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पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं... पिता है तो बाज़ार के सब खिलौने अपने हैं !!! #Miss_You_Papa #FathersDay #happyfathersday2023 #HappyFatherDay
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आज ही के दिन, 15 जून 1947 को कांग्रेस ने भारत के विभाजन के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी थी। वह फैसला जिसने भारत माता के दो टुकड़े कर दिये और लाखों लोगों की किस्मत हमेशा के लिए बदल दी। कांग्रेस की उस ऐतिहासिक और विवादास्पद बैठक में आखिर क्या हुआ था? किन नेताओं ने समर्थन किया, किसने विरोध किया, और किन परिस्थितियों में विभाजन स्वीकार किया गया? आइए जानते हैं उस दिन का पूरा सच...
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स्वर्गीय जसपाल राणा के लिए लिखी गई इस अद्भुत और मार्मिक श्रद्धांजलि को अवश्य पढ़िये... आंखे नम हो जाएंगी... @ashu_nauty
महान नागटिब्बा की छाया में, महासू देवता के आशीर्वाद तले, नैनबाग से कुछ दूर एक छोटा सा गाँव है। आज लोग उसके आसपास के क्षेत्र को गोट विलेज के नाम से जानते हैं। पर्यटक आते हैं, तस्वीरें खिंचती हैं, पहाड़ों की सुंदरता पर कविताएँ लिखी जाती हैं। लेकिन एक समय था जब वहाँ का जीवन बकरियों, खेतों और संघर्षों के बीच सिमटा हुआ था। उसी मिट्टी से एक लड़का निकला था। नाम था, जसपाल राणा। उनके निधन की खबर आई तो जौनपुर के पहाड़ों में एक अजीब सी खामोशी उतर आई। मैं देहरादून में था। संयोग ऐसा कि किसी काम से गाड़ी से उतरा ही था कि सामने से उनकी अंतिम यात्रा निकल गई। लगा जैसे पहाड़ का एक युग विदा हो रहा हो। अंतिम प्रणाम करने का अवसर मिल गया। शायद यह भी उन्हीं पहाड़ों का कोई ऋण था। हमारे इलाक़ों में सफलता कोई सामान्य घटना नहीं होती। यहाँ लोग सपनों से ज़्यादा ज़िम्मेदारियाँ लेकर बड़े होते हैं। असफल होने का विकल्प अक्सर इतना महँगा होता है कि लोग कोशिश करने से पहले सौ बार सोचते हैं। इसीलिए जब कोई तिबार छोड़कर निकलता है, तो अक्सर कुछ कर गुजरता है। मुझे याद है, मैं चौथी कक्षा में था जब नरेंद्र सिंह नेगी जी का गीत पहली बार सुना था; "बन्दूक्या जसपाल राणा निशानु साधी दे..." पहाड़ों में लोकगीत हर किसी पर नहीं बनते। यहाँ गीत या तो उन लोगों पर बनते हैं जिन्होंने असाधारण सम्मान कमाया हो, या फिर असाधारण बदनामी। और जब किसी का नाम लोकगीत में दर्ज हो जाए, तो समझ लीजिए वह सिर्फ़ व्यक्ति नहीं रहता, वह लोकस्मृति बन जाता है। जसपाल राणा लोकस्मृति बन चुके थे। 1994 में जब उन्होंने एशियन गेम्स में स्वर्ण पदक जीता, तब भारत के पास व्यक्तिगत खेलों में पदक जीतने की कोई मजबूत परंपरा नहीं थी। क्रिकेट का शोर था, शूटिंग को बहुत कम लोग जानते थे। ऐसे समय में उत्तराखंड के एक दूरस्थ पहाड़ी गाँव का 18 साल का लड़का एशिया और दुनिया को बता रहा था कि निशाना सिर्फ़ बंदूक का नहीं होता, इरादों का भी होता है। वह दौर अभिनव बिंद्रा, गगन नारंग और मनु भाकर से बहुत पहले का था। आज भारतीय शूटिंग जिस ऊँचाई पर खड़ी है, उसकी नींव रखने वालों में जसपाल राणा का नाम सबसे आगे लिखा जाएगा। लेकिन मेरे लिए उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि कोई पदक नहीं है। