नर्मदा दंड यात्रा का आगे का विवरण - 7 जून 2026
प्रेमसागर सिवनी जिले में नर्मदा की दंड परिक्रमा कर रहे हैं। मैं उसका फोन पर भेजा विवरण लिख रहा हूं।
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नक्शे में बाबा जी सिहोरा के पास हाईवे पर दीखते हैं। कहानी से कुल बारह किलोमीटर आगे बढ़े हैं। वे अपने को रोज ढाई-तीन किलोमीटर लोटना बताते हैं, पर नक्शे पर हिसाब लगाऊं तो वास्तविकता लगभग 1.7 किलोमीटर प्रतिदिन की बैठती है। पर असल बात यह नहीं कि कितना चला जा रहा है; असल यह है कि रोज चला जा रहा है। किसी भी दीर्घकालिक प्रयत्न में दूरी से अधिक महत्व निरंतरता का होता है।
उनके पास समय की कमी नहीं है। उनका ध्येय — या कहूं उनका जीवन — अब दंड भरना ही हो गया है। परिक्रमा उसके लिये एक ढांचा भर है। नर्मदा कई जगह तीस किलोमीटर दूर बह रही हैं; उनके दर्शन, उनके घाट, उनके बदलते रूप प्रेमसागर के वृत्तांत में आते ही नही हैं। जो आता है वह है दंड भरना, रुकना, लोगों से मिलना और श्रद्धालुओं का व्यवहार। कई बार मुझे लगता है कि यात्रा से अधिक यात्रा का कर्म बचा रह गया है। यह मेरी दृष्टि है; प्रेमसागर की नहीं।
इसमें मैं कहां बैठता हूं?
यह प्रश्न अब पहले से अधिक स्पष्ट हो रहा है। मुझे प्रेमसागर के दंड भरने की कठिनाई में उतनी दिलचस्पी नहीं बची। नर्मदा का दृश्य भी मेरे सामने नहीं है, इसलिए वह कोण भी सीमित है। लोग कितनी मालाएं पहना रहे हैं, कितने शॉल और श्रीफल भेंट कर रहे हैं, यह भी अब मेरे लिये कथा का केंद्र नहीं रहा। पर प्रेमसागर जो थोड़ी-बहुत सूचना भेजते हैं, उसके निमित्त मेरे मन में जो विचारों का दोलन पैदा होता है, उसमें मेरी रुचि बनी हुई है। शायद आगे का लेखन उसी दोलन का लेखा-जोखा होगा।
कॉलिन थूब्रॉन की कैलाश-मानसरोवर यात्रा की पुस्तक याद आती है। उसमें कैलाश की यात्रा है, पर उतनी ही उनकी निजी स्मृतियां, उनकी मां की मृत्यु का शोक और जीवन के अर्थ की खोज भी है। यात्रा बाहर जितनी घटती है, भीतर भी उतनी ही घटती है। अच्छी यात्रा-पुस्तकें केवल भूगोल का विवरण नहीं होतीं; वे मनुष्य की दृष्टि का भी विवरण होती हैं।
जब मैंने प्रेमसागर के साथ यह यात्रा आरम्भ की थी, तब मन में एक दूसरी कल्पना थी। लगता था कि नर्मदा के सौंदर्य को आधार बनाकर अमृतलाल वेगड़ के चार दशक बाद का कोई ढीला-ढाला सीक्वेल लिखने का अवसर मिलेगा। बरगी जलाशय के ड्रैगन की कल्पना भी उसी उत्साह में की थी। पर दंड-यात्री का मार्ग उस ड्रैगन के आसपास से निकल गया। वह कथा बनने से पहले ही छूट गयी।
फिर लगा कि नर्मदा नहीं तो लोग मिलेंगे। बैगा, गोंड, भील, भिलाला मिलेंगे। उनकी रसोई, उनके घर, उनके जंगल, उनकी गरीबी और उसके बीच बची हुई उनकी कलात्मकता दिखेगी। पर प्रेमसागर की यात्रा की अपनी सीमाएं हैं। वे जिन लोगों के यहां रुकते हैं, जिनके बीच समय बिताते हैं, वे प्रायः वे लोग हैं जिन्होंने सदियों पहले जंगल काटकर खेती बसायी, गांव बसाये और जमीन से अपना रिश्ता बनाया। वे कोई शोषक वर्ग नहीं हैं; उन्होंने भी कठिन श्रम से अपना संसार खड़ा किया है। पर उनका संसार बैगा और गोंड के संसार से अलग है। इसलिए वह दूसरा दरवाजा भी वैसा नहीं खुला जैसा मैंने सोचा था।
शायद मेरी सबसे बड़ी भूल यह थी कि मैं पहले से तय किये हुए गोल-पोस्ट लेकर चला था। पहले नर्मदा, फिर ड्रैगन, फिर आदिवासी जीवन। हर बार यात्रा ने मेरे लक्ष्य को थोड़ा-थोड़ा बदल दिया। अब लगता है कि पुस्तक — अगर यह कभी पुस्तक बनी — तो उसका विषय प्रेमसागर, नर्मदा या मध्यभारत में से कोई एक नहीं होगा। उसका विषय यह होगा कि एक यात्रा को दूर से देखते हुए मेरे मन में क्या-क्या बदलता गया।
मेरे पास यात्राओं का अपना एक पुराना भंडार भी है। रेलवे की नौकरी में मैंने भारत को रेल की खिड़की से देखा है। ट्रैक के किनारे की बस्तियां देखी हैं। बस्तर देखा है। आदिवासी समाज देखा है। ऐसे गांव देखे हैं जिनका नाम अब स्मृति में धुंधला है पर जिनके दृश्य अभी भी साफ हैं। मैंने भारत को धीरे-धीरे बदलते भी देखा है — जैसे धीमी आंच पर रखी किसी हांडी का स्वाद बदलता है। तब शायद प्रेमसागर की यह यात्रा केवल एक वर्तमान घटना नहीं है; यह उन पुरानी स्मृतियों को टटोलने का बहाना भी बनती जा रही है।
इसलिए अब मुझे लगता है कि मैं प्रेमसागर की यात्रा का इतिहास नहीं लिख रहा। मैं उस मानसिक प्रतिध्वनि को दर्ज कर रहा हूं जो उनकी यात्रा मेरे भीतर पैदा करती है। कल वह प्रतिध्वनि किसी बैगा गांव तक जा सकती है, किसी रेलवे स्टेशन तक, किसी पुराने अफसर के अनुभव तक या किसी निजी स्मृति तक। यात्रा बाहर कम और भीतर अधिक फैलती जाती है।
यह हो सकता है कि ऐसी पुस्तक में किसी की रुचि न हो। यह भी हो सकता है कि वही उसका सबसे मूल्यवान हिस्सा निकले। अभी कहना कठिन है। पर इतना स्पष्ट है कि यह लेखन किसी पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार नहीं चल रहा। रास्ता प्रेमसागर तय कर रहे हैं; पर कथा का मार्ग बार-बार बदल रहा है।
फिलहाल इतना ही पर्याप्त है। कल शायद गोल-पोस्ट फिर कहीं और खिसक जाये।
नर्मदे हर!
#NarmadaDandParikrama
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दंड परिक्रमा के पिछले अध्यायों का लिंक ब्लॉग में इस पेज पर 👉🔗
buff.ly/ZkM2aRb
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चित्रों में दंड भरते प्रेमसागर, खमरिया(कहानी) के मुकेश ठाकुर और उनके परिवार के लोग। एक सप्ताह से प्रेमसागर उन्ही के आतिथ्य में हैं।