकास 80 किमी प्रतिघंटा की वातानुकूलित कार से अलग दिखता है। वहाँ समय बचता है। संगीत बजता है। स्मार्टफोन की स्क्रीन पर दुनिया मुट्ठी में समाई लगती है। मुझे नहीं लगता कि पेड़ काटना अनिवार्य है। सड़क चौड़ी करनी पड़े तो धूल नियंत्रण भी किया जा सकता है। यातायात बढ़े तो पैदल चलने वालों के लिए जगह भी बनाई जा सकती है। होम डिलिवरी सुविधा दे सकती है, तो प्लास्टिक पैकेजिंग कम करने का उपाय भी खोजा जा सकता है। यूरोप और जापान के कुछ हिस्सों ने पिछले दशकों में यही सीखा है—विकास चाहिए, पर उसका शोर और प्रदूषण कम से कम हो। हमारे यहाँ अक्सर धूल पहले आती है, विकास उसके पीछे। उलटबाँसी यह है कि विकास के इतने वर्षों बाद भी मेरा जीवन पहले की अपेक्षा अधिक कठिन और कम सुंदर लगता है। #उलटबांसी
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किसी से कुछ लेने में अपनी "वीरता" का प्रदर्शन बहुत से समूहों की सहज प्रवृत्ति प्रतीत होती है। शूलपाणेश्वर की झाड़ियों में नर्मदा परिक्रमा करने वालों से तीन दशक पहले आदिवासी बहुत कुछ छीन लेते थे। कहते हैं कि सामान लेने के बाद एक-दो थप्पड़ या लात भी उस प्रक्रिया का हिस्सा होते थे। मानो केवल लेना पर्याप्त न हो; यह भी जताना हो कि वह लड़कर हासिल किया गया है। निहंगों में भी कुछ वैसा प्रतीकवाद दिखता है। कोई वस्तु भेंट की जाए तो वे उसके सामने कृपाण घुमाते हैं। भाव शायद यह कि वस्तु केवल प्राप्त नहीं हुई, उसे वीरता के संस्कार से ग्रहण किया गया है। हमारे घर की चर्खियां (बेबलर्स) झुंड में फीकी-नमकीन खाने आती हैं। पहले पंख फुलाकर आकार बड़ा करती हैं, खूब चांव-चांव मचाती हैं, फिर भोजन शुरू करती हैं। यह देखकर मुझे कभी-कभी लगता है कि शायद पशु-पक्षियों में भी संसाधन पाने से पहले उसका एक सार्वजनिक प्रदर्शन जरूरी होता हो। पक्षी मनोविज्ञान को मैं अक्सर मानव दृष्टांतों से समझने की कोशिश करता हूं। #बैठेठाले अनुभव मेरा, चित्र एआई निर्मित।
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तेरह साल की पद्मजा (मेरी पोती) आठवीं कक्षा में प्रयागराज में पढ़ती है। उसने अपनी और अपने गांव के दोस्तों की शिक्षा को ले कर अपनी व्यग्रता बयान करते ब्लॉग लिखा है - "हम बच्चों की आवाज़" अपनी शिक्षा को ले कर उसका भय है कि "एक छात्रा होने के नाते मैं सोचती हूँ कि जब आज इतने बच्चे अपनी कॉपियों की जाँच और अंक देने की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं, तो जब मैं बारहवीं तक पहुँचूँगी तब हालात कैसे होंगे? क्या मेरी मेहनत का सही मूल्यांकन होगा? क्या हर बच्चे को उसकी योग्यता के अनुसार अवसर मिलेगा? ये सवाल मेरे मन में बार-बार उठते हैं।" उसे यह भी लगता है कि उसके गांव के मित्र बच्चे, जिनको अच्छे स्तर की शिक्षा नहीं मिलती और जिन्हें "पढ़ाई के साथ-साथ घर की जिम्मेदारियाँ भी उठानी पड़ती हैं। खाना बनाना, छोटे भाई बहनों को देखना और गाय-बकरियां चराना जैसे काम। सर्दियों के दिनों में उनको दो घंटे पत्तियां और टहनियां भी बीननी होती हैं। ठंड से बचने के लिये वे अलाव जलाने के काम आती हैं।" तेरह साल के बच्चे की यह सोच और व्यग्रता पठनीय है। आप इसे "मानसिक हलचल" ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं - buff.ly/bg6Rm1P