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने उत्तराखंड के हजारों युवाओं को यह विश्वास दिया कि पहाड़ सिर्फ़ पलायन की कहानियाँ नहीं लिखते, पहाड़ इतिहास भी लिखते हैं। उन्होंने यह साबित किया कि हिमालय की गोद में सिर्फ़ नदियाँ और कंदराएँ नहीं बसतीं, यहाँ पहाड़ जैसी जीवटता बसती है। यहाँ हार मानने से इनकार करने वाली ज़िद बसती है। यहाँ सम्मान, श्रम और संघर्ष की वह संस्कृति बसती है जो मनुष्य को असाधारण बना देती है। जसपाल राणा चले गए हैं। लेकिन पहाड़ों में कुछ लोग मरते नहीं। वे गीत बन जाते हैं। वे प्रेरणा बन जाते हैं। वे अगली पीढ़ियों के सपनों में बस जाते हैं। द्रोण का स्वप्न अधूरा नहीं रहेगा। अर्जुन फिर आएँगे। नए युवा आएँगे। और वे उस स्वप्न को आगे लेकर जाएँगे जिसे जसपाल राणा ने अपनी साधना से आकार दिया था। ॐ शांति। ~ आशीष नौटियाल
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सच यही है कि 1947 में नेहरू 'इलेक्टेड' प्राइम मिनिस्टर नहीं बल्कि 'एक्सीडेंटल' प्राइम मिनिस्टर थे... इसीलिए उनका असली कार्यकाल 1952 से ही माना जाना चाहिए... वीडियो में कही गई बातों का स्रोत निम्नलिखित हैं :- 1. सरदार पटेल: एक समर्पित जीवन, राजमोहन गांधी, पृष्ठः 378 to 381 2. गांधी हिज लाइफ ऐंड थॉट्स, आचार्य कृपलानी, पृष्ठः 248 to 251 3. सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ जवाहर लाल नेहरू, सीरीज 2, खंड 15, पृ. 457 4. संपूर्ण गांधी वांग्मय, खंड 84, पृष्ठ 408 5. सरदार पटेल्स कॉरेस्पॉन्डेंट, वॉ. 10, पृ. 38 6. सरदार पटेल्स कॉरेस्पॉन्डेंस, वॉ. 3, पृ. 153 7. आजादी की कहानी, मौलाना आजाद, पृष्ठः 146 8. इंडिया फ्रॉम कर्जन टू नेहरू एंड आफ्टर, दुर्गा दास, पृ. 237
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Prakhar Shrivastava retweeted
बेटी केवल बड़े नेता की ही सांझी है क्या? स्मृति ईरानी, कंगना रनौत, मैथिली ठाकुर, अपर्णा यादव.... इनके लिए कभी कैंपेन क्यों नहीं चला?
भाजपा के ट्रोल्स शर्म करो तुम्हारा भी परिवार होगा माँ बहन या बेटियां भी होंगी। किसी बड़े नेता की बेटी के लिये इतनी नीचता मत करो कि लोग आप सबके घर पर भी ऐसे ही पत्थर मारने लगे।
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तमिलनाडु में तीन टीवी चैनलों को सभी सेट टॉप बॉक्स से हटा दिया गया है यानी उनका प्रसारण ही बंद करवा दिया गया है और यह तीन टीवी चैनल है पॉलिमर न्यूज, न्यूज तमिल 24/7, जनम तमिल टीवी यह तीनों तमिल चैनल तमिलनाडु की जोसेफ विजय सरकार की प्रशासनिक अक्षमता तमिलनाडु में बढ़ रहे महिलाओं पर अत्याचार तथा भयंकर बिजली कटौती के खिलाफ लगातार कवरेज कर रहे थे उसके बाद तमिलनाडु सरकार ने इन तीनों टीवी चैनलों को पूरी तरह से ब्लैक आउट करवा दिया खबरदार जो किसी ने इसे तानाशाही कहा
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Prakhar Shrivastava retweeted
To know more about the 1st EVM hacking and how Gandhi ji got Jawahar to become the Congress leader pls do read Hey Ram by @Prakharshri78. Available in Hindi, Marathi and English. Your myths around Nehru ji will get cleared once and for all. @jansabha91
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Prakhar Shrivastava retweeted
SIT DOWN BACCHE !!! Undercover kii baat aaj tumhare jaisi vo बकलोल बुद्धि kar rahi hai jo khud scripted interviews collect karke ghar chalati hai. Tumhari biradari aaj bhi "HUM KAGAJ NAHI DIKHAAYENGE" wala vilaap karti hai, maine toh bus unka syllabus thoda update kar diya hai. ab tumhari jamaat har propaganda wala raita baante se pehle "HUM CHEHRA NAHI CHUPNE DENGE" ka declaimer denge. Angreji mein isko hi IMPACT kehte hain Laadali....
