मन ही हमारे दुख-सुख का और ऊंचाई-नीचाई का, पतन और उत्थान का कारण है। ना ग्रह शास्त्र कारण है, ना प्रारब्ध वेग कारण है, ना ज्योतिष कारण है। हमारा मन ही हमारे पतन और उत्थान का कारण है। ये श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कंध में है।
और गीता कहती है, "आत्मैव आत्मनो बंधु।" मनुष्य अपने आप का बंधु है और अपने आप का शत्रु।
तो पुरुषार्थ ये करना है कि मन में जो आए वो खा लिया, जो आए वो बोल दिया, जैसा आए वो कर लिया, तो अपने आप का सत्यानाश करने वाला होगा।
अगर मन के आगे धर्मशास्त्र, ईश्वर आज्ञा, समाज व्यवस्था रखकर, नियंत्रित करके मन को चलाया जाए, तो मन आपको ईश्वरमय कर सकता है। यहां पुरुषार्थ है।
#AsharamjiBapu