अनुष्ठान से आत्मशक्ति जागृत होती है। मंत्र में जितने अक्षर हैं, उतने लाख, उतने हजार, उतने सौ और उतने मंत्र होते तो एक अनुष्ठान सिद्ध होता। अच्छा, तो मंत्र एक बार जपते तो उसका एक फल होता है, लेकिन तुलसी के पौधे के आगे बैठ के जपते तो दस गुना होता। गौशाला में जपते, बैल नहीं बधां है। गौशाला में जपते सौ गुना फल होता है। शांत मंदिर में जपते अथवा गुरु की कुटिया है, गुरु ने कोई संत ने भजन किया है, उधर जप करते हजार गुना जप होता है, फल होता है। अमावस्या को जप करते, पूर्णिमा को जप करते, होली की रात, शिवरात्रि की रात, दिवाली की रात, जन्माष्टमी की रात को जप करते तो दस हज़ार गुना फल होता है।
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