OpIndia's "undercover agent". Script for Dhurandhar 3 right there. 😂😂😂 That's Mahima Singh. She went undercover, got sold and bought three times, to expose a trafficking racket. Ye hota hai undercover. Aap log jo kar rahe hain, use undercover nahi, BHAANDPANA kehte hain.
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Prakhar Shrivastava retweeted
Unmasking the cockroach who @khanumarfa interviewed. Our own Hamza @RitikaChandola
What happens when an undercover Cockroach enters CJP protest at Jantar Mantar? Behind the slogans, aesthetics, and social media hype, the so-called Gen-Z movement appeared less focused on students and more obsessed with pushing a political narrative. While genuine student concerns took a back seat, cameras and activists seemed busy chasing engagement, outrage, and anti-government soundbites. Who was the 'Unknown Cockroach' behind the mask who infiltrated the CJP protest, exposed the agenda of "topi media"? @RitikaChandola
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गुवाहाटी में विश्व संवाद केंद्र द्वारा आयोजित नारद जयंती समारोह
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बांग्लादेशी हिंदू कोई घुसपैठिया नहीं, बल्कि धार्मिक प्रताड़ना का शिकार शरणार्थी है। उसकी तुलना किसी बांग्लादेशी या रोहिंग्या मुस्लिम घुसपैठिये से करना बंद कीजिए। दोनों के भारत आने की वजह और नीयत में जमीन-आसमान का फर्क है!
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Prakhar Shrivastava retweeted
ये जो चश्मे वाला गोदी मीडिया चोर है के नारे लगा रहा है जिसकी वीडियो आरफ़ा शेयर करके बता रही है की आम लोगो में गुस्सा है शायद अरफ़ा को पता नहीं है ये आम आदमी पार्टी का झड़ौदा वार्ड से निगम पार्षद है। इसका नाम गगन चौधरी है।

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Prakhar Shrivastava retweeted
आपको क्या लगता है? मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने के प्रयास आज से थोड़े न चल रहे हैं। सत्ता सँभालने के तुरंत बाद ही ये उपक्रम शुरू कर दिया गया था। 2015 में जब मोदी सरकार ने विराट अनुभव वाले गजेंद्र चौहान को FTII का अध्यक्ष बनाया 4 महीने से भी अधिक समय तक विरोध प्रदर्शन किया गया। एक तरह से ये धमकी थी कि आप संस्थानों में अपनी विचारधारा के लोग नहीं बिठा सकते, और विशेषकर फ़िल्मी दुनिया में तो हस्तक्षेप नहीं ही कर सकते। उसी वर्ष भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के बहाने किसानों को भड़काने की कोशिश की गई। यानी, किसानों को भड़काने की साज़िश भी पुरानी थी। अन्ना हजारे से लेकर मेधा पाटकर जैसों को जोड़ा गया। 2015 में ही भारतीय सेना में बगावत की ज़मीन तैयार करने का कुटिल प्रयास हुआ। OROP के बहाने सेना-इकोसिस्टम में घुसपैठ की कोशिश हुई। अंत में थक-हारकर इन्होंने सोचा कि गुजरात भाजपा का पुराना गढ़ है और मोदी-शाह इसी प्रयोगशाला से निकले हैं तो सबसे पहले घर में वार किया जाए। पाटीदार आंदोलन भड़का दिया गया। एक 21 साल का लड़का यूँ ही आंदोलन का चेहरा नहीं बन गया। बाद में हार्दिक पटेल कांग्रेस में शामिल हो गए। अब भाजपा में हैं। 