राजनीति में पद छोड़ना आसान होता है, लेकिन पद छोड़ते समय लोगों की आंखें नम कर जाना आसान नहीं।
कर्नाटक से आई तस्वीरों में सत्ता का हस्तांतरण भर नहीं था, एक पुराने कांग्रेस कार्यकर्ता की पूरी राजनीतिक यात्रा बोल रही थी। सिद्धारमैया ने अपने विदाई संबोधन में कोई विजयगाथा नहीं सुनाई, कोई शिकायतों का पुलिंदा नहीं खोला। उन्होंने सिर्फ इतना याद दिलाया कि राजनीति पद पाने का माध्यम नहीं, जिम्मेदारी निभाने का अवसर होती है।
एक गांव से निकलकर विधायक, मंत्री, विपक्ष का नेता और दो बार मुख्यमंत्री बनने तक की यात्रा को उन्होंने व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं बताया। उन्होंने उसे पार्टी के विश्वास, कार्यकर्ताओं के संघर्ष और लोकतंत्र की शक्ति का परिणाम कहा। यही बात उन्हें भीड़ से अलग करती है।
आज जब राजनीति में लोग कुर्सी से चिपककर विचारधारा बदल लेते हैं, दल बदल लेते हैं, रिश्ते बदल लेते हैं, तब किसी नेता का यह कहना कि “पार्टी ने कहा, इसलिए मैंने पद छोड़ा” केवल एक वाक्य नहीं है। यह उस राजनीतिक संस्कृति की याद है जिसमें संगठन व्यक्ति से बड़ा माना जाता था।
सिद्धारमैया के भाषण का सबसे भावुक हिस्सा शायद वह नहीं था जब उन्होंने अपने संघर्षों को याद किया, बल्कि वह था जब उन्होंने कांग्रेस के प्रति अपना आभार व्यक्त किया। क्योंकि सच्चा कार्यकर्ता वही होता है जो पार्टी को अपनी सीढ़ी नहीं, अपना घर समझता है। जो जीत में श्रेय बांटता है और विदाई में भी संगठन का सम्मान बढ़ाता है।
राजनीति में मतभेद होते हैं, नेतृत्व बदलता है, चेहरे बदलते हैं। लेकिन किसी राज्य की लोकतांत्रिक परिपक्वता इस बात से तय होती है कि सत्ता का हस्तांतरण संघर्ष के बाद भी सम्मान के साथ हो सकता है या नहीं।
कर्नाटक ने आज वही दृश्य देखा।
कुर्सी किसी और के पास जाएगी, लेकिन कार्यकर्ता का कद कुर्सी से नहीं मापा जाता। वह इस बात से मापा जाता है कि पद छोड़ते समय उसके शब्दों में सत्ता का मोह ज्यादा था या जनता और संगठन के प्रति कृतज्ञता।
सिद्धारमैया का विदाई भाषण शायद इसी प्रश्न का उत्तर था। कांग्रेस की तमाम राजनीतिक लड़ाइयों से परे, वह एक ऐसे कार्यकर्ता की आवाज़ लग रहा था जिसने पद को अंत नहीं, सेवा का एक अध्याय माना।
और लोकतंत्र में ऐसे अध्याय हमेशा याद रखे जाते हैं।