पुलकित जो खुद RW हैं दिल्ली प्रदूषण पर विपक्ष के साथ खड़े होने की अपील हीं नहीं की बल्कि एक लंबा लेख लिखा लेकिन बीजेपी समर्थक जो कि रोटी कपड़ा मकान और जीवन जैसे मुद्दों को विपक्ष की साजिश हिंदुत्व और डीप स्टेट से जोड़ रहे हैं ये देश के लिए घातक है
मुझे प्रशांत किशोर की कथन याद आई
पहली बार विपक्ष ने एक महत्वपूर्ण विषय उठाया है, और आठ मिनट की वीडियो में से एक फ्रेम निकाल कर उसपर 'हिडिम्बा सपोर्टर राहुल', 'अक्षय की चूChiयाँ' टाइप बकवास करके कुछ स्वघोषित राष्ट्रवादी मजे ले रहे हैं।
कोई नहीं कह रहा कि इस विषय के लिए सरकार गिरा दो या राहुल गाँधी को PM बना दो, पर जहाँ सरकार से सीधा सवाल होना चाहिए और विपक्ष यदि वह कर रहा है तो उसमें विपक्ष के साथ खड़े होने में समस्या क्या है?
जिनको पार्टी से तनख्वाह आती है, उनकी बात अलग है। IT सेलियों का तो काम है हर सही-गलत विषय पर पार्टी को डिफेंड करना।
पर यदि आप सरकारी पैसों पर नहीं पलते हैं और किसी पार्टी के गुलाम नहीं हैं तो आप इस विषय पर सरकार को डिफेंड क्यों कर रहे?
डांडा करो भाई, तुम्हारे साथ LOP खड़ा है। उसका इस्तेमाल करो। सरकार से सवाल करो कि प्रदूषण को लेकर आपने क्या-क्या किया है और आगे का रोडमैप क्या है?
चाहे सत्ता हो या विपक्ष, किसी भी साइड के नेता को बाप बनाने की कोई आवश्यकता नहीं होती है। जनता के रूप में आपकी भूमिका है कि किसी भी नेता से केवल अपना काम निकलवाओ और आगे बढ़ो।
यहाँ यदि राहुल गाँधी प्रदूषण के विषय पर सरकार को डंडा कर रहा है तो उसके पीछे खड़े होने या केवल इस बात में उसका समर्थन करने में समस्या क्या है?
(कृपया कोई ज्ञानी भ्राता यह तर्क न देना कि यह विषय उठाने के लिए जॉर्ज सोरोस और ISI से राहुल को पैसा आया है)
मोदी जी के नाश्ते का केला ज़रा सा पिलपिला हो जाने में जॉर्ज सोरोस की साज़िश खोज लेने वालों के सामने तो मैं पहले ही नतमस्तक हो जाता हूँ। आप लोगों से कोई बहस नहीं मित्रों🙏 आप चिल करें, आपका सब सही है।
मेरा प्रश्न उन थोड़े-बहुत सेंसिबल RW वालों से है जो हर समय कहते हैं कि देश का विपक्ष कुछ काम नहीं करता और आज जब पहली बार विपक्ष कोई ढंग का(जनता का) विषय उठा रहा है, तो उसपर 'अक्षय की चूCHIयाँ' और 'खी-खी-ही-ही' करके मामला डाइवर्ट क्यों किया जा रहा है?
थोड़ा बहुत स्टैंड ले लीजिए, कोई नहीं कह रहा कि इस विषय के लिए आग लगा दो या सड़कें जाम कर दो और ऐसे विषयों से सरकारें भी नहीं गिरा करतीं, वो भी ऐसे समय पर जब एक साथी दल का प्रमुख PM के पैर छूता न थक रहा हो और दूसरे बड़े साथी दल के राज्य को भर-भर कर पैसा दिया जा रहा हो।
बाकी हर बात में श्रीलंका या बांग्लादेश का उदाहरण देकर फियर-मोंगरिंग न ही की जाए, दोनों जगह स्थिति बहुत अलग थी और विषय प्रदूषण से कहीं अधिक पेचीदा और मूलतः राजनीतिक थे।
तो जब यहाँ कोई ऐसा खतरा नहीं है और विषय महत्वपूर्ण है तो सत्ता को उचित डंडा क्यों न किया जाए?
यह कुतर्क भी न दिया जाए कि राहुल गाँधी क्रेडिट ले जाएगा।
अरे ले जाए तो ले जाए, तुम्हें क्या? तुम्हें साफ हवा चाहिए या इस डिबेट में पड़ना है कि क्रेडिट किसे मिला?
भाड़ में जाए मोदी, और भाड़ में जाए राहुल। तुम साफ हवा वाले मुद्दे पर टिके रहो। कौन कह रहा है कि कॉन्ग्रेस में शामिल हो जाओ? पर जब तक कॉन्ग्रेस इस विषय के साथ है तब तक तुम कॉन्ग्रेस के साथ रहो।(केवल इस विषय पर)
क्योंकि भैया मानो न मानो, दिल्ली-NCR समेत उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में समस्या तो है।
बाकी इसपर व्हाटअबाउट्री खूब की जा सकती है कि कॉन्ग्रेस के समय में इतना प्रदूषण था, उन्होंने क्या किया, राहुल को बोलने का हक नहीं...दाल में नमक ज़्यादा है, कोफ्ते हार्ड हैं...लहसुन बताशे।
लेकिन एक बात पक्की है, व्हाटअबाउट्री वाली रील/ट्वीट से रीट्वीट और फॉलोअर आ जाते हैं, साफ साँस नहीं।
बाकी अपना-अपना देख लो भैया सब। मेरे घर में तो एक बूढ़े-बुढ़िया कपल हैं, ज़्यादा उम्र बीत गई, कम बाकी है। यदि अटैक या स्ट्रोक जैसा कुछ होता है तो या तो निबट जाएँगे या बेड पर आ जाएँगे। जब तक गाडी खिंची, खिंच जाएगी।
अपने लिए मैं बस यही प्रार्थना करता हूँ कि इन दोनों से पहले बेड पर न आऊँ। यदि कुछ ऊँच-नीच हो तो पूरा निबट जाऊँ, बस बेड पर न आऊँ क्योंकि दोनों बूढ़े-बुढ़िया के लिए थोड़ी समस्या हो जाएगी।
बाकी वे लोग थोड़ा सोच-विचार करें जो शादी-शुदा, परिवार वाले हैं और अपनी आने वाले पीढ़ियों के साथ दिल्ली-NCR या आस-पास बसने का सोच रहे हैं।
राम राम🙏