Asst. Prof @RLAC_DU | PhD (Mass Comm) | Columnist & Bhojpuri Advocate | ICSSR Fellow ’18-20 | Ex TSI, SunStar, IOP @Bhoj_Bhoomi | Member @aakharbhojpuri

Joined April 2014
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इंडिगो के पटना फ़्लाइट के क्रू भोजपुरी में ब्रीफ़ करत बाड़ें ⁦@IndiGo6E⁩ के इ पहल सराहे योग बा. गोरखपुर, पटना, बनारस, कुशीनगर के यात्री लोग ख़ातिर भी भोजपुरी में ब्रिफिंग होई तो बड़ा निमन रही. निहोरा बा ⁦इंडिगो⁩ से कि ऊ एकरा ख़ातिर ठोस पहल करे. ⁦@aakharbhojpuri
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डॉ. देवेंद्र तिवारी (Dr. Devendra Tiwari) retweeted
ऑंतर के बात खुलि के बतावेला चेहरा मत पूछीं, का बवाल मचावेला चेहरा आँखिन से झर के लोर समुन्दर बने भले हुलसत हिया रहेला त गावेला चेहरा अइसन ना भूत चढल बा कपार पर खुद के ही आइना में डेरावेला चेहरा व्यवहार एगो-गीत ह बुझीं तनी ‘पराग’ गैरो के हित-मिति बनावेला चेहरा ! सूर्यदेव पाठक ‘पराग’
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जिनिगी - राधामोहन चौबे 'अंजन' हिम्मत मन में, बल बाँहिन में, यारी रहे जवानी से। मरद उहे ह जे लड़ि जाला, आन्ही से आ पानी से।। सागर में तूफान उठेला, झंझा भरल बयार चले उड़े पाल ‘हैया-रे-हैया’ माँझी के पतवार चले गरजे बादर, चमके बिजुरी, आसमान फाटे लागे उड़े पाल ‘हैया-रे-हैया’ माँझी के पतवार चले गरजे बादर, चमके बिजुरी, आसमान फाटे लागे उठे ज्वार करिया नागन जस, फन काढ़े लागे ‘हैया ! हैया, तूँ ही खेवइया’, अरजी औढ़रदानी से।। जेकरे बल से जिनगी जीये, उहे सहारा उठि जाला जवने घाटे खड़ा मुसाफिर, उहे किनारा लुटि जाला, जेकरे संग में जनम-मरन के कसम लोग हरदम खाला, ऊहे संगी दूर कहीं जब, आँखिन से अलगा जाला, सीप नयन के मोती उपजे, गुजरल मधुर कहानी से।। जिनगी ह संग्राम, हवे वरदान, हवे अनजान शोक-दर्द ह खेल-तमासा, करतब ह ई जादूगर ई रहस्य ह, मधुगीत ह, मौका ह कठिनाई के प्यार कर जिनगी से भइया, हिम्मत का आसानी से।। मरदे पर कि बरधे पर, संकट के बादल बरसेला अग्नि-परीक्षा से धरती के, छाती ज्यादे हरसेला आफत ह पतझार उठत बा फागुन के जे दूत पवन समझीं कि आ रहल बहुत जल्दी सुख के सावन अँकवार में भरि के चूमबि सुख सपना मनमानी से।। आँखि हवे सनकाहिन, एकरा के कहीं मत जाये दीं जाई त अझुरा जाई, ना मानी, मति बऊराये दीं के ‘अंजन’ जिनगी भर राखी रही सिंगार जवानी भर उमर ढले पर हँसी जमाना, क्षेपक बीच कहानी पर ले ल दिल उपहार प्यार के, अपने अमर निशान से।।
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नागर नैया जाला कालेपनिया रे हरी ! गीत के लिंक - youtu.be/9aArqU91y8o चंदन के आवाज में एह गीत के हम बहुत पहिले सुनले बानी, बाकिर आज युट्युब प एकर नोटिफिकेसन मिलल ह त लूप में सुनत बानी आ एक हाली फेरु से ओह किताबिन के पढ रहल बानी जहाँ सुंदर के बारे में एह गीत के बारे में लिखाइल बा । क गो अलग अलग कहानी बा, बाकिर एगो बात सांच बा कि सुंदर रहली आ नागर रहले आ बात मिर्जापुर – बनारस के ह । घटना के समय काल 1772 आ बाद के ह । इ घटना राजा चेतसिंह आ वारेन हेस्टिंग्स के समयकाल के ह । मिर्जापुर में एगो मिसिर रहले मनबढू । अंग्रेजन के दलाल रहले आ गली के गुंडा । अंग्रेजन के दलाली करत-करत बदमाशी बढल त सगरे चारो ओर आपन गुंडई फइलावे लागल । अंग्रेजन के समर्थन से मिसिर नाव के उ आदमी अति करे लागल । इ उ समय रहे जब अंग्रेजन के विरोध के शुरुवात भइल रहे । मिसिर , सुंदर नाव के लइकी के केहू नीमना के घर से बरिआरी उठा लेहले आ ओह लइकिया के कोठा प बेच देहले आ संगे-संगे अपना गुंडन के दलो में राखे लगले । काशी में तब क गो अखाड़ा आ पहलवानी के क गो अलग अलग समूह रहे । ओहि में एगो नागर पहलवान रहले । पुरा नाव रहे “तलवरिया दाताराम नागर” । नागर पहलवान , अंग्रेजन के खिलाफत करसु । उ क गो अंग्रेजन के दलाल के दाना दवाई कइले रहले, ठेठवले रहले । मिसिरो के दल प आक्रमण कइले आ जीत गइले । बाद में फेरु मिसिर , नागर पहलवान प आक्रमण कइले आ एह आक्रमण में मिसिर मरा गइले । नागर पहलवान फेर सुंदर के अपना संगे राख लिहले । संगे का रखले, मिर्जापुर में सुंदर के गायन के शिक्षा के बेवस्था कइले । सुंदर के गीत-गायन के शिक्षा भा अभ्यास मिर्जापुर के गावे वाली बाई जी लो से मिलल । अंग्रेजन के क हाली आ हिंसात्मक तरिका से विरोध के चलते आ अंग्रेजन के सहजोगी मिसिर के मारला के बाद नागर पहलवान प केस भइल आ बाद में नागर पहलवान के काला पानी के सजा भइल । नागर पहलवान अपना अखा‌ड़ा वाला लोगन से सुंदर रहे-खाये के बेवस्था करे के कहि के काला पानी प चल गइले । चुकि सुंदर नीमना घर के पढल लिखल लइकी रहली, इनिकर भोजपुरी गीत . पद, छंद बहुत उच्च कोटि के आ गहिराह माने वाला रहल बा । मूल रुप से इ गाई - गाई के गंगा जी के घाट प आपन बात के गीत के माध्यम से कहसु । सुंदर के जिनगी के यात्रा अलग अलग पड़ाव प रहल बा । शुरुवाती समय ठाट से