मेरठ में 70 वर्षीय अहसान ने यूपी के मुख्यमंत्री को गुंडा कह दिया, तो मेरठ पुलिस आनन फानन में उस 70 वर्षीय बुज़ुर्ग को गिरफ्तार कर लाई। पुलिस ने मुख्यमंत्री की नज़र में ‘नंबर बढ़ाने’ के लिए उस 70 वर्षीय बुज़ुर्ग का लंगड़ाकर चलते हुए वीडियो जारी किया। यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कोई टिप्पणी पर कोई सवाल नहीं है। यहां सवाल यह भी नहीं है कि, यूपी के मुख्यमंत्री को गुंडा कहने पर पुलिस तुरंत संज्ञान ले लेती है, लेकिन वही पुलिस एक पूरे समुदाय पर अभद्र टिप्पणी करने वाले सत्ताधारी दल के नेताओं पर कोई एक्शन क्यों नहीं लेती?
यहां सवाल यह है कि क्या यह झूठ है कि योगी आदित्यनाथ पर 28 मुकदमे दर्ज थे? क्या यह झूठ है कि योगी आदित्यनाथ पर दर्ज मुकदमों में 22 मुकदमे बहुत गंभीर थे? क्या यह झूठ है कि मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार अध्यादेश लेकर आई और सभी मुकदमे वापस ले लिये गए? खेल एक है! तो खेल के नियम भी समान होने चाहिए। योगी आदित्यनाथ सरकार में ‘दूसरे’ नेताओं पर उनके परिवार समेत मुकदमे दर्ज हुए, सज़ाएँ हुईं। वहीं भाजपा नेताओं पर दर्ज मुकदमे अध्यादेश लाकर वापस लिए गए। यूपी सरकार ने नई इबारत तब लिखी, जब 2004 में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान BJP विधायक सलिल विश्नोई के साथ कानपुर में हुए दुर्व्यवहार के मामले को यूपी विधानसभा में लाया गया। यूपी विधानसभा ने अदालत लगाई, उस मामले के प्रशासनिक अधिकारियों से माफी मंगवाई और उन तमाम अधिकारियों को उत्तर प्रदेश विधानसभा द्वारा एक दिन की जेल की सज़ा सुनाई गई।
सवाल यह है कि ये सारे नियम कानून क्या केवल भाजपा की सरकार ही जानती है? सवाल यह है कि ये तमाम लोकतांत्रिक ‘सुविधाएं’ क्या विपक्ष के नेताओं के लिए नहीं हैं? सब कुछ सत्ता पक्ष के लिए ही है? सरकार के लोग अपने ऊपर तमाम गंभीर अपराध के मुकदमे वापस लेकर खुद को ‘पाक साफ’ करके दूसरों को माफिया कहेंगे, अपराधी कहेंगे। और अगर किसी ने उनके अतीत का हवाला देकर उन पर टिप्पणी कर दी तो सरकार के लोग उसे कान पकड़कर चलने को मजबूर करेंगे। पूरी दुनिया मदर ऑफ डेमोक्रेसी में होते इन तमाशों को देख रही है। क्या मदर ऑफ डेमोक्रेसी की न्यायपालिका भी देख रही है?