सत्तू हो, राजस्थान की खट्टा राबड़ी हो, कश्मीर का कहवा हो, दक्षिण भारत का नीर मोर (मसाला छाछ) हो या पहाड़ों का झंगोरे का पेय…भारत के हर क्षेत्र ने अपने मौसम, भूगोल, जलवायु और जीवनशैली के अनुसार अपना पारंपरिक खानपान विकसित किया है।
ये पेय केवल स्वाद का विषय नहीं हैं, बल्कि पीढ़ियों के अनुभव, लोकज्ञान और प्रकृति के साथ सामंजस्य का परिणाम हैं। गर्म इलाकों में शरीर को शीतलता देने वाले पेय, शुष्क क्षेत्रों में ऊर्जा और पोषण देने वाले पेय, ठंडे प्रदेशों में शरीर को ऊष्मा देने वाले पेय….हर एक के पीछे स्थानीय बुद्धिमत्ता की एक लंबी परंपरा है।
कई दशकों तक आधुनिकता की दौड़ में ये पेय उपेक्षित रहे, लेकिन अब लोग फिर समझने लगे हैं कि स्वास्थ्य केवल कैलोरी से नहीं, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप भोजन से भी बनता है।
पारंपरिक खानपान को पुनर्जीवित करना अच्छी बात है, लेकिन उसे उसकी मूल आत्मा, स्थानीय संदर्भ और सांस्कृतिक पहचान के साथ समझना और अपनाना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।
ये जो हैं, उन्हें वही रहने दो। हर चीज़ को एक जैसा बनाने की नहीं, उसकी विशिष्टता को बचाए रखने की ज़रूरत है। यही भारत की खाद्य-संस्कृति की सबसे बड़ी ताकत है।
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“Sattu (सत्तू)” should be declared as ‘Welcome Drink.’
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