पढाई-लिखाई वाला रहल बा, फेरु कोठा प रहे के परल, अखाड़ा आ गुंडन के गिरोह में रहे के परल आ नागर के कालापानी के सजाय के बाद वियोग के काल । एह सांच कहानी के हम पहिला हाली दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह जी के किताब “ भोजपुरी के कवि और काव्य” में पढले रहनी आ दुसरका बेर शिव प्रसाद मिश्र “रुद्र” काशिकेय । दुर्गाशंकर प्रसाद जी वाली किताब, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से प्रकाशित बिआ आ “ काशिकेय” जी वाली किताब राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित किताब ह । चंदन के आवाज में एह गीत के माने एहि से बुझ सकेनी कि शिव प्रसाद मिश्र “रुद्र” काशिकेय जी के किताब में सुंदर के कहानी वाला जवन लेख बा ओकर शीर्षक ह – नागर नैया जाला कालेपनिया रे हरी ! सुंदर के नाव क जगह सुंदरीबाई, सुंदरी, सुंदर वेश्या आ सुंदर के नाव से लिखाइल बा । काशिकेय जी सुंदर नाव लिखले बानी आ कसबिन शब्द के प्रयोग कइले बानी । असल में भोजपुरी में अइसन कुल्ह अल्ह्ड अलहदा अजगुत कहानी बाड़ी स, गीत बड़ुवे जवनन से हमनी के भेंट नीमन से भइल नइखे । एह कुल्ह गीतन खातिर अब अपील कइल उचित नइखे काहें जब लागी, बुझाई त लोग अपने से सुनीं । - नबीन कुमार (फोटो में - AI से बनल एह पोस्टर में जवन स्क्रीन शॉट लउकत उ असल में काशिकेय जी के किताब "बहती गंगा" से ह । इ गीत ओह लेख के हिस्सा ह जवना के शीर्षक ह " नागर नैया जाला कालेपनिया रे हरी !" )
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जगजीवन सिंह के भोजपुरी अइसन बा के बढियाँ बढियाँ लोग जे भोजपुरी बोले में अझुराला, लजा जाइ, पकिस्तान से पटना इंकार बाबूजी आईल रहलन आ बिहार के मय भासा बोललन । बिहार में रहकर बिहार के लोग के रोजगार देवे वाला जगजीवन जी के कहानी के एक हिस्सा सुनीं जा ।
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सजाउंगा लुट कर भी तेरे बदन के डाली को (एह लेख के एह फोटो से कवनो जुड़ाव नइखे बाकिर हं इ लेख भोजपुरी भाषा से जरुर जुड़ल बा । ) जगन्नाथ जी के किताब ' भोजपुरी गजल के विकास यात्रा ' पढत घरी एगो बात जगन्नाथ जी के लिखल पढे के मिलल ह । उहाँ के लिखत बानी कि - " तेग अली 'तेग' के बाद भोजपुरी गजल तकरीबन 40-50 साल के शुन्यता से गुजरल । दरअसल इ जमाना हिन्दी निर्माण के रहे । सबका एके धुन एके निसा सवार रहे कि केह तरे हिन्दी के समुन्नत कइल जाउ । एहि से भोजपुरी लेखन पुर्णतया उपेक्षित रहल । " हम कबो कबो सोचेनी कि देवाक्षर चरित , बदमाश दर्पण , बिरहा नायिका भेद 1900 से पहिले आ गइल रहे , एगो नाटक रहे एगो गजल रहे आ एगो काव्य संग्रह रहे फेरु अइसन का हो गइल कि भोजपुरी में धुंआधार रचना भइला के बादो ओतना लाइमलाइट में ना आइल ? गजल में त बहुत लम्बा समय ले सन्नाटा रहे बाकि अउरी क्षेत्र में ओतना लाइम लाइट ना मिलल जबकि बटोहिया, फिरंगिया, बिदेसिया से ले के असंख्या रचना भोजपुरी में एह दौरान मिलल । तीन गो बात के एजुगा चर्चा जरुरी बा । पहिला - कतना दुखद बात बा कि एगो भाषा जवना के लमहर आ पुरहर इतिहास बा ओह भाषा (भोजपुरी ) के लोग आपन मय लगा दिहल एगो भाषा (हिन्दी) के सजावे सरिहारे में आ आज ओह सजल संवरल भाषा के कमाई खाए वाला लोग, भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता के नाव प झुठ प झुठ लिख रहल बा ? ना खाली तथ्यात्मक झुठ लिखा रहल बा बलुक फ्राडगिरी हो रहल बा हिन्दी के नाव प आ इहे ना , हिन्दी के बाघ कहि के हिंसको बना रहल बा लो आ भोजपुरी के बकरी कहि के उसुका रहल बा लो। बिल्कुल जवन खप खपा दिहल गइल उ खप-खपा दिहल गइल बाकिर आज भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता पुरहर विकास आ बेहतर बनावे खातिर भोजपुरिया लोगन के मांग प काहें कुछ लोगन के मांग धोआ जाता ? दुसरा - भोजपुरी के बात, भोजपुरिया लो से, भोजपुरी में काहें नइखे होत? हम बात लिखित आ मौखिक संवाद, दुनो के कहत बानी । आज हम दिनेश लाल यादव निरहुआ के नामिनेसन के विडियो देखत रहनी ह, जतना भोजपुरी के कलाकार लोगन के जुटान भइल रहल ह मय के मय जाना दू लाइन भोजपुरी में बोले में दांत चिआर देत रहल ह लो । कुख्यात आ खुंखार गायक पवनो सिंह के उहे हाल रहल ह । भोजपुरी के कलाकार से ले के साहित्यकार, संस्था वाला लो के इहे हाल बा । इ मय के मय लो, भोजपुरियो के बात हिंदिये में करेला लो । आखिर काहें ? कवन मजबूरी बा ? तीसरा - आखिर 'जय भोजपुरी जिआ भोजपुरी' कहि के कहिया ले काम चली ? सुप्रसिद्ध हिंदी आ भोजपुरी साहित्यकार स्व. डॉ. विवेकी राय जी लिखत बानी कि " एह भाषा (भोजपुरी) में जतना पत्र-पत्रिका किताब आदि के प्रकाशन हो रहल बा उ अव्यव्सायिक रुप से विशुद्ध सेवा-भाव से हो रहल बा । दुसर बात कि कइ गो सरकारी मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय भाषा के तुलना में गुणात्मक, गरिमा से भरल , परिमाण विस्तार बेसी बा । अलग अलग विषयन प नाना प्रकार के दर्जनन गो से बेसी पत्र पत्रिका आ कइ हजार किताबिन के