मैं आज से बीस वर्ष पूर्व ईटीवी में कार्यरत होने के दौरान समाजवादी पार्टी बीट की कवरेज करता था। तब नेता जी मुलायम सिंह यादव जी इस पार्टी के सर्वेसर्वा हुआ करते थे। मैंने एक इंटरव्यू में पूछा कि जब आपके खिलाफ कोई खबर छपती है तब आप क्या सोचते हैं इस पर नेताजी ने एक पुराना वाकया सुनाया कि एक वरिष्ठ पत्रकार उनसे मिले जिन्होंने उनके खिलाफ खबर लिखी थी वे आशंकित थे कि नेता जी तल्खी जताएंगे, पर नेता जी ने उनसे हालचाल पूछा बाकी बातें कीं खबर का जिक्र तक नहीं किया, आखिरकार पत्रकार महोदय ने नेता जी से सकुचाते हुए खबर के बारे में कुछ कहना चाहा पर नेता जी ने टोकते हुए कहा कि वो आपका काम है मैं उसमें हस्तक्षेप नहीं करूंगा। फिर नेताजी ने हंसते हुए बताया कि पत्रकार उनका मुरीद हो गया।
अब वर्तमान पर लौटते हैं इन्हीं उदात्त मन वाले नेता जी व उनके विजनरी उत्तराधिकारी की पार्टी के सोशल मीडिया हैंडल पर भाषायी गरिमा का ख्याल होते नहीं दिखे, राजनैतिक विरोधियों से इतर जाकर पत्रकारों को लेकर भी भाषायी संयम नहीं दिखे, अकारण जातीय पहचान का जिक्र हो तो ये स्थिति हैरान करती है।
देश के एक प्रभावशाली नेता की ताकतवर पार्टी के सोशल मीडिया हैंडल से अपशब्द व भाषायी शालीनता का ख्याल न रखा जाए तो किसी भी आम व्यक्ति तो क्या खुद सपा से जुड़े संवेदशीलजनों को भी अच्छा नहीं महसूस होगा।
(मैं पक्ष-विपक्ष सबसे जुड़े मुद्दों पर लिखता हूं, अच्छे की तारीफ करता हूं और गलत पर इंगित करता हूं, सहमति-असहमति पूर्णतया संभव है-ग्राहृय है पर भाषायी गरिमा का उल्लंघन कतई नहीं करता हूं कोई करता है तो उसका पुरजोर विरोध करता हूं। बाकी आज के दौर में चलन हो चुका है कि जो मीडियाकर्मी मन मुताबिक नहीं लिखता उस पर विरोधी से जुड़े होने की तोहमत लगा दी जाती है)