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रात आंधी आई थी तो सवेरे तापक्रम सहनीय था। अठारह किलोमीटर साइकिल चलाई। हाईवे के किनारे देखा - कई ढाबे बंद हो गये थे, पर कई नये खुल भी गये थे। वही दशा मोबाइल की दुकानों, पेट्रोल पम्पों, चाय जलेबी आदि की गुमटियों की भी थी। तेजी से खुलते बंद होते हैं ये सब। पैटर्न नजर आता है। 200 साल पहले आदमी चालीस साल जीता था और पूरी जिंदगी एक ही काम करता था - किसानी, बढ़ई, कुम्हार, कुंजड़ा, कुनबी ... 70 साल पहले मैं जन्मा और शायद 80-100 साल जियूं। तीन काम बदले मैने - शिक्षा और दो नौकरियां। अब लोग 100 साल जियेंगे पर बीस व्यवसाय बदलेंगे। आदमी का लाइफ स्पान और हेल्थ स्पान बढ़ा है; पर व्यवसाय का बहुत सिकुड़ गया है। क्या यह प्रगति है? साढ़े चार सौ साल पहले एक किताब लिखी बाबा तुलसीदास ने। आज भी वह बेस्ट सेलर है। शायद हजार साल बाद भी रहे। आज एक महान आत्मा वाइरल वीडियो रचता है। दो दिन चलता है। तीसरे दिन कोई और उसे रीप्लेस कर देता है। रचनात्मकता का क्षेत्र भी यही कह रहा है। वहां भी व्यवसाय की तरह क्रीयेटिविटी का लाइफ स्पान कम हो रहा है?
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🚨 A Gurgaon auto driver has installed a working AC inside his rickshaw to beat the summer heat.
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हरे राम! सब्जी वाले के यहां मिल रहा था और ले कर इस्तेमाल भी कर लिया। अब क्या होगा?! यह दही के समकक्ष माना जायेगा या मांस के?
To all mushroom loving vegetarians, mushrooms are NOT plants. They are fungi. They are closer to animal kingdom than plant kingdom. Super healthy, but just not plants.
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मदर डेयरी की दुकान है उन सज्जन की। समाजवादी दल के समर्थक हैं। दूध लेने जाता हूं तो एक समाजवादी डोज़ फ्री में दे देते हैं। गर्मी थी। गमछा से मुंह पोंछता ठेले पर आम बेचने वाला सामने से गुजर रहा था। वे सज्जन और मैं - दोनो देख रहे थे। निकल गया तो डोज़ दिया - कितनी बेरोजगारी है। बेचारा इतनी तेज धूप में भी ठेला ले कर निकला है। आज दूसरा मुद्दा था। दूध के दाम मदर डेयरी ने 2 रुपया लीटर बढ़ा दिये हैं। एक रुपया पाउच। तीन पाउच दूध खरीदा और साथ में फ्री डोज़ भी - सरकार एक साथ नहीं बढ़ाती, एक एक रुपया कर स्लो पॉइज़न देती है। और आपकी पेंशन साथ में थोड़े ही बढ़ाती है। वह तो छ महीना बाद ही बढ़ेगी। छोटे छोटे डोज़ में मिला समाजवाद मेरे मन में जुगाली करता रहता है। दुकान वाले सज्जन का शायद सोचना है अगले साल के चुनाव में असर पड़ेगा डोज़-थेरेपी का।
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बढ़िया। 22 प्रतिशत प्रोटीन और 54 ग्लाइसेमिक इंडेक्स। बस खाने, देखने में यह गंधहीन, स्वादहीन न हो और जेब पर ज्यादा असर न डाले तो बहुत काम का निकलेगा!