प्रकाशन एह भाषा के जीवंतता के देखा रहल बा । एहि जीवन शक्ति प आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी एह भाषा के ' सोगहग भाषा' कहले बानी त डॉ. शिव प्रसाद सिंह जी ' कड़ेर भाषा ' कहले बानी । " बांस बड़ा लचेला , बाकिर बहुत कड़ेर होला आ बांस सोगहगो होला । भोजपुरिया क्षेत्र में बांस के लउर, बांसे के बीचे गेल्ह के लउर के चीकन कइल जाला। ओह लाठी प भोजपुरिया लोग करुआ तेल पिआवत रहेला । ग्रियर्सन ओहि लाठी - लउर के भाषा के बात अपना ऐतिहासिक रिसर्च में कइले बा‌ड़े । रिसर्च का 1903 में जवन भाषा सर्वेक्षण उनुकर आइल त लउर के एगो गीत के भोजपुरी एंथम कहि के भोजपुरी भाषा वाला हिस्सा के शुरुवात कइले बाड़े । जब अतना कुल्ह आंखि के सोझा बा तबो खुलेआम बेईमानी काहें हो रहल बा ? आखिर कब ले लोग गुंगी कछा के रही ? कब ले रसरी आई जाई आ आपन चिन्हासी छोड़त रही ? का भोजपुरी के करम जिनगी भर रगराये के बा ? का भोजपुरी के नावे हिन्दी के सजावे संवारे के ही लिखाइल बा ? इ त करम फूटल कहाई नू ? भोजपुरी आ हिंदी के विद्वान मुक्तेश्वर तिवारी 'बेसुध' जी अपना किताब में लिखले बानी कि ' भोजपुरी लोककथाओ की तुलना हम वैदिक उपाख्यानो से कर सकते हैं । बहुत संभव है कि वैदिक उपाख्यानो की उत्पति इन लोककथाओ से हुई हो । भोजपुरी लोककथाओ में गद्य-पद्यमय चम्पूशैली वैदिक उपाख्यानो का ही अनुकरण है। ' गांधी जी हिंदी के राष्ट्रभाषा मानला के बादो अपना मातृभाषा गुजराती में सत्यानु प्रयोग लिखत बाड़े, रविंद्रनाथ टैगोर हिंदी के राष्ट्रभाषा मानला के बादो बंगला में गीतांजलि लिखत बाड़े आ दुनो किताब संवसे विश्व में सर्वश्रेष्ठ भारतीय किताब कहात बाड़ी स। बाकिर भोजपुरिया लो के देख लिहीं, भोजपुरियो के बात भोजपुरी में नइखे लिखत। (नोट- आधिकारिक रुप से भारत के कवनो राष्ट्रभाषा नइखे, हिंदी राजभाषा ह।) का एह कुल्ह तथ्यन के तोपि दिहल जाउ ? का जवन सोझा आ रहल बा लउकत बा ओह से मुह फेर लिहल जाउ ? सवाल नया घर बनावे के नइखे , सवाल बा कि जवन हवेली , कई मंजिला इमारत खाड़ भइल बिआ एह के ढाहि दिहल जाउ ? इ त भोजपुरिया लोगन के सोचे के बा । - नबीन कुमार
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गुमनाम नदी की मृत्यु पर भी हमें थोड़ा-सा शोक प्रकट करना चाहिए। —अनुपम मिश्र
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‘अदहने हवे जिनगी’ रामनवल मिश्र ‘नवल’, गोरखपुर जनपद के कवि हईं। ‘कछार’ के कवि। सही मायने में किसान कवि। शतायु साहित्यकार रामदरश मिश्र जी के बड़ भाई। रामदरश जी के लेखकीय आभा में ‘नवल’ जी के मकबूलियत कहीं हेरा गइल। बाकिर उहाँ के बहुत समर्थ कवि रहनी। मानवीय संवेदना, मनोभाव के बहुत महीनी के साथे उहाँ के दर्ज कइले बानी। गँवई जिनिगी के सूक्ष्म अनुभूति उहाँ के रचना में जीयतार बा। मनई के मनोभावन के प्रामाणिक चित्रण भइल बा। संगे-संग गँवई भारत के दुख, दर्द, तकलीफ आ आशा के बीच संतुलनो बा। ‘नवल’ जी के साहित्यिक अवदान, गँवई जिनिगी के माटी के सोन्ह खुशबू आ ओकरे में रचल-बसल जीवन संघर्ष आ उम्मेद के भी प्रतीक बा। गाँव-गिराँव कऽ गोद में पलत जीवन कऽ सच्चाई भी उजागर भइल बा। उहाँ के रचना संसार में गँवई परिवेश कऽ जीवंत छवि—खेत, खलिहान, मेहनतकश किसान आ उनकर अनकही व्यथा—सहजता से उभरेला। ‘नवल’ जी जिनिगी के संघर्ष, दुख के खाली पीड़ा के रूप में ना, बलुक जिनिगी कऽ गहन अनुभूति के रूप में परोसले बाड़न। जब रउआ उहाँ के सृजन संसार, कविता से गुजरऽब तऽ रउआ एकर अनुभव होई। उहाँ के कविता, पाठक के आत्मचिंतन बदे प्रेरित करेले। उम्मेद कऽ किरण भी बिखेरेले। इ बतावले कि कठिनाई के बादो जिनिगी संभावना से भरलऽबिया। नवल जी कऽ भाषा सरल, प्रवाहमयी आ भावना से ओत-प्रोत बा। पाठक के हृदय के सहजे छुएले। उहाँ कऽ कविता खाली साहित्यिक कृति भर नइखे, सामाजिक यथार्थ आ मानवीय संवेदना का दर्पण भी हऽ। सब लोग भोजपुरी से कुछ लिहले बा, ‘नवल’ जी जइसन कवि, भोजपुरी के बहुत कुछ दिहले बा। नया बिम्ब। मुहावरा। बावजूद एकरे उहाँ के गोरखपुर मंडल से बहरि के लोग खातिर ‘अनचिन्हारे’ रहनी। उहाँ पऽ बहुत चर्चा नाहि भइल। हालाँकि चर्चा-परिचर्चा होखे के चाहत रहल हऽ। आजु गैरखेमाबाज कवियन के शृंखला के 21वीं कड़ी में ‘नवल’ जी के एगो रचना—‘अदहने हवे जिनगी’ पऽ बात होई। फिलहाल रउआ एह रचना के तनिका देखीं— ‘मोरे बदे बनि गै लवरि क चिनगी परि गै खदकते अदहने हवे जिनगी आस अगियारी अस आगि में जरेला साँस साँस करजा क गड़हा भरेला पनके न देला खोंट लेत सब साग नियर हम तऽ हो गइली रहिलवा कऽ फुनगी तीर नियर लागि जाला केहू के बतिया दिन क न चैन ना आवे नीनि रतिया चाकी अस पाथर भइलि बाटे छतिया दरि लऽ केराव चना उरिद मूँङ भिनगी गइलीं भुजाइ जइसे भउरा क गंजी सपना ह भइल बा रहरि जइसे बंझी साधि हवे भइलनि गुलरिया क फूलवा भागि मोर भूसी जस कहिया ले सुनगी हाल त उहे बा जस हवे मधु माछी मरि मरि के सिरजेले मधु दिनो राती चाटे खाये पाये ना दिखाइ के लुआठी काटि मधु छतवा क लेत पंच