'मजबूरी का नाम महात्मा गांधी'—यह कहावत अभिजात्य वर्ग की किताबों से नहीं, लोक के अनुभव से उपजी है। जब भी जन-समर्थन का 'बल' घटता है, तो बड़े-बड़े सूरमा गांधी नाम की माला जपते नजर आते हैं। असल में यह गांधीवाद नहीं, बल्कि 'इमोशनल ब्लैकमेल' की वो पुरानी 'बुजुर्ग तकनीक' है जिससे अपनी बात जबरन मनवाई जाती है।
विडंबना देखिए, जिस पिता ने बच्चों को दस बार ब्लैकमेल कर बात मनवाई हो, उसे अंत में सम्मान नहीं मिलता; गांधी के पारिवारिक संबंध इसका प्रमाण हैं। आज की राजनीति में भी यही 'निंजा तकनीक' जारी है। दल कोई भी हो, संविधान में गांधी को रखते हैं और व्यवहार में वही पुराने इमोशनल ब्लैकमेल के ट्रिक्स! समर्थक भी इसी नक़ल में मग्न हैं।
UGC और NEET पेपर लीक पर सन्नाटा क्यों है? साहब की सुपुत्री तो अमेरिकी लॉ डिग्री लेकर 'सेट' हो गई, पर आम आदमी के बच्चे का क्या? हम पाई-पाई जोड़कर मकान इसलिए बनाते हैं ताकि बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो, कोचिंग का लाखों का खर्च, बच्चों को घर से दूर भेजने की तकलीफ इसी लिए झेली थी न? लेकिन शिक्षा व्यवस्था और पेपर लीक पर सवाल उठाने के बजाय पार्टी ने कहा, इसलिए पेट्रोल बचाओ, सोना मत खरीदो पर नाच रहे हैं।
याद रखिए, 'स्वर्ग' और 'बागवान' जैसी फिल्में सिर्फ पर्दे पर नहीं, असल जिंदगी में भी घटती हैं। जब पार्टी की ही अगली पीढ़ी पेट्रोल-डीजल बचाओ के आह्वान को अनुसना करके, 90 गाड़ियों का काफिला निकालती है, तब मजबूरी में 'प्रधानसेवक' को गांधी याद आते हैं। सोचने पर गब्बर सिंह टैक्स (GST) नहीं लगता, स्वर्ण की तरह टैक्स बढ़ा भी नहीं, इसलिए सोचिए—आज आप बच्चों के हक के बजाय पार्टी का हित चुन रहे हैं, कल बच्चे इसे भूलेंगे नहीं!
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