🚨 Scientists in India have developed protein-rich ‘designer rice’ with a low glycaemic index, aiming to address rising diabetes rates. (CSIR)
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क्रूर मज़ाक ही तो है। सरकारी स्कूल खराब हैं तो प्राइवेट स्कूलों में डालो बच्चे। फिर स्कूली शिक्षा खतम होने से पहले कोचिंग का इंतजाम करो। कोई एक समाधान नहीं। शिक्षा की गुणवत्ता सुधार के लिये प्राइवेट स्कूल के खर्च उठाओ और फिर प्रतिस्पर्धा की दौड़ के लिये कोचिंग के खर्च। खर्च ही खर्च!
Number of parents sending their children to private schools has risen from 31.7% in 2015 to 38.8% in 2026. On the one hand it is good news about rising incomes of middle class parents who can now afford private schooling. But on the other, it reveals the continued rejection of public schooling where quality of education and facilities for children remain below standard. Large scale Improvements in public school system must surely be the most critical and urgently needed reforms in the country. Hope this will be on the agenda of the forthcoming Governing Council meeting of NITI aayog. @PMOIndia @NamoApp @NITIAayog @dpradhanbjp @Pratham_India
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नर्मदा दंड यात्रा का आगे का विवरण - 7 जून 2026 प्रेमसागर सिवनी जिले में नर्मदा की दंड परिक्रमा कर रहे हैं। मैं उसका फोन पर भेजा विवरण लिख रहा हूं। *** नक्शे में बाबा जी सिहोरा के पास हाईवे पर दीखते हैं। कहानी से कुल बारह किलोमीटर आगे बढ़े हैं। वे अपने को रोज ढाई-तीन किलोमीटर लोटना बताते हैं, पर नक्शे पर हिसाब लगाऊं तो वास्तविकता लगभग 1.7 किलोमीटर प्रतिदिन की बैठती है। पर असल बात यह नहीं कि कितना चला जा रहा है; असल यह है कि रोज चला जा रहा है। किसी भी दीर्घकालिक प्रयत्न में दूरी से अधिक महत्व निरंतरता का होता है। उनके पास समय की कमी नहीं है। उनका ध्येय — या कहूं उनका जीवन — अब दंड भरना ही हो गया है। परिक्रमा उसके लिये एक ढांचा भर है। नर्मदा कई जगह तीस किलोमीटर दूर बह रही हैं; उनके दर्शन, उनके घाट, उनके बदलते रूप प्रेमसागर के वृत्तांत में आते ही नही हैं। जो आता है वह है दंड भरना, रुकना, लोगों से मिलना और श्रद्धालुओं का व्यवहार। कई बार मुझे लगता है कि यात्रा से अधिक यात्रा का कर्म बचा रह गया है। यह मेरी दृष्टि है; प्रेमसागर की नहीं। इसमें मैं कहां बैठता हूं? यह प्रश्न अब पहले से अधिक स्पष्ट हो रहा है। मुझे प्रेमसागर के दंड भरने की कठिनाई में उतनी दिलचस्पी नहीं बची। नर्मदा का दृश्य भी मेरे सामने नहीं है, इसलिए वह कोण भी सीमित है। लोग कितनी मालाएं पहना रहे हैं, कितने शॉल और श्रीफल भेंट कर रहे हैं, यह भी अब मेरे लिये कथा का केंद्र नहीं रहा। पर प्रेमसागर जो थोड़ी-बहुत सूचना भेजते