किसी समाज के दुर्दशा के क्या कारण है??
समकालीन विमर्श में एक बात साफ दिखती है अल्पसंख्यक वर्ग आज भी अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर संगठित और मुखर है। लेकिन दूसरी तरफ, वर्तमान सत्ता संरचना के बीच रहते हुए भी ब्राह्मण समाज के प्रति बढ़ता दुराग्रह अब नॉर्मल बनता जा रहा है।
जमीनी हकीकत का अवलोकन करें (विशेषकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के पिछले 5 वर्षों के घटनाक्रम), तो स्पष्ट होता है कि समाज का एक बड़ा हिस्सा अपने बुनियादी स्वाभिमान से समझौता कर चुका है। जो सुविधा संपन्न वर्ग है, वह व्यवस्था की पैरवी में व्यस्त है, और आम नागरिक डर के मारे मौन रहने को विवश है।
किसी भी समाज का पतन तब शुरू होता है जब वह अपनी सुरक्षा और आत्मसम्मान पर सवाल पूछना बंद कर देता है। केवल 'लाभार्थी' बने रहने से भविष्य सुरक्षित नहीं होता। यह समय अपनी राजनीतिक उपयोगिता और सामाजिक अस्मिता के बीच के फर्क को समझने का है। आपकी क्या राय है?