यह शरीर भौतिक शरीर की तुलना में सूक्ष्म होता है। इंसान का सिस्टम बहुत जटिल व सुंदर है। यह बहुत जल्दी टूट भी सकता है और साथ ही यह जबरदस्त तरीके से लचीला भी है। यह जीवन बहुत ही क्षणभंगुर है - सांस भीतर, सांस बाहर, सांस भीतर, सांस बाहर ...अगर अगली सांस नहीं आई तो आप गए। जीवन और मृत्यु के बीच केवल एक आधी सांस ही तो है, एक पूरी सांस भी नहीं दृ कृपया इसे देखें। लेकिन यह जीवन क्षणभंगुर होते हुए भी लचीला भी है।
यह शरीर भौतिक शरीर की तुलना में सूक्ष्म होता है। इंसान का सिस्टम बहुत जटिल व सुंदर है। यह बहुत जल्दी टूट भी सकता है और साथ ही यह जबरदस्त तरीके से लचीला भी है। यह जीवन बहुत ही क्षणभंगुर है - सांस भीतर, सांस बाहर, सांस भीतर, सांस बाहर ...अगर अगली सांस नहीं आई तो आप गए। जीवन और मृत्यु के बीच केवल एक आधी सांस ही तो है, एक पूरी सांस भी नहीं दृ कृपया इसे देखें। लेकिन यह जीवन क्षणभंगुर होते हुए भी लचीला भी है।
भले ही आप किसी एक साधारण आसन का अभ्यास करें या योग के दूसरे आयाम को अपनाएँ, सबका एकमात्र मकसद है आपके बोध को निखारना।
इंसान अविश्वसनीय कामों को कर सकता है क्योंकि इस शरीर को कई स्तरों पर रचा गया है। अगर यह केवल भौतिक होता तो नींद में किसी का नाक पकड़ने भर से ही उसके प्राण चले जाते। परंतु ऐसा नहीं होता। यह परतों में रचा है। भले ही भौतिक शरीर जीने लायक न रहे, लेकिन दूसरे आयाम अगर जीवित हैं, तो भौतिक शरीर को फिर से जीवंत कर सकते हैं। आपके साथ ऐसा हर दिन होता है। जब आप सोते हैं तो दरअसल आपका एक हिस्सा मर जाता है - आपका व्यक्तित्व, आपके विचार, आपकी खुद के बारे में बनी हुई राय, लेकिन दूसरे हिस्से जीवित रहते हैं इसलिए सब कुछ नए सिरे से जी उठता है।
भले ही आप किसी एक साधारण आसन का अभ्यास करें या योग के दूसरे आयाम को अपनाएँ, सबका एकमात्र मकसद है आपके बोध को निखारना। क्योंकि जो आपके बोध में है, आप केवल वही जानते हैं - बाकि तो केवल कल्पना है। आमतौर पर बोध को निखारने की बजाए लोगों को उपदेश दिया जाता है। उपदेश आपको केवल बेलगाम कल्पना की ओर ले जाएगा, जो आपको पागलखाने की ओर ले जाने वाला पक्का तरीका है। अगर आपकी कल्पना बेकाबू हो जाए, और वास्तविकता से जुड़ी न रहे, तो आप निश्चित रूप से पागलपन की ओर बढ़ रहे हैं।
अगर आप आध्यात्मिक पथ पर उन उपेदशों को अपनाते हैं, जो आपके लिए जरुरी नहीं हैं, तो आप बहुत जल्दी पागल हो जाएँगे। यह खतरा हमेशा बना रहता है। अगर आप वास्तविकता की ठोस जमीन पर खड़े हैं, और तब आप कोई कल्पना करते हैं, तब तो ठीक है। लेकिन अगर आपकी कल्पना आपको जमीन से उड़ा ले गई, तो हालात पर आपका कोई काबू नहीं रह जाएगा।।
इंसान अविश्वसनीय कामों को कर सकता है क्योंकि इस शरीर को कई स्तरों पर रचा गया है। अगर यह केवल भौतिक होता तो नींद में किसी का नाक पकड़ने भर से ही उसके प्राण चले जाते। परंतु ऐसा नहीं होता। यह परतों में रचा है। भले ही भौतिक शरीर जीने लायक न रहे, लेकिन दूसरे आयाम अगर जीवित हैं, तो भौतिक शरीर को फिर से जीवंत कर सकते हैं। आपके साथ ऐसा हर दिन होता है। जब आप सोते हैं तो दरअसल आपका एक हिस्सा मर जाता है - आपका व्यक्तित्व, आपके विचार, आपकी खुद के बारे में बनी हुई राय, लेकिन दूसरे हिस्से जीवित रहते हैं इसलिए सब कुछ नए सिरे से जी उठता है।
भले ही आप किसी एक साधारण आसन का अभ्यास करें या योग के दूसरे आयाम को अपनाएँ, सबका एकमात्र मकसद है आपके बोध को निखारना। क्योंकि जो आपके बोध में है, आप केवल वही जानते हैं - बाकि तो केवल कल्पना है। आमतौर पर बोध को निखारने की बजाए लोगों को उपदेश दिया जाता है। उपदेश आपको केवल बेलगाम कल्पना की ओर ले जाएगा, जो आपको पागलखाने की ओर ले जाने वाला पक्का तरीका है। अगर आपकी कल्पना बेकाबू हो जाए, और वास्तविकता से जुड़ी न रहे, तो आप निश्चित रूप से पागलपन की ओर बढ़ रहे हैं।
अगर आप आध्यात्मिक पथ पर उन उपेदशों को अपनाते हैं, जो आपके लिए जरुरी नहीं हैं, तो आप बहुत जल्दी पागल हो जाएँगे। यह खतरा हमेशा बना रहता है। अगर आप वास्तविकता की ठोस जमीन पर खड़े हैं, और तब आप कोई कल्पना करते हैं, तब तो ठीक है। लेकिन अगर आपकी कल्पना आपको जमीन से उड़ा ले गई, तो हालात पर आपका कोई काबू नहीं रह जाएगा।
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