कल मैनपुरी मे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का स्वागत वहां की सांसद श्रीमती डिंपल यादव जी ने किया। स्वागत करना अच्छी बात है, लेकिन उन्होंने कन्नौज में हुई घटना को लेकर स्वामी जी से क्षमा भी मांगी। अब प्रश्न यह है कि कन्नौज में आखिर ऐसा क्या हुआ, जिसे स्वामी जी का अपमान बताया जा रहा है?
मेरा मानना है कि यदि श्रीमती डिंपल यादव जी वास्तव में स्वामी जी के सम्मान को लेकर चिंतित हैं, तो उन्हें सबसे पहले उस घटना के लिए क्षमा मांगनी चाहिए थी, जब वाराणसी में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव जी के शासनकाल में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी और उनके शिष्यों पर दौड़ा दौड़ा कर लाठियां बरसाई गई थीं। उस घटना में अनेक लोग घायल हुए थे, रक्तरंजित हुए थे और लंबे समय तक उपचाराधीन रहे थे। मुझे स्मरण नहीं कि उस घटना के लिए कभी श्री अखिलेश यादव जी या श्रीमती डिंपल यादव जी ने सार्वजनिक रूप से क्षमा मांगी हो।
जहां तक कन्नौज की घटना का प्रश्न है, यदि किसी प्रकार की असुविधा या अप्रिय स्थिति उत्पन्न हुई है, तो उसके लिए भी क्षमा मांगना उचित है। लेकिन यह भी सत्य है कि इस पूरे प्रकरण पर समाजवादी पार्टी ने राजनीति करने का प्रयास किया है।
यदि समाजवादी पार्टी को वास्तव में स्वामी जी के सम्मान की चिंता थी, तो कन्नौज के सांसद होने के नाते श्री अखिलेश यादव स्वयं उनके स्वागत के लिए क्यों नहीं पहुंचे? जब उनके संसदीय क्षेत्र में कार्यक्रम आयोजित किया गया था, तो उनका वहां उपस्थित होना स्वाभाविक था और क्या उन्होंने अथवा स्वामी जी के टीम ने प्रशासन से ठहरने या अन्य कोई सुविधा हेतु कोई डिमांड लेटर भेजा था यदि हाँ तो सार्वजनिक करो
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जिस व्यक्ति को कार्यक्रम की जिम्मेदारी दीगई वो अखिलेश का गुर्गा है वही व्यक्ति पूर्व में अखिलेश यादव की मौजूदगी में सार्वजनिक मंच से मेरे विरुद्ध आपत्तिजनक और धमकीपूर्ण टुकड़े टुकड़े करने की बातें कह चुका है। जब कोई व्यक्ति उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार और केंद्र में भी भाजपा सरकार होने के बावजूद एक सांसद के विरुद्ध ऐसी भाषा का प्रयोग कर सकता है, तो यह कहना कि उसने केवल प्रशासनिक दबाव के कारण कार्यक्रम से दूरी बनाई, सहज विश्वास योग्य नहीं लगता , और यदि आयोजक डर भी गया तो क्या पूरे जनपद में १ भी समाजवादी कार्यकर्ता ऐसा नहीं था जो उन्हें आश्रय दे देता क्या सोशल मीडिया पर भौंकने बाले सपाइए इतने डरपोक हैं कि एक संत को आश्रय नहीं दे सकते ? और जब कोई नहीं तो अखिलेश अपने भव्य बने समाजवादी कार्यालय पर भी रुका सकते थे अथवा अपने अन्य सहयोगियों के होटल में व्यवस्था करा सकते थे लेकिन वो तो स्वागत के लिए आए तक नहीं क्या वो भी कन्नौज जिला प्रशासन से डर गए ? जब ये लोग इतना ही डरते हैं तो राजनीती क्यों करते हैं ?
और यदि वास्तव में प्रशासन के दबाव में कोई निर्णय लिया गया था, तो संबंधित व्यक्ति को खुलकर सार्वजनिक बयान देना चाहिए था। अब तक ऐसा कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है , इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि पहले अपने गुर्गे से कह कर कार्यक्रम आयोजित कराया गया और बाद में राजनीतिक कारणों से उसे निरस्त कर दिया गया, ताकि कट्टरपंथी जेहादी वोट को खुश किया जाय और सनातनी वोटर को भ्रमित किया जाय ।
अतः मेरा विनम्र आग्रह है कि इस विषय पर अनावश्यक राजनीति न की जाए। यदि क्षमा मांगनी ही है, तो सबसे पहले वाराणसी की उस घटना के लिए क्षमा मांगी जानी चाहिए, जिसमें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी और उनके अनुयायियों के साथ दुर्व्यवहार हुआ था। साथ ही कन्नौज की घटनाओं और उनके साथ हुए राजनीतिक व्यवहार पर भी आत्ममंथन होना चाहिए।
और एक बात स्पष्ट कर दूँ इस समय कन्नौज में गाय तो बहुत दूर की बात भैंस भी नहीं कटती न मानो कन्नौज नगर के कसाइयों से पूंछ लो ।
धन्यवाद |