गीता आपके रहन-सहन में परिवर्तन नहीं करती। गीता आपके मत, पंथ, संप्रदाय में अथवा वेशभूषा में परिवर्तन की इच्छा नहीं रखती, आपकी बुद्धि में परिवर्तन कर देना चाहती है। गीता ने जितना बुद्धि का आदर दिखाया है हिंदू धर्म ने, उतना और किसी मजहब में नहीं। भगवान जैसे भगवान उपदेश देते हैं और फिर अर्जुन को कहते हैं: यथेच्छसि तथा कुरु ।जैसा तेरी मति में आए ठीक से वो कर । ग्रंथ में लिखा है, महजब में लिखा है, तुम दब के करो, नही..... आपको स्व का सुख आ जाए, आप स्वतंत्र हो जाए ऐसा गीता माता चाहती है।
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