पहले सांसद गए, फिर विधायक बिकते रहे,
सत्ता के गलियारों में नए खेल दिखते रहे।
वोटों की हिफाज़त पर भी सवाल उठने लगे,
सच बोलने वाले हर मोड़ पर झुकते रहे।
अब उद्योगों की बारी है, ये कैसा दौर आया,
मेहनत किसी की, मुनाफ़ा कोई और ले गया।
एयरपोर्ट, बंदरगाह, ज़मीन का हिसाब कौन देगा,