हैं, उसके निमित्त मेरे मन में जो विचारों का दोलन पैदा होता है, उसमें मेरी रुचि बनी हुई है। शायद आगे का लेखन उसी दोलन का लेखा-जोखा होगा। कॉलिन थूब्रॉन की कैलाश-मानसरोवर यात्रा की पुस्तक याद आती है। उसमें कैलाश की यात्रा है, पर उतनी ही उनकी निजी स्मृतियां, उनकी मां की मृत्यु का शोक और जीवन के अर्थ की खोज भी है। यात्रा बाहर जितनी घटती है, भीतर भी उतनी ही घटती है। अच्छी यात्रा-पुस्तकें केवल भूगोल का विवरण नहीं होतीं; वे मनुष्य की दृष्टि का भी विवरण होती हैं। जब मैंने प्रेमसागर के साथ यह यात्रा आरम्भ की थी, तब मन में एक दूसरी कल्पना थी। लगता था कि नर्मदा के सौंदर्य को आधार बनाकर अमृतलाल वेगड़ के चार दशक बाद का कोई ढीला-ढाला सीक्वेल लिखने का अवसर मिलेगा। बरगी जलाशय के ड्रैगन की कल्पना भी उसी उत्साह में की थी। पर दंड-यात्री का मार्ग उस ड्रैगन के आसपास से निकल गया। वह कथा बनने से पहले ही छूट गयी। फिर लगा कि नर्मदा नहीं तो लोग मिलेंगे। बैगा, गोंड, भील, भिलाला मिलेंगे। उनकी रसोई, उनके घर, उनके जंगल, उनकी गरीबी और उसके बीच बची हुई उनकी कलात्मकता दिखेगी। पर प्रेमसागर की यात्रा की अपनी सीमाएं हैं। वे जिन लोगों के यहां रुकते हैं, जिनके बीच समय बिताते हैं, वे प्रायः वे लोग हैं जिन्होंने सदियों पहले जंगल काटकर खेती बसायी, गांव बसाये और जमीन से अपना रिश्ता बनाया। वे कोई शोषक वर्ग नहीं हैं; उन्होंने भी कठिन श्रम से अपना संसार खड़ा किया है। पर उनका संसार बैगा और गोंड के संसार से अलग है। इसलिए वह दूसरा दरवाजा भी वैसा नहीं खुला जैसा मैंने सोचा था। शायद मेरी सबसे बड़ी भूल यह थी कि मैं पहले से तय किये हुए गोल-पोस्ट लेकर चला था। पहले नर्मदा, फिर ड्रैगन, फिर आदिवासी जीवन। हर बार यात्रा ने मेरे लक्ष्य को थोड़ा-थोड़ा बदल दिया। अब लगता है कि पुस्तक — अगर यह कभी पुस्तक बनी — तो उसका विषय प्रेमसागर, नर्मदा या मध्यभारत में से कोई एक नहीं होगा। उसका विषय यह होगा कि एक यात्रा को दूर से देखते हुए मेरे मन में क्या-क्या बदलता गया। मेरे पास यात्राओं का अपना एक पुराना भंडार भी है। रेलवे की नौकरी में मैंने भारत को रेल की खिड़की से देखा है। ट्रैक के किनारे की बस्तियां देखी हैं। बस्तर देखा है। आदिवासी समाज देखा है। ऐसे गांव देखे हैं जिनका नाम अब स्मृति में धुंधला है पर जिनके दृश्य अभी भी साफ हैं। मैंने भारत को धीरे-धीरे बदलते भी देखा है — जैसे धीमी आंच पर रखी किसी हांडी का स्वाद बदलता है। तब शायद प्रेमसागर की यह यात्रा केवल एक वर्तमान घटना नहीं है; यह उन पुरानी स्मृतियों को टटोलने का बहाना भी बनती जा रही है। इसलिए अब मुझे लगता है कि मैं प्रेमसागर की यात्रा का इतिहास नहीं लिख रहा। मैं उस मानसिक प्रतिध्वनि को दर्ज कर रहा हूं जो उनकी यात्रा मेरे भीतर पैदा करती है। कल वह प्रतिध्वनि किसी बैगा गांव तक जा सकती है, किसी रेलवे स्टेशन तक, किसी पुराने अफसर के अनुभव तक या किसी निजी