बानगी’ ‘नवल’ जी कऽ इ कविता गाँव के मनई के जिनिगी के कठोर सच्चाई के सोझा लावऽतिया। ‘कछार’ के लोगन के रोज़मर्रा के जद्दोजहद अउर उनका जीवटता के संवेदना के साथे बयान भइल बा। कविता कऽ भाषा आ शैली में बोलचाल के परंपरा के साफ छाप बा। इ आत्म-संवाद के लोक-संवाद में बदल देता। एकर बनावट आसान होखे के बावजूद असरदार बा। गँवई जिनिगी के आत्मअनुभव के स्तर पर पेश कइल गइल बा। कविता के पहिलका पंक्ति से ही साफ हो जाई कि कवि अपने आसपास के कठिनाई के गहिराई तक महसूस करऽता— ‘मोरे बदे बनि गइल लवरि क चिनगी परि गइल खदकते अदहने हवे जिनगी’ नवल जी, एहिजा जिनिगी को ओही अवस्था के चित्रित कइले बाड़न, जहवाँ बाहरी परिस्थिति भा दबाव पहिले से कमजोर पड़ गइल मनई के अउर तेजी से खत्म करे के कोशिश करऽता। इ परिस्थिति सामाजिक, आर्थिक भा भावनात्मक दबाव कुछुओ हो सकऽता। गरीबी, शोषण भा मानसिक तनाव। मनई कऽ अउर गहिराह अंधेरा में धकेल देला। ‘नवल’ जी कऽ इ पंक्ति खाली व्यक्तिगत पीड़ा तक सीमित नइखे। समाज के ओह वर्ग के व्यथा भी दर्शावऽतिया, जवन आर्थिक तंगी, सामाजिक उपेक्षा आ मानसिक दबाव में जीयऽता। इ कुछ ओइसने दृश्य बा जहवाँ जिनिगी, लउरी कऽ चिनगारी बन गइल बिया। अचके चूल्ह से छिटक कऽ लागल होखे। इ चिनगारी छोट बिया बाकिर खतरनाक बिया। अइसन लागऽता कि ऊ सब कुछ जला के राख कर दिहलस। एहिजा ‘खदकते’ आ ‘अदहने’ जइसन शब्द जलन आ तबाही के तीव्रता देखावऽता। ‘नवल’ जी जिनिगी के एगो अइसन अप्रत्याशित आ दुखद हालत से जोड़त बाड़न, जहवाँ छोट-मोट घटना (चिनगारी) बड़ नुकसान के कारण बन जाले। इ अनिश्चितता आ कष्ट मनई के लाचार, बेबस बान देले। कवि के कहनाम बा कि जिनिगी ‘अदहन’ (खौलऽत पानी जइसन) बा, जे बिना कवनो चेतावनी के जरावऽतिया। अचानक आ बिना सोचे-समझे दुख, जलन भा तबाही ले आवऽतिया। अइसन अप्रत्याशित घटना, मनई के तइयार होखे के मौका नइखे देत। एगो अइसन आग, जे अचके भड़क उठत बा आ सब कुछ बदल देत बा। कवि के इ नजरिया जिनिगी के नाजुकपन आ ओकरे अप्रत्याशित चुनौती के देखावऽता। ‘नवल’ जी, एहिजा साधारण गँवई जिनिगी से लिहल गइल एगो दृश्य (चूल्हा आ अदहन) चुनिके गहिराह दार्शनिक आ भावनात्मक अर्थ व्यक्त कइले बाड़न। इ पंक्ति पाठक के इ सोचे पऽ मजबूर करऽतिया कि का समाज आ परिस्थिति वाकई अतना क्रूर हो सकऽतिया कि उ केहु कऽ जीवन-इच्छा के ही खत्म कर दे। ओहिजे ‘लवरि क चिनगी’ के चित्रण गाँव के जिनिगी के उहे कठिनाई के सोझा लावऽता, जहाँ छोट-छोट आशा भी कठिनाई के भट्ठी में जलिके राख हो जाला। ‘आस अगियारी अस आगि में जरेला साँस साँस करजा क गड़हा भरेला’ एहिजा कवि अपना सपना-आशा के आगि में जरे आ कर्ज के बोझ से दबल जिनिगी के दुख के बयान करऽता। ‘अगियारी’ आ ‘गड़हा’ जइसन शब्द गाँव के परिवेश के चुनौती, आर्थिक तंगी आ सामाजिक दबाव के उजागर करऽता। एहिजा कविता के भाव-भूमि महज निजी भर नइखे बलुक समुदाय के स्तर कऽ पीड़ा के भी प्रतिबिंबित करऽता। कविता में कछार के लोगन के जिनिगी आ उनकर संघर्ष खास तौर से उभरत बा। कछार, नदी के किनारा के उपजाऊ इलाका हऽ। तिलहन आ रवि के फसल ओह माटी पऽ खूब उपजेला। ओहिजा के लोगन के जिनिगी प्रकृति के अनिश्चितता आ आर्थिक कमी से जूझत बीतेला— ‘पनके न देला खोंट लेत सब साग नियर हम तऽ हो गइली रहिलवा कऽ फुनगी’ एह लाइन में कवि के जोर एही बात पऽ बा। मेहनत के बावजूद जिनिगी के बुनियादी जरूरत पूरा नइखे होत। ‘खोंट लेत सब साग नियर’, लोग पनके नइखे देत। साग नियर खोंट लेता। जेकर मन करऽता, उहे तुड़लेता। ‘रहिलवा कऽ फुनगी’ में शारीरिक आ मानसिक थकान के बोध होता। एहिजा कविता के अनुभूति गहिराह आ मार्मिक बा। कछार के लोगन के रोज़ के जद्दोजहद सोझा आवऽता। कवि के इ बयान महज उनका निजी तकलीफ के ही नइखे दिखावऽत, समुदायिक पीड़ा के भी व्यक्त करऽता। जवना से उ एकरूप बा। ओहिजा कविता के शिल्प एकर बड़वर ताकत बा। ‘नवल’ जी, खाँटी शब्दन कऽ इस्तेमाल कइल बाड़न, जे कविता के जीवंतता देता। ‘तीर नियर लागि जाला केहू के बतिया दिन क न चैन ना आवे नीनि रतिया’ एहिजा मानवीय संवेदना बहुत प्रभावी तरिका से व्यक्त भइल बा। ‘तीर नियर’ आ ‘बतिया’ जइसन शब्द लोक-भाषा के सहजता के दिखावऽता। कविता के पाठक के करीब लावऽता। कविता के लय आ तुकबंदी भी असरदार बा। हर पंक्ति में एगो भीतरी संगीतमयता बा। बोलचाल के परंपरा के खासियत कऽ उजागर करऽता। इ शिल्प, कविता के सुने में मधुर बनावऽता। एके भावनात्मक असर के गहिराह करऽता। एहिजा जटिल शब्दन के बजाय आसान आ सहज ढंग से बात कहाइल बा। इ एकरे ताकत के बढ़ावऽता। ओहिजे एह कविता में इस्तेमाल भइल बिम्ब बहुते जीवंत आ ताकतवर बा। ‘चाकी अस पाथर भइलि बाटे छतिया / दरि लऽ केराव चना उरिद मूँङ भिनगी’ में जिनिगी के कठोरता के चक्की के पत्थर से तुलना कइल गइल बा। इ बिम्ब गाँव के जिनिगी के ओइसने दुख के दिखावऽता, जे हर दिन मेहनत में खप जाला। ‘केराव चना उरिद मूँङ भिनगी’ के इस्तेमाल मुहावरा के रूप में भइल बा। छाती पऽ मूंग दरल बड़ा मशहूर मुहावरा हऽ। मूँग दरे के