2016 आते-आते ये रोहित वेमुला नाम का शिगूफा लेकर आ गए और एक ऐसा व्यक्ति जो दलित नहीं था उसके बहाने दलितों को सरकार के ख़िलाफ़ करने की कोशिश की गई। फिर JNU में कन्हैया कुमार और उमर खालिद जैसों को पैदा करके अफजल गुरु को कल्ट साबित करने की कोशिश हुई। फिर ये राष्ट्रीय राजधानी को घेरने की साज़िश में लग गए। अंततः इन्हें जाट आरक्षण का मुद्दा मिला और पंजाब-हरियाणा में आग लगाने का तानाबाना बुना गया। यशपाल मलिक जैसों को खड़ा किया गया। फिर इन्होंने सोचा कि भारत की कमज़ोर नस कश्मीर को छुआ जाए। वहाँ आतंकी बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद जमकर युवाओं को भड़काया गया। हिज़्बुल-हुर्रियत से लेकर तमाम अलगाववादियों को सक्रिय कर दिया गया। पाकिस्तान से समर्थन आ ही गया। इन्हें अंदाज़ा नहीं था कि इसी कश्मीर में अनुच्छेद-370 और 35A के हटने के बाद पूर्ण लोकतंत्र लागू होगा और पाकिस्तान में घुस-घुसकर ऑपरेशंस होंगे। पाटीदार आंदोलन की भीड़ देखकर और गुजरात में आने वाले चुनाव को देखकर इन्होंने फिर मोदी-शाह के गढ़ में दलित आंदोलन भड़काया और जिग्नेश मेवाणी को पैदा किया। इस तरह इनका 2016 ख़त्म हुआ और ये मोदी सरकार का कुछ नहीं उखाड़ पाए। फिर इन्हें लगने लगा कि भाजपा को उसी की पिच पर परास्त किया जाए और उस क्षेत्र को चुना जाए जहाँ पार्टी अबतक पाँव नहीं जमा पाई है। ये पहुँचे तमिलनाडु। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ जल्‍लीकट्टू को लेकर माहौल बनाया गया। PETA खुलकर शामिल हुआ। फिर ये अलग-अलग जगह अलगाववाद भड़काने की कुटिल योजना में लग गए। पश्चिम बंगाल में दार्जीलिंग में गोरखालैंड के लिए आंदोलन भड़काया गया। 2018 आते-आते ये समझ चुके थे कि मोदी सरकार और मजबूत हो रही है। ऐसे में इन्होंने 2019 की तैयारी शुरू कर दी। भीमा-कोरेगाँव के बहाने फिर से दलित-वामपंथी गठबंधन बनाने की कोशिश हुई, अर्बन नक्सलियों को काम पर लगाया गया। प्रकाश आंबेडकर से लेकर 'एल्गर परिषद' तक सब बुद्धिजीवी वर्ग में मोदी सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने में लग गए। सरकार ने धर-पकड़ शुरू की तो एमनेस्टी-CIVICUS जैसी संस्थाएँ अर्बन-नक्सलियों के समर्थन में उतर आईं। गुजरात, रोहित वेमुला और भीमा-कोरेगाँव के बाद दलितों को भड़काने की एक और कोशिश हुई और इस बार भी जल्लिकट्टु की तरह सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बहाना बनाया गया। SC/ST एक्ट को लेकर ख़िलाफ़ देशभर में आग लगाई गई। मोदी सरकार ने क़दम पीछे लिए और जिस तरह से भूमि अधिग्रहण वाले अध्यादेश को लैप्स हो जाने दिया था वैसे ही इस बार एक्ट के कड़े प्रावधानों को पुनः स्थापित किया। तमिलनाडु के थूथुकुडी में एंटी-स्टरलाइट प्रोटेस्ट्स हुए। फिर इन्हें लगा कि हमला सीधे हिन्दू धर्म पर करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला में महिलाओं की एंट्री पर से शर्त हटा दिया। तृप्ति देसाई और रेहाना फातिमा जैसे नास्तिकों व हिन्दू विरोधियों की