“मजलिस में आँसू, इफ्तार में ठहाके — आखिर मुसलमानों को कितना भोला समझते हैं ‘कौम के ठेकेदार’?”
13 मार्च 2026
लखनऊ में इन दिनों एक ऐसा दृश्य सामने आया है जिसने मुस्लिम समाज के भीतर गहरी बहस छेड़ दी है। एक तरफ घोषणा हो रही है कि छोटे इमामबाड़े में आयतुल्लाह सैयद अली खामेनेई का चालीसवां किया जाएगा और खुद मौलाना यासूब साहब मजलिस को खिताब करेंगे। बताया जा रहा है कि उनकी हैदरी टास्क फोर्स के मुन्नी आगा दिल्ली जाकर रहबर के प्रतिनिधि आगा अब्दुल माजिद हकीम इलाही को कार्यक्रम में बुलाने के लिए अभी कल ही इनविटेशन दे आए है।
यानी माहौल ऐसा बनाया जा रहा है जैसे पूरी कौम ग़म में डूबी हो और इस ग़म को याद करने के लिए बड़ा धार्मिक कार्यक्रम होने जा रहा हो और मौलाना यासूब ही तथा कथित रहनुमा है
लेकिन इसी बीच एक तस्वीर सामने आती है और वही तस्वीर कई सवाल खड़े कर देती है।
बीती शाम लखनऊ के Hotel Ornate में उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व राज्य मंत्री मोहम्मद यामीन खान की तरफ से आयोजित रोज़ा-इफ्तार में मौलाना यासूब की शिरकत दिखाई देती है। इस कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी मौजूद थे। जिनको मुसलमानो के गम और एहसास से ज्यादा अपनी सियासत और जायके की तवज्जो रहती है,
तस्वीरों में अखिलेश यादव और मौलाना यासूब बेहद खुश, मुस्कुराते और सियासी आफतारी माहौल का लुत्फ उठाते नजर आते हैं।
अब सवाल यह उठता है कि जब एक तरफ मंच से ईरान की त्रासदी और रहबर-ए-इंकलाब के ग़म की बात की जा रही है, तो दूसरी तरफ ऐसी आफतार की महफिलों में इस तरह की खुशी क्या संदेश देती है?
क्या ग़म सिर्फ मंच पर बयान करने की चीज रह गया है?
या यह समझ लिया गया है कि मुसलमान सिर्फ भाषण सुनते हैं, तस्वीरें नहीं देखते?
पुरानी बातें भी फिर चर्चा में
लखनऊ के कई लोग एक पुरानी घटना को भी याद कर रहे हैं। करीब डेढ़ दशक पहले इजराइल का एक प्रतिनिधिमंडल मौलाना यासूब के वालिद मौलाना मिर्जा मोहम्मद अतहर से मुलाकात करने आया था। उस मुलाकात की तस्वीरें और इंटरनेट लिंक आज भी मौजूद बताए जाते हैं।
उस समय भी यह सवाल उठा था कि आखिर इस मुलाकात का उद्देश्य क्या था और इसके पीछे क्या संदेश दिया गया था।
आज जब वही परिवार फिर से मुस्लिम समाज के नेतृत्व का दावा करता नजर आ रहा है, तो पुराने सवाल भी फिर से सामने आने लगे हैं।
क़ौम मोसाद और सीआईए के एजेंटों की मुखबिरी और तरफ़का डालने वाली खुराफात से परेशान है
मुसलमान अब पहले जैसा नहीं रहा
आज का दौर अलग है।
सोशल मीडिया के जमाने में हर तस्वीर, हर वीडियो और हर बयान तुरंत लोगों तक पहुंच जाता है।
अगर कोई नेता मौलाना मंच से ग़म की बात करे और उसी वक्त सियासी महफिलों में मुस्कुराता दिखाई दे, तो लोग सवाल जरूर करेंगे।
क्योंकि मजलिस-ए-अज़ा सिर्फ भाषण देने का मंच नहीं होती, अब एक दिन पहले हजरत अली अलैहिस्सलाम की शहादत पर नजफ में मजलिस को खिताब करके आए लाइव वीडियो मौजूद है ,मजलिस वह एहतराम और जिम्मेदारी का प्रतीक होती है।
ये गिड़गिटान की तरह मौका पर सियासी पार्टियों और नेताओं के सामने रंग बदलना इनसे सीखिए,
और जब मजलिस और सियासत की सीमाएँ धुंधली होने लगती हैं, तो समाज में अविश्वास भी बढ़ने लगता है।
आज मुस्लिम समाज के भीतर सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है —
क्या कौम को अभी भी इतना भोला समझा जा रहा है कि वह हर बयान पर आंख बंद करके यकीन कर ले?
समय बदल चुका है।
लोग देख भी रहे हैं, समझ भी रहे हैं और सवाल भी पूछ रहे हैं।
🗣 राय (Opinion)
मुस्लिम समाज को चाहिए कि वह भावनात्मक नारों और मंचीय भाषणों से आगे बढ़कर अपने नेताओं के आचरण को भी देखे।
क्योंकि असली नेतृत्व वह होता है जिसमें शब्द और व्यवहार दोनों एक जैसे हों।
❓ सवाल (Public Questions)
अगर ग़म इतना गहरा दिखावा है तो सियासी दावतों में खुशियाँ क्यों दिखती हैं?
क्या मजलिसें अब धार्मिक कम और सियासी मंच ज्यादा बनती जा रही हैं?
क्या मुस्लिम समाज को अब अपने नेताओं से ज्यादा पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं मांगनी चाहिए?
क्या कौम के नाम पर भावनाओं की राजनीति बंद होनी चाहिए?
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