मैं नदी हूँ।
#हिमालय की बर्फ़ से जन्मी थी। पत्थरों से टकरा कर हँसती थी, गाँवों को पानी पिलाती थी, बच्चों के पाँव सहलाती थी।
आज मुझे देखो।
मेरी छाती पर नीले, हरे, नारंगी रंग के
#घाव चिपके हैं। कोई
#बिसलेरी की बोतल है, कोई
#चिप्स का पैकेट, कोई
#कोल्ड_ड्रिंक का ढक्कन, कोई
#मैगी का रैपर। तुम
#पहाड़ पर पिकनिक मनाने आए, गाने बजाए, रील बनाई, और जाते-जाते अपना आराम मेरे पानी में छोड़ गए।
तुम कहते हो
#पहाड़ बुलाते हैं। मैं पूछती हूँ, किस मुँह से?
तुम बड़ी गाड़ियों में आते हो,
#NatureLover का स्टिकर लगाते हो, फिर एक झटके में बोतल खोल कर मेरे अंदर फेंक देते हो। तुम्हें लगता है तेज़ धार सब बहा ले जाएगी। हाँ, बहा ले जाती है — नीचे तुम्हारे ही खेतों तक, तुम्हारे ही बच्चों के गिलास तक।
मेरा
#दर्द शोर नहीं करता, इसलिए तुम सुनते नहीं। मैं पत्थर से टकरा कर भी आगे बढ़ जाती हूँ, पर
#PlasticPollution से टकरा कर अटक जाती हूँ। वो गलता नहीं, सड़ता नहीं, बस मेरी साँस रोकता है।
मैं
#मर नहीं रही, मुझे
#मारा जा रहा है। रोज़, थोड़ा-थोड़ा, तुम्हारी छोटी सी
#लापरवाही से।
अगर सच में
#पहाड़ से प्यार है तो अगली बार आओ तो — अपनी बोतल वापस ले जाओ, जैसे मंदिर से प्रसाद की थाली ले जाते हो। एक खाली थैला साथ रखो, मेरे लिए नहीं, अपनी इज़्ज़त के लिए। किसी को फेंकते देखो तो टोको, फोटो खींचने से पहले।
मैं अब भी बह रही हूँ, तुम्हारे लिए।
क्या तुम मेरे लिए एक कदम रुकोगे?
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#RaahhulSonkar 🌿
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