विधायक मुकेश भाकर और न्यायाधीश सुश्री कोमल मीणा को विवाह की हार्दिक शुभकामनाएँ।
यह केवल दो युवा हृदयों का मिलन नहीं है; यह हमारे समाज की पुरानी, धूल-धूसरित अलमारियों में बंद उन कुंडियों पर एक उजला प्रहार भी है, जिनमें जाति, धर्म और कुल-गौरव के नाम पर मनुष्य की सहजता को बरसों से कैद रखा गया है।
इस शादी की धूमधाम की ख़बरें और छवियाँ इसलिए सुंदर लगी, क्योंकि कभी-कभी समाज की जमी हुई बर्फ़ को पिघलाने के लिए प्रेम का सिर्फ होना काफी नहीं होता, उसका सार्वजनिक, निडर और उत्सवधर्मी होना भी ज़रूरी होता है।
राजस्थान का समाज अपनी समृद्ध परंपराओं के साथ-साथ अनेक अदृश्य गांठों से भी बुना हुआ समाज है। ये गांठें रिश्तों की नहीं, पूर्वग्रहों की हैं; ये मर्यादा की नहीं, भय की हैं; ये संस्कृति की नहीं, संकीर्णता की हैं।
मुकेश और कोमल ने इन गांठों को केवल छुआ नहीं, उन्हें खोलने का साहस भी दिखाया है। और यह साहस निजी होते हुए भी सार्वजनिक महत्व रखता है, क्योंकि हर ऐसी शादी आने वाली पीढ़ियों के लिए एक खिड़की खोलती है, जहाँ से हवा थोड़ा मनुष्यता में भीगकर भीतर आती है।
मैं एक दिन एक ज़मीनी रिपोर्टर के साथ मुकेश की माँ की बातें सुन रहा था। मुझे मेरी भी माँ याद आईं। मुझे लगा कि असली प्रज्ञा हमेशा विश्वविद्यालयों की ऊँची इमारतों में नहीं रहती; वह कई बार घर के आँगन में, चूल्हे की राख के पास, अनुभव की धीमी आँच पर पकती है। मुकेश माँ ने कितने सुलझे जवाब दिए। वे उन असंख्य तथाकथित शिक्षित लोगों से कहीं अधिक समझदार लगीं, जो डिग्रियों के बोझ तले दबे हुए भी मनुष्यता की पहली पाठशाला तक नहीं पहुँच पाते। कई बार मन में इतनी वितृष्णा होती है कि इस देश के प्रति अपार मुहब्बत दिखाने का दम भरने वाले इसी दिन भर कितना ज़हर उगलते हैं जातियों और धर्मों को लेकर।
हमारे समय की एक त्रासदी यह है कि हमने शिक्षा को प्रमाणपत्र समझ लिया है और संकीर्णता को संस्कार। जबकि सच्चे संस्कार वे हैं, जो मनुष्य को बड़ा बनाते हैं, उसका हृदय खोलते हैं, उसकी दृष्टि विस्तृत करते हैं। अब समय सचमुच आ गया है कि जाति और धर्म की दीवारें विवाह के रास्ते में खड़ी प्रहरी न बनी रहें। प्रेम, सम्मान और समानता यही वे तीन दीप हैं जिनसे भविष्य का समाज रोशन होगा।
हमारे मौजूदा वरिष्ठ नेताओं में बहुत सारे ऐसे हैं, जिन्होंने अपने समय में इन वर्जनाओं को तोड़ा और जाति धर्म की दीवारें लांघकर शादियाँ कीं। लेकिन जाति और धर्म की कंटीली और जड़तावादी संकीर्ण दीवारों को गिराने के लिए चेतना की लौ ज़रूरी है और मुकेश और कोमल ने इन दीपों में अपनी लौ जोड़ दी है। इसके लिए उन्हें बधाई नहीं, कृतज्ञता भी मिलनी चाहिए।
@MukeshBhakar_