ओही प्रक्रिया के जेकरे छाती पऽ इ दरल जाता, ओकर पक्ष भा भाव एह लाइन में महसूस कइल जा सकऽता। भोक्ता के पीड़ा एहिजा द्रष्टा सीधे-सीधे महसूस करऽता। इ कविता के एकरे परिवेश से जोड़ऽता। ‘गइलीं भुजाइ जइसे भउरा क गंजी सपना ह भइल बा रहरि जइसे बंझी’ एहिजा कवि, अपने जिनिगी के तमाम कष्ट, परेशानी झेले के बारे में बतावऽता। एह क्रम में कइसन अनुभव होता, ओकरे के अलाव में भूजल सकरकंद के रूपक से समझल जा सकऽता। जीवन के जद्दोजहद में उनका सपना के का दशा होता? उ खुदे बतावऽताड़े। उनकर सपना के उहे दशा होता, जइसे कवनो ‘रहरी के बंझा पौधा’ होखे। खूब हरियर। खूबे विस्तार। बाकिर ओकरे में फूल नइखे धरऽत, रहरी कऽ छेमी कहाँ से लागी? ‘बँझा रहर’ के जरिए बयान कइले बाड़न। इ बिम्ब कविता के दृश्यात्मकता देता। पाठक के मन में गहिराह छाप छोड़ऽता। कवि के असल ताकत एही में बा। ऊ रोज़मर्रा के चीज आ प्रकृति के तत्व से भावना के जोड़े में सक्षम बाड़न। इ कविता के खासियत के उजागर करऽता। ओहिजे कविता के अनुभूति गहिराह आ सार्वभौमिक बा। बतौर बानगी रउआ एह लाइन के तनिका देखीं— ‘साधि हवे भइलनि गुलरिया क फूलवा भागि मोर भूसी जस कहिया ले सुनगी’ कवि अपना साध या मन के चाहत के बारे में बतावल चाहत बाड़न। उ गूलर के फूल से तुलना करत बाड़न। ‘पिया भइले गुलरी के फूल।’ उनकर साध भी ‘गुलरी के फूल’ हो गइल बा। गूलर के फूल लगभग अदृश्य होखेला। लोक धारणा बा कि अगर ‘गुलर के फूल’ मिल जायी, तो सब साध पूरा हो जायी। पर, इ अप्राप्य बा। मिलबे ना करी। ओहिजे ‘भूसी’ के इस्तेमाल कवि के मनोदशा के दर्शावऽता। भाग्य के फल मिले के कवनो उम्मेद नइखे। लगभग निराशा के स्थिति बा। एहिजा आत्म-संवाद के शैली में अपनावल गइल बा। इ पाठक के भी आत्म-चिंतन खातिर प्रेरित करऽता। कवि के इ पीड़ा खाली निजी नइखे। उ समुदायिक भी बा। उ अभाव आ उपेक्षा में जियत बा। कविता के इ अंश ओही संवेदनशीलता के दिखावत बा, जे ‘नवल’ जी के रचना के पहचान हऽ। उहाँ के अनुभूति में गहराई बा। इ पाठक के जिनिगी के सच्चाई से जोड़ऽता। एके कठोरता के महसूस करे खातिर मजबूर करऽता। ‘हाल त उहे बा जस हवे मधु माछी मरि मरि के सिरजेले मधु दिनो राती चाटे खाये पाये ना दिखाइ के लुआठी काटि मधु छतवा क लेत पंच बानगी’ एहिजा ‘नवल’ जी, मधुमक्खी के जरिए मेहनतकश लोगन के हालत के चित्रित कइले बाड़न। मधुमक्खी के मेहनत आ ओकर शोषण जिनिगी के बड़हन सच्चाई के उजागर करऽता। ‘पंच बानगी’ के इस्तेमाल सामाजिक ढाँचा आ शोषण के तरफ इशारा करऽता। मेहनत के फल मेहनत करे वाला के नइखे मिलऽत। एहिजा कविता के परिवेश के बारीकी से उकेरऽल बा। पाठक के सोझा कछार के लोगन के जिनिगी जीवंत हो उठऽता। इ परिवेश कविता के मूल जड़ से जोड़ले राखऽता। एकरे भावनात्मक असर के बढ़ावऽता। असल में इ कविता के आजु के संदर्भ भी खास बा। भले इ गाँव के जिनिगी के कठिनाई के चित्रण करत बा, बाकी आजु के समय में भी प्रासंगिक बा। गाँव-शहर के बँटवारा आ आर्थिक असमानता आजो समाज के बड़ चुनौती बा। ‘नवल’ जी, एह कविता के जरिए ओह लोगन के आवाज़ के अभिव्यक्ति दिहले बाड़न, जे के मुख्यधारा के साहित्य में अक्सर अनदेखा कऽ दिहल जाला। इ जिनिगी के सच्चाई से रूबरू करावऽतिया आ सामाजिक संवेदना के प्रति जागरूक करऽतिया। कवि के इ कोशिश कि ऊ अपने समय के सच्चाई के शब्दन में ढाल सकें, कविता के कालातीत बनावऽता। खाली अपने समय के बात नइखे करत, बलुक आजु के संदर्भ में भी ओतने सार्थक बा। कविता के खासियत एकरे सच्चाई आ भावनात्मक गहराई में बा। ‘नवल’ जी गाँव के खाली देखले नइखन, बलुक उ जियले बाड़न। एही से उहाँ कऽ रचना में गाँव के जिनिगी बारीकी से समाइल बा। ‘अदहने हवे जिनगी’ में गाँव के जिनिगी के कठोरता, संघर्ष आ जीवटता के संवेदना के साथ परोसाइल बा। कवि के इ ताकत कि निजी अनुभव के सामाजिक संदर्भ में ढाल सके, उहाँ के रचना के खास बनावऽता। इ कविता खाली एगो रचना भर नइखे, बलुक एगो असल अनुभव बा जे पाठक के कछार के ओही जिनिगी से जोड़ऽता, जे कवि खुद जियले बा। एकर भाव-भूमि में गहिराह पीड़ा बा। साथे-साथ एगो अटूट जीवटता भी बा, जवन गँवई जिनिगी के असल पहचान हऽ। पुनश्च — अगर रउआ रामनवल मिश्र जी के रचना के पढ़े चाहतानी तो सर्वभाषा प्रकाशन से छपल बा।
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पर्यावरण दिवस प , लोक धुन प आधारित, सुप्रसिद्ध साहित्यकार गंगा प्रसाद अरुण जी के सम-सामयिक , गहिराह भाव ले ले एगो बेहतरीन रचना । पर्यावरण-गीत (लोक धुन पर) — गंगा प्रसाद अरुण नदिया के पनिया में घोरेल जहरीया हो कहाँ जाई सोना रे मछरिया आहो लोगे ! बनवाँ उजाड़ अपना लालच के मारल हो कहाँ नाची मोरनी-हिरनिया आहो लोगे! उपरी अकसवा में उड़े गैस-धुआँ-माहुर प्रान-वायु पाई का सँवरिया आहो लोगे! मटिया तेजाबी-रेह-रेत बने ऊसर हो का खाई प्रान के पहरुआ आहो लोगे! अंगना के गछिया कटईह जनि बाबुल हो कहाँ गायी मुनिया चिरइयाँ आहो लोगे! अबहुँ से चेतीं तनी सोचीं लोग-बाग सभे फिर चली कवनो ना उपइया आहो लोगे !