चाल सफल हुई। पूरे केरल में हिन्दू सड़क पर उतर आए, लेफ्ट सरकार ने जमकर लाठियाँ बरसाईं और केस पर केस दर्ज किए। खैर... इतना कुछ होने के बावजूद 2019 में एक बार फिर से भाजपा पहले से भी अधिक बहुमत के साथ सत्ता में आ गई तो विदेश में बैठी ताक़तों के कान खड़े हो गए। तबतक दुनियाभर में मोदी की जन-कल्याणकारी व जन-उत्थान की योजनाओं का डंका बज चुका था। विदेश में मोदी के जाते ही गर्वित भारतीय प्रवासी समुदाय उत्साहित हो जाता था। तख़्तापलट की साज़िश रचने वाली शक्तियों ने इस बार कुछ बड़ा करने की सोची। किसान और मुसलमान - दो वर्ग चुने गए। किसानों में भी पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शक्तिशाली किसान। बिहार-बंगाल वाले मेहनती किसान नहीं। शाहीन बाग़ में CAA के ख़िलाफ़ तम्बू लग गया और दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का। साल भर ड्रामा चलता रहा, AAP सरकार दोनों को दाना-पानी देती रही। तबतक मोदी सरकार भी समझ चुकी थी कि बल-प्रयोग से मामला बिगड़ेगा। किसानों की बात मानते हुए तीनों कृषि क़ानून स्वयं प्रधानमंत्री ने TV पर आकर वापस लेने की घोषणा की। शाहीन बाग़ उपद्रव दिल्ली दंगों में परिवर्तित हुआ और हिन्दुओं का नरसंहार हुआ, तब दंगाइयों पर कार्रवाई शुरू हुई। हिकेन्स नेक को काटकर भारत के टुकड़े-टुकड़े करने की मंशा रखने वाला शरजील इमाम जेल गया। 2020-21 में इन दोनों उपद्रवों के विफल होने के बाद विदेश में बैठी ताक़तों को बहुत बड़ा झटका लगा। वो समझ नहीं पा रहे थे कि करें क्या। उन्होंने कोरोना महामारी को ही औजार बनाने की ठानी। लॉकडाउन के बीच प्रवासी मजदूरों में भय पैदा करने की कोशिश हुई। उनसे प्रदर्शन करवाए गए। इसी बीच हाथरस में एक लड़की की मौत के बहाने दलितों को फिर से भड़काया गया। इन्हें योगी में मोदी से भी बड़ा ख़तरा नज़र आने लगा। चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण' जैसे खिलाड़ी उभरे। योगी के ख़िलाफ़ षड्यंत्र रचे जाने लगे। 2022 में योगी की वापसी हुई। गैंग को झटका लगा, ये कन्फ्यूज्ड हो गए। कांग्रेस पार्टी परेशान हो गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कौन सा मुद्दा चुनें। पत्रकारों को अपने पाले में करके सड़क से लेकर संसद तक पेगासस जैसे जासूसी सॉफ्टवेयर के ख़िलाफ़ माहौल बनाया गया और इज़रायल के साथ सम्बन्ध ख़राब करने की कोशिश की गई। 2022 में इन्हें अग्निपथ का मुद्दा मिल गया। इन्हें लगने लगा कि अग्निवीर योजना से भारतीय सेना और अधिक ऊर्जावान व युवा हो जाएगी। इनके लिए ख़तरे की घंटी बज गई और इन्होंने देशभर में युवाओं को भड़काकर सार्वजनिक संपत्तियों का जमकर नुक़सान करवाया। FTII के समय इन्होंने फ़िल्म जगत को चुना था, आख़िरकार 2022 में ये खेल जगत पर पहुँचे। फिर से हरियाणा की एक लॉबी को सक्रिय किया गया और बृजभूषण शरण सिंह को बलि का बकरा चुना गया। पहलवानों ने जमकर आंदोलन किया, बृजभूषण WFI अध्यक्ष नहीं रहे और उन्हें सांसदी का टिकट नहीं मिला। विनेश फोगाट विधायक बन गईं। हालाँकि, ये आंदोलन भी विफल हुआ। बृजभूषण के बेटे सांसद बने और WFI अध्यक्ष पद पर उन्होंने अपने वफादार को बिठाया। अंततः ये अम्बानी-अम्बानी