सेवा में,
सुशील गर्ग
मुख्य अभियंता महोदय,
मध्यांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड
विषय: क्या छोटी मीडिया आपकी नजर में कीड़े-मकोड़े और बड़ी मीडिया अजगर है?
महोदय,
आखिर आपके कार्यालय में न्याय का तराजू खबर की सच्चाई से चलता है या मीडिया के बैनर की मोटाई से?
दिनांक 16.03.2026 को विद्युत तंत्र से संबंधित खबरों के प्लेटफार्म “यूपीपीसीएल मीडिया” के ऑफिशियल ग्रुप में “बिना एस्टीमेट हटाई गई 11 केवी की लाइन” शीर्षक से खबर प्रकाशित की गई, जिसमें एक अभियंता पर बिल्डर को फायदा पहुंचाने का गंभीर आरोप लगाया गया था।
लेकिन शायद वह खबर किसी बड़े मीडिया घराने की नहीं थी, इसलिए आपके वातानुकूलित कार्यालय की दीवारें तक नहीं हिलीं।
मुख्य अभियंता महोदय, आपने आखिर ऐसी कौन सी चश्मा पहन रखी है, जिसमें बड़ी मीडिया की खबरें आपको नागिन की फुफकार जैसी दिखाई देती हैं और छोटी मीडिया की खबरें मच्छर की भनभनाहट जैसी?
बड़े बैनर की एक खबर आते ही आप मेज के ऊपर खड़े होकर पसीने से तरबतर होते हुए 24 से 48 घंटे में जांच बैठा देते हैं, निलंबन कर देते हैं, बयान जारी कर देते हैं, मानो पूरा विभाग ईमानदारी की मूर्ति बन गया हो।
लेकिन जब वही सवाल “यूपीपीसीएल मीडिया” उठाता है, तब आपकी कार्यशैली अचानक कुर्सी पर पैर फैलाकर ऊंघने लगती है। लगभग 2 महीने बीत गए, मगर जांच आज तक अपनी मंजिल नहीं ढूंढ सकी।
और तो और, आपने जांच ऐसे अधिकारी को सौंप दी, जो खुद एक अन्य जांच को 4 महीने से फाइलों की कब्र में दफन किए बैठे हैं। जिनसे एक रिपोर्ट नहीं निकल पा रही, उनसे दूसरी जांच में निष्पक्षता की उम्मीद करना वैसा ही है जैसे अंधेरे कमरे में काला चश्मा पहनकर सुई ढूंढना।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि पूर्व कर्मचारी होने के “इंसानियत वाले रिश्ते” भी बड़ी तेजी से निभाए जा रहे हैं।
सूत्र बताते हैं कि दिनांक 17/03/2026 को गोपनीय पत्र लिखने वाले एक अन्य अधिशासी अभियंता पर रिपोर्ट में संशोधन करने का दबाव बनाया जा रहा है, ताकि संबंधित अवर अभियंता को जांच से क्लीन चिट दिलाई जा सके।
यदि यह सच है, तो फिर जांच कमेटी नहीं बल्कि “बचाव समिति” बनाई गई है।
महोदय, आपने यह कैसा साम्राज्य बना रखा है, जहां जांच अधिकारी जांच को ही खाकर डकार तक नहीं लेते?
फाइलें चलती कम हैं, दबती ज्यादा हैं।
सवाल उठते कम हैं, दबाए ज्यादा जाते हैं।
और कार्रवाई होती कम है, दिखाई ज्यादा जाती है।
क्या विभाग में न्याय का आधार अब यह हो गया है कि खबर किसने छापी है, न कि खबर में क्या छपा है?
यदि यही रवैया रहा, तो फिर साफ मान लिया जाए कि विभाग में “सच्चाई” नहीं बल्कि “पहचान” की कीमत है।
छोटी मीडिया चाहे भ्रष्टाचार का पहाड़ दिखाए, उसे कीड़ा-मकोड़ा समझकर कुचल दिया जाएगा, जबकि बड़े मीडिया की छींक पर पूरा सिस्टम वेंटिलेटर पर पहुंच जाएगा।
याद रखिए महोदय,
छोटी मीडिया की कलम भले पतली हो, लेकिन जब जनता का भरोसा उसके साथ खड़ा हो जाए, तो वही कलम बड़े-बड़े साम्राज्यों की नींव हिला देती है।
अब देखना यह है कि आपकी जांच व्यवस्था जनता को न्याय देगी या सिर्फ अपने लोगों को संरक्षण।
सादर,
संजीव श्रीवास्तव
संपादक
यूपीपीसीएल मीडिया
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