मैं मराठी या कन्नड़ भाषा विवाद को एक राजनीतिक नज़रिए से देखता हूँ, लेकिन जब बात तमिल भाषा की आती है तो उसे एक सिस्टेमेटिक दृष्टिकोण से देखना पड़ता है। तमिलनाडु में जो स्थिति थी, वही अब पश्चिम बंगाल में दोहराई जा रही है। बांग्ला भाषा को एक राजनीतिक मुद्दे के रूप में रखा जा रहा है, लेकिन अब यह एक रणनीतिक और सिस्टेमेटिक रूप लेने लगी है। भाषा का ऐसा राजनीतिक और सिस्टेमेटिक मिश्रण इस देश ने पहले कभी नहीं देखा।
आज की स्थिति में यह पहचानना बहुत मुश्किल होता जा रहा है कि बांग्ला बोलने वाला व्यक्ति पश्चिम बंगाल का है या बांग्लादेश का क्योंकि अगर वह व्यक्ति देश के अन्य हिस्सों में जाने से पहले बंगाल में अपना आधार बना लेता है, तो वह यह साबित कर सकता है कि वह बांग्लादेशी नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल का निवासी है।
मुद्दा इतना सरल नहीं है कि उसका समाधान राज्य स्तर पर हो सके। चुनाव आयोग इसमें अहम भूमिका निभा सकता था, लेकिन बिहार में जिस तरह से पूरी प्रक्रिया की अवहेलना हुई है, उसके बाद मुझे यकीन हो गया है कि लाखो तो क्या ये मोदी सरकार इस देश में लाखो क्या कुछ सो या कुछ हजार तक इललीगल नहीं ढूंढ सकती । जब कोई स्पष्ट प्रक्रिया ही नहीं है, तो कैसे ढूंढ पाएंगे, कैसे होगा?
इसलिए अगर कोई सोच रहा है कि इस देश से अवैध नागरिकों को निकाला जा सकता है, तो ये प्रक्रिया बता दे कि यह संभव कैसे होगा। मोदी
@narendramodi से न कोई प्रक्रिया बनेगी, न अमल होगा, और न ही कोई परिणाम निकलेगा।
जो झोला लेकर आया था, वही झोला लेकर चला जाएगा
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