एक शिक्षक की भाषा, समाज की नींव होती है।
आजकल वायरल होने के लिए कुछ शिक्षक किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं — गाली-गलौज, अश्लीलता, व्यक्तिगत हमले, या फिर बहुत कुछ।
ख़ान सर हों या कोई और शिक्षक — हमारे लिए उनके विरोध का सबसे प्रमुख कारण यही है। क्योंकि जब एक शिक्षक अपनी भाषा शैली अभद्र, अमर्यादित और जहरीली बना लेता है, तो वह सिर्फ़ पढ़ाई नहीं करा रहा, बल्कि पूरे समाज में गंदी संस्कृति का बीज बो रहा है।
समाज का निर्माण कक्षा में ही होता है। छात्र जो देखते हैं, वही सीखते हैं। अगर गुरु खुद मर्यादा भूलकर “वायरल स्टार” बनने की होड़ में लग जाए, तो शिष्य से शिष्टाचार, संवेदनशीलता और अच्छी भाषा की उम्मीद कैसे रखी जा सकती है?
शिक्षक कोई सामान्य नौकरी नहीं करता — वह चरित्र का शिल्पकार होता है। उसकी ज़िम्मेदारी केवल सिलेबस पूरा करना या वीडियो वायरल कराना नहीं, बल्कि छात्रों में संस्कार, गरिमा और भाषा की शुद्धता पैदा करना भी है।
जो शिक्षक “जोरदार” बनने के चक्कर में अपनी गरिमा गिराते हैं, वे न सिर्फ़ अपनी प्रतिष्ठा खोते हैं, बल्कि पूरे शिक्षक समुदाय का भी अपमान करते हैं। समाज अब भी उम्मीद रखता है कि कम से कम शिक्षक तो सभ्य, संतुलित और प्रेरणादायक रहें।
अगर शिक्षक ही वायरल होने के लिए सारी हद से गुज़र जाएँगे वाले भाव में है, तो समाज को कौन संभालेगा?
आपका क्या विचार है?
क्या वायरल होने की होड़ शिक्षकों को उनकी असली भूमिका से भटका रही है?