स्मृति तक। यात्रा बाहर कम और भीतर अधिक फैलती जाती है। यह हो सकता है कि ऐसी पुस्तक में किसी की रुचि न हो। यह भी हो सकता है कि वही उसका सबसे मूल्यवान हिस्सा निकले। अभी कहना कठिन है। पर इतना स्पष्ट है कि यह लेखन किसी पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार नहीं चल रहा। रास्ता प्रेमसागर तय कर रहे हैं; पर कथा का मार्ग बार-बार बदल रहा है। फिलहाल इतना ही पर्याप्त है। कल शायद गोल-पोस्ट फिर कहीं और खिसक जाये। नर्मदे हर! #NarmadaDandParikrama *** दंड परिक्रमा के पिछले अध्यायों का लिंक ब्लॉग में इस पेज पर 👉🔗 buff.ly/ZkM2aRb *** चित्रों में दंड भरते प्रेमसागर, खमरिया(कहानी) के मुकेश ठाकुर और उनके परिवार के लोग। एक सप्ताह से प्रेमसागर उन्ही के आतिथ्य में हैं।
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गर्मी पलट कर आई है। लू भी। पहले की तरह मुंह झौंसने वाली नहीं है, पर पक्षी बेहाल हो कर हमारे पोर्टिको में बैठे हैं। चोंच खुली है। शायद खुली चोंच से कुछ ठंडक लेते हों। मिट्टी के तसले भी वहां एक से दो कर दिये हैं पानी भरे। फर्श पर भी पानी उंडेल दिया है। ज्यादातर वे गीले फर्श पर बैठती हैं। उसी गीले फर्श से ही चोंच झुका पानी भी पीती हैं। भरी दोपहरी में उनका पनघट सा हो जाता है पोर्टिको का वह कोना।
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Replying to @GYANDUTT
Thats so true sir, the moment I saw a DALFI of SFI in the protest, I knew they messed it up
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Gyandutt Pandey retweeted
एक अच्छे मुद्दे को बर्बाद कर दिया गया.....
अच्छा मुद्दा था। नौजवान उद्वेलित थे। सरकार को घेरा जा सकता था। पर सुकुमार लोग, पंखा झलने के लिये नौकर और गर्मी से बचने के लिये एसी कार का प्रदर्शन करते दिखे; ऊपर से मुद्दा डफली-आजादी मंडली को थमा कर पूरे सीन का कचरा कर दिया। सरकारी पक्ष भीषण गर्मी में कोचिया या हिंगुआ के पौधों की तरह हरियरा उठा। यह कुछ वैसा हुआ कि जब तक प्रचार में राहुल गांधी जी की एंट्री नहीं होती भाजपाई मुर्झाये रहते हैं। उनके आते ही जान आ जाती है और बाजी पलट देते हैं केसरिया वाले। मायूस किया कॉक्रोचियों ने।
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अच्छा मुद्दा था। नौजवान उद्वेलित थे। सरकार को घेरा जा सकता था। पर सुकुमार लोग, पंखा झलने के लिये नौकर और गर्मी से बचने के लिये एसी कार का प्रदर्शन करते दिखे; ऊपर से मुद्दा डफली-आजादी मंडली को थमा कर पूरे सीन का कचरा कर दिया। सरकारी पक्ष भीषण गर्मी में कोचिया या हिंगुआ के पौधों की तरह हरियरा उठा। यह कुछ वैसा हुआ कि जब तक प्रचार में राहुल गांधी जी की एंट्री नहीं होती भाजपाई मुर्झाये रहते हैं। उनके आते ही जान आ जाती है और बाजी पलट देते हैं केसरिया वाले। मायूस किया कॉक्रोचियों ने।
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