करके भी थक चुके थे तो इन्होंने सोचा कि अडानी पर वार करते हैं। हिंडेनबर्ग को लाया गया। अडानी के ख़िलाफ़ रिपोर्ट पब्लिश करवाकर कंपनी के शेयर्स गिरा दिए गए। अमेरिका में केस करवा दिए गए। अंत में हुआ क्या? हिंडेनबर्ग बंद हो गया। पिछले ही दिनों अमेरिका ने अडानी के विरुद्ध चल रहे सारे मुक़दमों को बंद करने का ऐलान किया। गुजरात, तमिलनाडु, कश्मीर, केरल और पश्चिम बंगाल के बाद इन्होंने नॉर्थ-ईस्ट को चुना। एक हिन्दू समाज को जनजातीय का दर्जा न मिल पाए, इसके लिए पूरे मणिपुर को जला दिया गया। फिर से कोर्ट के एक फ़ैसले को पकड़ा गया। जमकर विदेश से फंड आए, सारे चर्च आग लगाने में जुट गए और भाजपा को अपनी ही चुनी हुई सरकार को बरख़ास्त करना पड़ा। सैकड़ों लोग मारे गए। मैतेई हिन्दुओं के लिए किसी को सहानुभूति नहीं रही, ईसाई कुकी के लिए दुनियाभर से आवाज़ें आने लगीं। मणिपुर के साथ-साथ महाराष्ट्र में भी इनका गेम चल रहा था। वहाँ मनोज जरांगे को पैदा करके मराठा आरक्षण को फिर से उभार दिया गया। जगह-जगह समाजों को लड़ाया जाने लगा। तबतक जाति जनगणना और आंबेडकर का मुद्दा उठाया ही जा चुका था। आरक्षण और संविधान ख़त्म करने के शिगूफे को चुनावी माहौल में ढाला गया। NEET पेपर लीक के कारण सरकार घिरी ही हुई थी, इस बहाने इन्हें बांग्लादेश और नेपाल में Gen Z प्रदर्शनों को भारत में दोहराने के सपने आने लगे। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले किसानों को भी फिर से एक्टिव किया गया और किसान आंदोलन वापस शुरू करवा दिया गया। फिर... 2024 में BJP अकेले दम पर बहुमत से दूर रह गई और उसकी 240 सीटें आईं। विपक्षी खेमे में जमकर जश्न मनाया गया। हालाँकि, TDP-JDU ने सरकार तो बनवा दी लेकिन नीतीश-नायडू पर दबाव बनाया जाने लगा। मोदी सरकार संघ परिवार की पुरानी नीतियों पर ज़ोर-शोर से आगे बढ़ने लगी तब इन्हें समझ आया कि इतनी आसानी से मोदी-शाह को मात नहीं दी जा सकती। सारे उपक्रम फेल हुए। सोनम वांगचुक को पालपोसकर बड़ा किया गया कि कम से कम लद्दाख में तो आग लगे और चीन को ही ख़ुश किया जाए। इस बार सरकार होशियार थी, तुरंत जेल में पटक दिया। लद्दाख में ये मणिपुर दोहरा नहीं पाए। तमाम विदेशी NGO बंद होने और NGOs को विदेशी फंडिंग बंद होने के कारण पूरा इकोसिस्टम दबाव में है। ये बहुत कुछ करने की औक़ात नहीं रखते हैं अब। ये नरेंद्र मोदी के लिए तैयारियाँ कर रहे थे, अमित शाह आउट ऑफ सिलेबस आ गए इनके लिए। पूरा विश्व युद्ध के झोंके महसूस कर रहा है। पेट्रोल-डीजल की किल्लत है। विपक्ष अब इधर ही उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समस्या के आने से पूर्व ही देशवासियों को आगाह करके रखते हैं। Gen Z को फिर से NEET के बहाने भड़काने की कोशिश चल रही है, सुगम परीक्षाएँ संचालित करवाना सरकार के लिए चुनौती है और ये समस्या जायज भी है। सरकार को इसपर काम करना होगा। एक बार फिर से खालिस्तानी किसानों को भड़काने की कोशिश हो रही है। फिर आ गए ये कॉकरोच! तिलचट्टों से सबको बहुत उम्मीदें थीं। सोशल मीडिया पर जमकर फॉलोवर्स मिले, ज़मीन पर डफली गैंग के अलावा कोई नहीं पहुँचा। दिल्ली में AAP और पश्चिम बंगाल में TMC