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ग्राम गीत - डॉ. जौहर शाफियाबादी गउंआ के मटिया में सोनवा फूलाला कि शहर में धूरा बिकाला तोहरा कइसे शहरिया सोहाला!! गउंआ से बसिया शहरिया में जाला, बोलऽ ना टटका भेंटाला? रहरी, मटरवा आ चनवा के कचरी, ताजा-ताजा अमृत बुझाला! तोहरा कइसे... सोन्हा-सोन्हा खूशबू, दवँरिया बघरिया के, सोना जस सरसो फूलाला रून-झुन बाजेला सनई के खेतवा से मुरई के पगरी बन्हाला! तोहरा कइसे... टूटही पलनिया में फगुआ आ चइता तऽ, गछुली में बिरहा गवाला बगिया में बोलेले कुंहुंकी कोइलिया कि बिरहा बसंत बुझाला तोहरा कइसे... अमवा, महुअवा से टपके मदन-रस, कोंचिआ, मोजरिया गोटाला पापी, पपिहरा के बिरहा के धुन में गोरिया के रहिया भुलाला! तोहरा कइसे... पकवा इनरवा पऽ पकड़ी का छइयाँ में, गरमी में गउंआ बटोराला जेठ-बइसखवा के तलफी भुभुरिया में, लड़िको नू पढ़े चलि जाला! तोहरा कइसे... गुल्ली-डन्टा, चकवा-चकइया के खेल जहां, संझा-पराती गवाला चिकवा में चिकपार, रण में बा नीति जहां, लुका-छुपी चोरवा धराला! तोहरा कइसे... भोरे- भोरे झांके साफ ललकी किरिनिया जहां, रतिया के चान अगराला मघवा में बघवा के धरे थरथरी जहां, भादो में कादो महाला! तोहरा कइसे.. चकवा-चकइया के नेहिया के गीत जहां, सुगवा-सुगनिया पोसाला मोरवा-मोरिनिया के नाँच देखी 'जौहर' के गउंए नू स्वर्ग बुझाला! तोहरा कइसे शहरिया सोहाला...
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मोती जोहत बानी - मिथिलेश गहमरी कांकर-पाथर-घोंघा-सितुहा भरल समुंदर टोहत बानी हमहूँ मोती जोहत बानी अनचितला में डोल गइल मन कर से छूटल सुधि के दरपन हर छन तलफत साँचल नेहिया झुलस रहल जिनिगी के मधुबन आग बुझावे खातिर बदरा माँगे अब सूरज से पानी हमहूँ मोती जोहत बानी काठ के उल्‍लू बोले लागल भेद हिरामन खोले लागल ध्‍यान लगवले बाटे बकुला सोन मछलिया डोले लागल पचरा गावत भूत नसावन, जबरी माँगत बा कुरबानी हमहूँ मोती जोहत बानी दूध भराइल कंचन गगरा लागि गइल गेहुँअन के पहरा सबकर प्रान परल साँसत में काँप रहल बा आल्‍हर जियरा गाँव-नगर में कर्फू लागल, अचके लुटा गइल राजधानी हमहूँ मोती जोहत बानी
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निहोरा ! भोजपुरी भाषा में गद्य लेखन 2.0 रउरा लेख के बाट जोहाता ! हाल दे भेजीं, पुरहर लिखि के भेजीं। भेजे के बेर ध्यान राखीं - 1. राउर लिखल होखे, पोस्टर भले AI में बा बाकिर राउर लेख AI के लिखल भा केहू दोसरा के लिखल ना होखे! 2. ⁠कम से कम 1000 शब्द के होखे, दू - अढाई हजार शब्द ले लिख सकेनी । 3. ⁠भाषा भोजपुरी होखे, आ पहिले प्रकाशित ना भइल होखे। माने कहीं छपल ना होखे । 4. ⁠भाषा के चयन संसदीय होखे, फुहर पातर ना भा जातिगत धार्मिक भेदभाव न फइलावत होखे । भेजे खातिर ईमेल करीं - aakharbhojpuri@gmail.com
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दुनिया भर में लोग बाग से धरम-करम के रिश्ता बा तोरा - हमरा बीच में पगली ! सात जनम के रिश्ता बा ।। धरती पर जब आइल बानी,पाहुन जइसन हम - रउरा माया-मोह, सवारथ-सपना , भाव-भरम के रिश्ता बा ।। मन से मन के रिश्ता के सब , रेशम - धागा टूट गइल अब त हमरा-उनका में बस कौल- कसम के रिश्ता बा ।। पत्थर दिल भी पत्थर के पूजत - पूजत भगवान भइल पत्थर से पत्थर के बीचे रूह-सनम के रिश्ता बा ।। मन से मन मिलते नइखे , तब आपन - ग़ैर कहाला का भाई भइला के बादो बस रीत - रसम के रिश्ता बा ।। झूठ- सांच के एह नगरी में , पांच बरस पर याद परल घूम - घूम के भूंक रहल बा , जात - धरम के रिश्ता बा ।। तंग इनायतपूरी जी संसार में अदमी - आदमी के अनचिन्हार भइला के बादो, कदम-कदम के रिश्ता बा ।। - सुनील कुमार तंग 'तंग इनायतपुरी'
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मन के माहुर बनवला से का फायदा लोर अइसे बहवला से का फायदा बात पर हमरा बिसवास ना जो रहल अइसे किरिया धरवला से का फायदा मन मे बइठल जो होखे मइल के परत तन में साबुन लगवला से का फायदा बात कइलो प जो बात बन ना सकल बात अइसे बढ़वला से का फायदा अब त कुछुए समय बा रहे के इहाँ नेह नाता जोगवला से का फायदा - पाण्डेय कपिल (पाण्डेय कपिल जी के किताब 'परिन्दा उ‌डान पर' से)
