परिवीक्षा अवधि में कर्मचारियों को पूरा वेतन देना हाईकोर्ट को कहना पड़ा, यह खुद में सिस्टम की बड़ी नाकामी का सबूत है। सवाल यह है कि जो बात इंसाफ और तर्क से साफ थी, उसके लिए कर्मचारियों को अदालत का दरवाज़ा क्यों खटखटाना पड़ा?
प्रोबेशन के नाम पर सालों तक 70%, 80% या 90% वेतन देना दरअसल सस्ते श्रम का सरकारी मॉडल बन चुका था। समान काम, समान जिम्मेदारी, लेकिन वेतन में खुली भेदभाव नीति—और वो भी सरकार द्वारा लागू की गई।
यह फैसला बताता है कि प्रशासन ने जानबूझकर कर्मचारियों की मजबूरी का फायदा उठाया। नए भर्ती हुए युवा कर्मचारी विरोध नहीं कर सकते थे, इसलिए उनकी जेब पर कैंची चलाना आसान समझ लिया गया।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसे अवैध सर्कुलर वर्षों तक लागू रहे और किसी जिम्मेदार अधिकारी ने इसे रोकने की जरूरत नहीं समझी। क्या कर्मचारी सिर्फ आदेश मानने की मशीन हैं, जिनके अधिकार तभी याद आते हैं जब कोर्ट डांटे?
हाईकोर्ट का यह फैसला राहत जरूर है, लेकिन यह भी सवाल छोड़ जाता है—जो पैसा गलत तरीके से काटा गया, उसकी जवाबदेही कौन लेगा? अगर अब भी ऐसे फैसलों से सबक नहीं लिया गया, तो शोषण की यह व्यवस्था नए नामों के साथ दोबारा लौट आएगी।