लॉकडाउन में मजदूरों के विशाल दर्द को किसी ने समेटने की कोशिश नहीं की। हज़ारों मील की तपती सड़क को नंगे पावों से मापा था। अलकतरे की सड़क पर पाँव के छाले, खून पोछा था। तब सियासतदानों ने मास्क लगा चुप्पी साधी थी। आज ये सहोदर होने का दावा करते हैं। सच में चुनाव लोकतंत्र का त्योहार है