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भोजपुरी के टटका लेखक लो से ! एह पोस्ट के संगे जवन फोटो देखत बानी, इ फोटो भोजपुरी के नामी पत्रिका जवना के नाव "भोजपुरी" रहे, के सन्‌ 1954 में प्रकाशित एगो अंक से ह । एह पत्रिका में दूगो पंक्ति में भोजपुरी के लेखक समाज के कहानी बा । ओह दू पंक्ति के पहिला हिस्सा के क्रोनोलॉजी बुझीं - " पहिले गाँहक बन के पाठक बनी, तब पाँच गो गाँहक बनाके आपन लेख भेजीं ।" पहिले कींनीं फेरु पढीं लोगन के कीने खातिर जो‌ड़ीं फेरु लेख भेजीं भा लेखक बनीं ! जब रउवा कीनब त राउर गम्भीरता कीने वाला चीज से बनल रही, चुकि कीनले बानी त पढे के कोशिश रउरा करबे करब ! पढब त रउरा लागी कि भोजपुरी में का लिखा रहल बा । जब पढ के हो जाई त रउवा अउरी भोजपुरिया लो के कीने आ पढे खातिर जोड़ब ! जब इ हो जाई त फेरु रउवा लिखल शुरु करीं । एह से होई का की, भोजपुरी से जुड़ल किताब, पत्रिका के कीने, पढे आ लिखे के संख्या बढी आ बेहतर होई । अब ओह दुसरका पंक्ति के कहे के माने बुझीं - " भोजपुरी के सस्ता मत बनाईं सभे, कविता से गद्य के जादे जरुरत बा । " भोजपुरी भाषा में काव्य रचना (लिखित गीत भा कविता) लगभग हजार साल से बेसी बा । भोजपुरी के क्रिया पद के कहीं लिखाइल होखे के चर्चा सातवा शताब्दी ले जाला । यानि कि भोजपुरी में काव्य रचना बहुत पहिले से बा । गद्य भले संवाद में होखे बाकिर साहित्य में गद्य (भोजपुरी में) लगभग 700-800 के करीब आइल जब भोजपुरी के लोकगाथा के संकलन होखे लागल । भोजपुरी में प्रकाशित जदि पहिला किताब के बात होखे त उ नाटक ह जवन गद्य साहित्य से जुड़ल बा । बाकिर एह मय के बादो, इ मानल गइल बा कि गद्य में कवनो भाषा निखर के आवेले ओह भाषा के आकार, विचार आ गहिराई बढेला । गद्य लिखे के अउरी कारण हो सकेला, जइसे भोजपुरी में काव्य भा कविता भा गीत के तुलना में गद्य के संख्या कम बा । त एहि से पत्रिका के संपादक जी गद्य बेसी लिखे के कहत बानी आ दोसर का होला कि गद्य लेखन से लिखे वाला के भाषा में सुधार होला । त लिखे वाला के भाषा सुधार आ भोजपुरी में बेहतर गद्य लेखन के बढोत्तरी, एह पंक्ति के मूल सार बा । हम जब एह बात के लिखत बानी त एगो पाठक के नाते लिखत बानी । हम भोजपुरी के अधिकतर किताब कीन के पढेनी ! हमरा लगे भोजपुरी के कीन के धइल किताबिन के संख्या 200 के करीब के बा । हम साल भर में भोजपुरी के लगभग 20-25 गो किताब कीनेनी । एह में नया प्रकाशित आ पुरान किताब, दुनो शामिल बाड़ी स । खास बात कि हम किताबिन के खाली कीनबे ना करेनी, बलुक ओकनी के पढबो करेनी । हम अधिकतर भोजपुरी में गद्य लेखन से जुड़ल किताबिन के पढे के कोशिश करेनी । कविता-गीत संग्रह जदि बेजोड़ रही, आ ओह किताबिन के जदि बहुत चर्चा होला तबे कीन के पढेनी । काहें कि भोजपुरी कविता-गीत संग्रह में हिंदी के लमड़ाई के टेढ क के भोजपुरी में लोग छाप देला। बाकिर गद्य लेखन से जुड़ल किताबिन के हम आंखि बन क के कीन के पढेनी । एहि से इ कुल्ह बात लिखत बानी । असल में भोजपुरी में लिखे वाला अधिकतर लेखक, हिंदी से प्रभावित बाड़े आ ढेर जाना हिंदिये के वाक्य शब्द के लमड़ाई के भोजपुरियावे के कोशिश क रहल बाड़े । चुकि साहित्यकार बने के बा एह से इ लो ना भोजपुरी के जरुरी किताबिन के पढत बा, ना एह लो के भोजपुरी में पहिले लिखा चुकल साहित्य के पढे के शवख बा । वायरल के बेमारी के नाव प आपन जरि के अबर-दुबर करत इ लो बस चलताउ लमड़ावल घींचल गीत-कविता लिख के लेखक बन रहल बा । करे के कुछ नइखे, लिखीं जइसे लिखत बानी, बाकिर कम से कम भोजपुरी के पुरान कुछ किताबिन के रउवा एगो तय सीमा बना लिहीं कि हमरा एह महीना में एह किताब भा पत्रिका के पढे के बा । कोशिश करीं कि आज से 20-25 साल पहिले भा ओह से पहिले के प्रकाशित किताब भा पत्रिका होखे । एह किताब पत्रिका स्बह के पढब त रउरा आइडिया लागी कि कइसे आ का करे के बा । कुछ ना त एह 'भोजपुरी' पत्रिका के अंक के पढीं जवन भोजपुरी साहित्यांगन प लागल बड़ुवे । एह पत्रिका के मय अंक पढ जाइब त राउर लेखन शैली निखर जाई । बस अतने कहे के रहल ह ! सुनले बानी नू - अकुताई के बिआह कनपटी प सेनूर ! अइसे त लोग कनपटी प सेनूर लगा रहल बा, बाकिर तबो, एह लोकोक्ति के ध्यान में राखि के इहे बुझीं कि बिना पढले जनले बुझले साहित्यकार त रउवा बन जाइब बाकिर गहिराह, लाम-चाकर आ सबसे बड़ बेहतर आ मन के संतोष देबे वाला, पाठक के हरिअर कंचन बनावे वाला साहित्यकार बने खातिर, रउवा भोजपुरी के किताबिन के पत्रिका आदि के पढे के पड़ी । - नबीन कुमार
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मन के झँवात आग दरदिया के खोर के । के चलि गइल अचके में करेजा खखोर के ॥ पानी सुखा चलल रहे अँखियन का कोर के । भरि गइल के बरसात बिना ओर-छोर के ॥ हथजोरी के ओकरा से बढ़ल अब के कदरदान । मुँह फेरि छोड़ि गइल जे बहियाँ ममोर के ॥ मत खोली मन के भेद चाहे लाख दिल मिले । दुनियाँ ह समझदार बहुत मन के चोर के ॥ कहि जाईं हाल राह में मिल जाय जबे यार । अइसन अबूझ के ह जे बइठी अगोर के ॥ - जगन्नाथ जी
