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Mahamanthan : સમાજમાં રક્ષકોની છાપનું ધોવાણ કેમ ? | VTV Digital #Mahamanthan #PoliceImage #TrustIssues #SystemDebate #LawAndOrder #Equality #PublicVoice #GujaratNews #VTVDigital #VTVNews
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शिक्षा का बजट बनाम बाप की मजबूरी असली तस्वीर क्या है? पिछले दो दशकों में भारत में शिक्षा का स्वरूप धीरे-धीरे लेकिन गहराई से बदला है। 2004 से 2014 के बीच शिक्षा को एक अधिकार के रूप में मजबूत करने की कोशिश हुई। सरकारी स्कूलों, मिड-डे मील और RTE जैसे कदमों ने यह साफ संदेश दिया कि पढ़ाई हर बच्चे का हक है। इसके बाद के वर्षों में तस्वीर बदलती नजर आई। सरकारी निवेश सीमित रहा और इसी खाली जगह को प्राइवेट सेक्टर ने तेजी से भर दिया। आज शहरों से लेकर छोटे कस्बों तक प्राइवेट स्कूल क्वालिटी एजुकेशन के नाम पर एक बड़ा बाजार बन चुके हैं। इसका असर साफ दिखता है। आज एक आम परिवार को अपनी आय का बड़ा हिस्सा शिक्षा पर खर्च करना पड़ रहा है। फीस के अलावा किताबें यूनिफॉर्म ट्रांसपोर्ट और डिजिटल लर्निंग के नाम पर नए खर्च जुड़ गए हैं। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि स्कूल अब सिर्फ पढ़ाने की जगह नहीं रहे। वे एक पूरा इकोसिस्टम बन चुके हैं, जहाँ किताबें, ड्रेस और कई बार डिजिटल प्लेटफॉर्म भी वही तय करते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर मिडिल क्लास पर पड़ता है। वह न पूरी तरह सरकारी सिस्टम पर निर्भर रह पाता है, और न ही प्राइवेट सिस्टम को आसानी से वहन कर पाता है। यह भी सच है कि बदलाव पूरी तरह नकारात्मक नहीं हैं। डिजिटल एजुकेशन और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर ने सीखने के नए अवसर भी दिए हैं। लेकिन असली सवाल यही है क्या ये सुविधाएँ सबके लिए हैं या सिर्फ उनके लिए जो इन्हें खरीद सकते हैं? आज शिक्षा एक निवेश तो है लेकिन धीरे-धीरे यह एक ऐसा बोझ भी बनती जा रही है, जिसमें सपने बच्चे देखते हैं और कीमत उनके माता-पिता चुकाते हैं। आखिर में सवाल किसी एक सरकार का नहीं है। सवाल उस पूरे सिस्टम का है जहाँ सरस्वती का मंदिर धीरे-धीरे मार्केट का मॉडल बनता जा रहा है। #EducationReality #MiddleClassTruth #SystemDebate
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