यदि एक अस्पताल किसी मरीज को 8 लाख रुपये के इलाज की सलाह दे और वही मरीज दूसरे अस्पताल में मात्र 128 रुपये में ठीक हो जाए, तो सवाल सिर्फ एक अस्पताल पर नहीं, पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठता है।
इलाज और दवाओं के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट मानक तय होने चाहिए, ताकि मरीजों को गुमराह न किया जा सके। डॉक्टरों और अस्पतालों की जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए और अनावश्यक इलाज या आर्थिक शोषण पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
स्वास्थ्य सेवा का उद्देश्य मरीज को ठीक करना है, न कि उसके डर और मजबूरी को कमाई का जरिया बनाना। जब एक ही बीमारी के इलाज की लागत में इतना बड़ा अंतर हो, तो जांच केवल मरीज की नहीं, व्यवस्था की भी होनी चाहिए।