हंस हिंदी की श्रेष्ठ साहित्यिक पत्रिका है. इसकी शुरुआत प्रेमचंद ने की थी. हंस लगातार अपनी रचनाओं के जरिए समाज में बहस का मंच उपलब्ध कराने का प्रयास करता रहा है.
कल की शाम कहानी, साहित्य और सिनेमा के नाम रही।
‘म्यूज़ियो कैमरा’ एवं 'हंस' पत्रिका के सहयोग से आयोजित “पन्ने से पर्दे तक” सत्र में प्रसिद्ध पटकथा लेखक एवं फिल्मकार अनु सिंह ने कहानी से पटकथा बनने की रचनात्मक यात्रा पर अपने अनुभव और विचार साझा किए।
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पिछले आयोजन “कविताओं की कहानी” के वक्ता रहीं आलोचक एवं विमर्शकार रश्मि रावत अपना अनुभव साझा करते हुए…✨
‘म्यूज़ियो कैमरा’ एवं ‘हंस’ पत्रिका के सहयोग से प्रस्तुत मासिक शृंखला “कहानी-वहानी” के अंतर्गत अगला कार्यक्रम — “पन्ने से पर्दे तक”
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“बिना मरे, मरे होने की कल्पना करने को कुछ लोग ‘मारबिडिटी’ ही मानते हैं, लेकिन लेखक हर एक पात्र के साथ मरता और जीता है, क्योंकि मैंने लेखक की नियति स्वीकार की है इसलिए मर-मरकर जीना ही मेरा धर्म है।”
-गिरिराज किशोर
• पुस्तक ‘आत्म-तर्पण’ से
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“मेरे जीवन में रघु राय जी का स्थान केवल एक मार्गदर्शक का नहीं, बल्कि उस बरगद की तरह था जिसकी छाया में हम जैसे नवांकुर खुद को सुरक्षित महसूस करते थे।”
-ताराचंद गवारिया
• 'हंस' जून 2026 अंक में प्रकाशित
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“नारीविद्वेष, नारी उत्पीड़न, औरत का बलात्कार हमारे समाज में इतना स्वाभाविक है कि पुरुष के ख़िलाफ़ आरोप लगने पर समाज पुरुष से नहीं औरत से घृणा करता है।”
-तसलीमा नसरीन
• पुस्तक ‘शब्दवेधी/शब्दभेदी’ से
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पिछले आयोजन “कविताओं की कहानी” के वक्ता रहे कथाकार एवं पटकथा-लेखक विवेक मिश्र अपना अनुभव साझा करते हुए…✨
शब्दों, स्मृतियों और साहित्य से भरी उस खूबसूरत शाम के बाद अब हम लेकर आ रहे हैं इसी शृंखला का अगला विशेष आयोजन — “पन्ने से पर्दे तक”।
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“रघु राय के जाने से एक ख़ामोशी छा गई है, लेकिन यह ख़ामोशी ख़ाली नहीं है, यह छवियों से भरी है - लाखों छवियों से, जिनमें से प्रत्येक में समय का एक अंश, जीवन का एक टुकड़ा, सत्य का एक अंश समाहित है।” पार्थिव शाह
• शोभा अक्षर
• 'हंस' जून 2026 अंक में प्रकाशित
I have just finished reading this fine and moving autobiography of the eminent Hindi writer Mannu Bhandari, sensitively rendered into English by Poonam Saxena. I shall be writing about the book and what it tells us about our country in a forthcoming column.
🎬 पन्ने से पर्दे तक
कहानी सिर्फ पढ़ी नहीं जाती, जी भी जाती है।
लेकिन पन्नों पर लिखी एक कहानी आखिर पर्दे तक कैसे पहुँचती है? कथा से पटकथा तक का यह सफ़र जितना रोचक है, उतना ही रचनात्मक भी।
इस विशेष संवाद में पटकथा लेखक एवं फिल्मकार अनु सिंह के साथ जानिए कि किस तरह एक कहानी नए रूप में ढलकर दर्शकों तक पहुँचती है। उनके अनुभवों के माध्यम से समझिए पटकथा लेखन की प्रक्रिया, चुनौतियाँ और रचनात्मक संभावनाएँ।
शब्दों से पर्दे तक की यह यात्रा आपको कहानी के रूपांतरण की प्रक्रिया को नए दृष्टिकोण से समझने का अवसर देगी।
📅 12 जून 2026 (शुक्रवार)
🕔 शाम 5:00 बजे से 6:30 बजे तक
📍 म्यूज़ियो कैमरा, गुरुग्राम
🎟️ प्रवेश निःशुल्क | सीटें सीमित हैं।
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