की हार ने ऐसा सदमा दिया है कि बड़े से बड़े रिजीम चेंज एक्सपर्ट्स भी भारत आकर पानी माँग रहे थे। कॉकरोचों वाली तैयारी बड़ी थी, लेकिन देश की मनोरंजन-पसंद जनता ने इन जोकरों को भाव नहीं दिया और जमकर मजे लिए। अभिजीत दीपके तो वृंदा करात का चेला निकला और सौरव दास से गर्मी नहीं बर्दाश्त हो रही। हमें सजग रहना है। विदेशी ताक़तें सामान्यतः हार नहीं मानतीं लेकिन कोरोना से लेकर युद्ध जैसी स्थितियों में भी भारत ने जिस तरह के धैर्य का परिचय दिया है और यहाँ के नेतृत्व ने जिस तरह की इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया है, उसने भारत विरोधी शक्तियों को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने को विवश कर दिया है। जो श्रीलंका से लेकर पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल तक में सफल हो गया, वो भारत में मनोरंजन का मसाला बनकर रह गया।
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Prakhar Shrivastava retweeted
सवाल बड़ा है, दिल्ली पुलिस से धरने की परमिशिन मांगने के लिए महीनों पहेले एप्लीकेशन देनी होती है और आम तोर पर पुलिस धरने से दो या चार दिन पहले आप को बताती है की आप को परमिशिन मिली या नहीं कई बार तो रात को ही बताती है। यहाँ कॉक्रोच को कुछ घंटों में ही प्रमिशिन दे दी गई। क्यो ? इसे कहते हैं कॉक्रोच को स्पेशल ट्रीटमेंट ।
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Prakhar Shrivastava retweeted
CJP Spokesperson Saurav Dass has kept a Servant only to Fan him continously. These Lutyen Elites can't stay 10 mins in Sun, is sitting under a tree and enjoying cold coffee.
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भाई ने ख़ुद का संविधान लिख दिया 😑😑😑

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Prakhar Shrivastava retweeted
This is an extremely important thread for the Indian Gen Z. 1 Why is the Cockroach Janta Party a threat to national security? Why are they operating from the USA? Who is behind Abhijit Dipke and his party? Keep reading this thread for the complete answer.
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आज 3 जून है... आज ही के दिन 1947 में भारत के बंटवारे की घोषणा की गई थी... जिसे रेडियो पर माउंटबेटन, नेहरू और जिन्ना ने पढ़कर सुनाया था... लेकिन बड़ा सवाल ये है कि विभाजन का विरोध करने वाले ये कांग्रेस के नेता इस पर सहमत कैसे हो गए... दरअसल इसका खुलासा खुद नेहरू ने एक इंटरव्यू में 1960 में किया था... जानने के लिए देखिए ये वीडियो
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Prakhar Shrivastava retweeted
अपनी बेबाक राय और इतिहास से जुड़े तथ्यों को प्रमाणिकता के साथ हम सभी तक पहुँचाने वाले दूरदर्शन न्यूज़ के वरिष्ठ पत्रकार, मेरे अत्यंत प्रिय बड़े भैया प्रखर श्रीवास्तव @Prakharshri78 जी से मिलकर अत्यंत प्रसन्नता हुई। उनका ज्ञान, अध्ययन और राष्ट्र के प्रति समर्पण सदैव हम सबके लिए प्रेरणादायक है।
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