यह पोस्ट मैं विशेष रूप से युवा स्त्रियों तथा उन परिवारों के लिए लिख रहा हूँ जिनकी बेटियाँ किशोरावस्था में प्रवेश कर रही हैं।
👉 कथा का आधार वाल्मीकि रामायण है।
राम-रावण युद्ध समाप्त हो चुका था। हनुमान जी सीता माता के पास पहुँचे और विजय का समाचार दिया। तत्पश्चात् उन्होंने पूछा कि ,
“माता, अब शेष बचे हुए राक्षस बहुत भयभीत हैं। उनका क्या किया जाए?”
सीता माता ने कहा: “उन्हें क्षमा कर दो।”
हनुमान जी ने आश्चर्य से पूछा: “ऐसा क्यों, माता?”
सीता माता बोलीं: “भूल तो सभी से होती है। जो अपनी भूल पर पश्चाताप करता है, उसे क्षमा कर देना चाहिए।”
हनुमान जी की आँखें प्रेमाश्रुओं से भर आईं।
सीता माता ने आगे कहा: “हनुमान, मुझसे भी भूलें हुई हैं।”
हनुमान जी चकित होकर बोले: “आपसे भूल?”
सीता माता ने कहा: “हाँ, पुत्र! एक ही दिन में मुझसे तीन भूलें हुईं।”
पहली भूल कि सोने के मृग को देखकर मेरे मन में उसके चर्म की लालसा जगी। मैंने स्त्री-हठ करके श्रीराम को उसके पीछे भेज दिया।
दूसरी भूल जब मारीच की पुकार सुनकर मैंने लक्ष्मण की समझाइश नहीं मानी और उन्हें कटु वचन कहकर बाहर भेज दिया।
और तीसरी एवं सबसे बड़ी भूल , जब रावण साधु वेश में आया गेरुए वस्त्र, शिखा-सूत्र धारण करके मेरी प्रशंसा करने लगा तब अपनी प्रशंसा सुनकर मैंने अपना विवेक खो दिया और उस छलावे में फँस गई।
कथा का तात्पर्य-
यह कथा हमें सिखाती है कि कामना, क्रोध और अहंकार ( प्रशंसा का मोह ) कितनी जल्दी विवेक को ढँक लेते हैं। सीता माता जैसी पतिव्रता एवं विवेकशील नारी भी इन तीनों के संयोग से भूल कर बैठीं।
आज के समय में भी कुछ लोग ( संकेत समझ लें ) आकर्षक वेश-भूषा, मीठी बातें और आधुनिक स्टाइल अपनाकर युवतियों को अपने प्रभाव में लाने का प्रयास करते हैं। ऐसे व्यक्तियों का बाहरी रूप भले ही आकर्षक हो, किंतु उनके अंतर्मन की पहचान करना अत्यंत आवश्यक है।
इसी प्रकार घरेलू जीवन में भी छोटी-छोटी तुलनाएँ , जैसे पड़ोसी की बड़ी टीवी, बेहतर गाड़ी या अन्य भौतिक वस्तुएँ अकारण कलह का कारण बन जाती हैं। सोने के मृग की तरह ये चमकदार वस्तुएँ क्षणिक सुख देती हैं, परंतु परिवार में अशांति लाती हैं।
संदेश
प्राचीन कथाएँ हमें जीवन की सीख देने तथा उसे उन्नत बनाने के लिए ही हैं।
युवा स्त्रियों से विनम्र अनुरोध है कि किसी भी व्यक्ति को केवल उसके बाहरी रूप, स्टाइल या मीठी बातों से नहीं, बल्कि उसके चरित्र, संस्कार और मूल्यों से परखें। सच्चा सुख और सुरक्षा परिवार एवं स्वधर्म के पालन में ही है।
अभिभावकगण भी अपनी बेटियों को इन कथाओं के माध्यम से विवेकशील बनने की प्रेरणा दें। 🙏