⚡ सोनभद्र में लाइनमैन की मौत: सिस्टम की चूक या संरचनात्मक विफलता?
सोनभद्र में संविदा लाइनमैन संतोष कुमार की 11kV लाइन पर कार्य के दौरान हुई मृत्यु ने फिर वही बुनियादी प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या शटडाउन प्रोटोकॉल कागज़ों तक सीमित है?
यदि शटडाउन लेने के बाद भी फीडर पर सप्लाई रिस्टोर हो गई, तो यह महज़ “दुर्घटना” नहीं, बल्कि ऑपरेशनल कंट्रोल, इंटर-लॉकिंग और सुपरविजन की गंभीर विफलता मानी जाएगी।
🔎 तकनीकी प्रश्न जो उठते हैं...
👉 शटडाउन परमिट (PTW – Permit to Work) किसने जारी किया और किसने कन्फर्म किया?
👉 क्या लाइन क्लियर सर्टिफिकेट और अर्थिंग/डिस्चार्ज प्रक्रिया विधिवत हुई थी?
👉 क्या कंट्रोल रूम लॉगबुक में सप्लाई रिस्टोरेशन की एंट्री दर्ज है?
👉 क्या फील्ड स्टाफ और सबस्टेशन के बीच डबल-कन्फर्मेशन प्रोटोकॉल लागू था?
11,000 वोल्ट की लाइन पर बिना शून्य वोल्टेज सत्यापन (Zero Voltage Verification) कार्य कराना सीधे-सीधे सेफ्टी मैनुअल का उल्लंघन है।
⚖ प्रशासनिक जवाबदेही... संविदा कर्मियों के साथ अक्सर देखा गया है कि:
👉 पर्याप्त सेफ्टी गियर (इंसुलेटेड ग्लव्स, हेलमेट, बेल्ट) उपलब्ध नहीं होते
👉 शटडाउन प्रक्रिया में मौखिक आदेशों पर भरोसा किया जाता है
👉 कार्य का दबाव अधिक, पर्यवेक्षण कम
यदि यह साबित होता है कि सप्लाई शटडाउन के बावजूद चालू की गई, तो यह क्रिमिनल नेग्लिजेंस (आपराधिक लापरवाही) की श्रेणी में आ सकता है।
📌 परिवार और विभाग के लिए अनिवार्य कदम
👉 तात्कालिक एक्स-ग्रेशिया मुआवज़ा (न्यूनतम 25–50 लाख की श्रेणी में)
👉 आश्रित को नौकरी
👉 स्वतंत्र तकनीकी जांच समिति (बाहरी सदस्य सहित)
👉 संबंधित फीडर/सबस्टेशन स्टाफ की जवाबदेही तय कर निलंबन/एफआईआर
🧭 व्यापक परिप्रेक्ष्य
बिजली सुधार, स्मार्ट मीटर, लाइन लॉस—इन सबके बीच फील्ड पर काम करने वाला लाइनमैन सबसे कमजोर कड़ी है। जब तक सेफ्टी ऑडिट, डिजिटल इंटरलॉकिंग सिस्टम, और रियल-टाइम फीडर मॉनिटरिंग लागू नहीं होगी, ऐसे हादसे रुकेंगे नहीं।
सवाल सीधा है—
क्या एक लाइनमैन की जान की कीमत सिर्फ प्रेस विज्ञप्ति और सांत्वना तक सीमित रहेगी, या इस बार सिस्टम की जिम्मेदारी तय होगी?
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