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रामजियावन दास 'बावला' : जयंती प विशेष जयंती - 1 जून 1922 पुण्यतिथि - 1 मई 2012 भोजपुरी भाषा आ साहित्य के अदभुत रचनाकार, भोजपुरी काव्य साहित्य में अमर योगदान करे वाला, भोजपुरी के तुलसीदास रामजियावन दास ' बावला' जी के जयंती प आखर परिवार बेर बेर नमन क रहल बा। बावला जी के जनम 1 जून 1922 के बनारस स्टेट के चकिया जिला के भीखमपुर गाँव में लोहार परिवार में भइल रहे । बाबुजी श्री रामदेव जी जातीय व्यवसाय के माध्यम से अपना 4 गो बेटा आ दू गो बेटी के पालन पोषण करत रहनी । बावला जी के माई के नाव सुदेश्वरी देवी रहे । खेत के एगो छोटहन टुकी में उपजे वाला अनाज से घर परिवार के जीवन बसर होत रहे । पढाई लिखाई के कुछ व्यवस्था ना रहला के वजह से पढाई खातिर ना गइनी आ बावला जी शुरुवे से जातीय व्यवसाय में लाग गइनी । बाकिर लोहा पीटल बावला जी के कबो जमल ना । 16 बरिस के उमिर में बावला जी , झलिया बाजार के निवासी श्री चुन्नीलाल जी के सुपुत्री मनराजी देवी से बिआह हो गइल । बिहाह के बाद गाई-भइंस चरावे के धंधा बावला जी शुरु कइनी आ इ काम अंत समय ले चलल । गाई-भइंस चरावे के दौरान ही बावला जी के रचना के संसार शुरु भइल । कुसुंभर, रमरैया, मुरलिया, डुगडुगवा पहाड़ियन प जाये के मोका मिलल , रामचरित मानस के पढे के जाने के मिलल । राजदरी के लगे धुसुरिया के कोलभील आ मुसहरन संगे समय बितावे के मोका मिलल । बावला जी कल्पनालोक में भगवान राम , लक्ष्मण, आ देवी सीता के आगमन भइल आ रचना लोग के शुरुवात भइल । एक हाली जब रचना सिरजना के शुरुवात भइल त फेरु बावला जी के कलम रुकल ना । गांव, समाज, देस के समस्या के संगे संगे देवी-देवता में आस्था के प्रभाव के रुप में भजन आदि सिरजना शुरु हो गइल । 1958 के आवत आवत , राम जियावन दास बावला जी कवि के रुप में प्रतिष्ठित होखे लागल रहनी आ एहि समय में इहाँ के आकासवाणी प काव्यपाठ करे के मोका मिलल । एह के बाद रामजियावन दास बावला के नाव आ इहां रचना संसार से भोजपुरी भाषा साहित्य में उत्तरोत्तर बढोत्तरी होखे लागल आ बावला जी भोजपुरी आ पुरब के क्षेत्र में हिन्दी कविता पाठ के मंच प आवे लगनी आ इहां के नाव सगरे फइले पसरे लागल । विद्यानिवास मिश्र आ पाण्डेय कपिल जी कहला समझवला के बाद इहां के किताब 'गीतलोक' प्रकाशित भइल । साहित्यकार लो रामजियावन दास 'बाव;आ' के कृतियन के देख के इहां के ' भोजपुरी के तुलसीदास' भी कहेला । भोजपुरी के तुलसीदास, गांव, परिवार, समाज आ देस के अपना रचना के आधार बनावे वाला, भोजपुरी में भगवान राम आ मानस के एगो नया आकार देबे वाला अदभुत रचनाकार 1 मई 2012 के एह लोक से अंतिम यात्रा प निकल गइनी । आखर परिवार अपना एह महान रचनाकार के जयंती प बेर बेर नमन क रहल बा
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सुप्रभातम्! संस्कृत- पत्रकारिता- दिनस्य शुभकामना:! संस्कृतपत्रकारसंपादकप्रकाशकानां कृते हार्दिकी शुभकामना! संस्कृतं विजयतेतराम् । @PMOIndia @maha_governor @MinOfCultureGoI @vaartavali @DDNewsSanskrit @suneeiljoshi @baldevanandair @himsanskritnews
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सतीश प्रसाद सिन्हा : जयंती विशेष जन्मतिथि - 1 जून, 1938 पुण्यतिथि - 14 अप्रैल 2021 भोजपुरी भाषा आ साहित्य में श्रेष्ठ गजल, गीत-कविता, नाटक आ कथा-कहानी के माध्यम से निरंतर सेवा करे वाला भोजपुरी आ हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार सतीश प्रसाद सिन्हा जी के जयंती प आखर परिवार बेर बेर नमन क रहल बा। सतीश प्रसाद सिन्हा जी के जन्म, 1 जून 1938 के आरा (भोजपुर) में भइल रहे । पटना विश्वविद्यालय से राजनिति विज्ञान में उच्च शिक्षा ग्रहण कइनी । पटना उच्च न्यायालय में सचिव के पद से इहां के रिटायर हो के पटना में रहत रहनी । 1954-55 से हिंदी आ भोजपुरी में नाटक, कहानी, काव्य (गीत-गजल), लघुकथा, व्यंग्या आ समीक्षा खातिर लेखनी अंतिम समय ले चलत रहे । इहां के लिखल किताब ' मन के अँगना में ' के भोजपुरी साहित्यांगन प पढ सकेनी । सतीश प्रसाद सिन्हा जी के लिखल कुछ रचना - 1- जिन्दगी मे हम लुटाइल जात बानी गाय बनि के हम दुहाइल जात बानी । हम त रहलीँ हs पुजारी रोशनी के अब दिया होके बुताइल जात बानी । दर्द मे भी प्यार के बा रंग उनुकर रंग मे उनुके रँगाइल जात बानी । धार हs ई वक्त के, ना रुक सकेला पात जइसन हम दहाइल जात बानी । हो गइल बा शाम जिनिगी के, मगर हम मोह मेँ आजो बन्हाइल जात बानी । 2- बीत गइल साल मगर उहे बा हाल लोग बाग पीयर आ नेता जी लाल ऊहे बा हाल ! नया-नया प्लान बा कागज के शान बा रोटी मोहाल बा पेटवा वीरान बा लोग गइल ताखा पर भइलन बेहाल ऊहे बा हाल ! जनहित के शोर बा सत्ता के होड़ बा थाना आ जेल बा बचवन के खेल बा कागज का नक्शा पर भारत खुशहाल ऊहे बा हाल ! दानवी दहेज बा लेन-देन तेज बा दुल्हन के मौत बा सास बनल सौत बा सुन्दर कानूनन के अच्छा मिसाल ऊहे बा हाल ! खिचड़ी सरकार बा संसद में मार बा गाली-गलौज बा पार्टी में मौज बा चमचन के टोली के गोटी बा लाल ऊहे बा हाल ! वोट बेयपार बा सत्ता -बाजार बा मनवा विदेशी बा देखीं त देशी बा हिन्दी के ढोलक पर अंग्रेजी ताल ऊहे बा हाल ! रेल-दुर्घटना बा बेमौत मरना बा हतिया बा, लूट बा शासन में छूट बा घर में आ बाहर में सगरो भूचाल ऊहे बा हाल ! वादा बरसात बा मीठ-मीठ बात बा चउमुखी विकास के जात-पात हाथ बा नारन के जाल बिछल हाथ में मशाल ऊहे बा हाल ! हारल ईमान बा जीतल बइमान बा जबरन के जीत बा अबरा भयभीत बा जगह-जगह दुर्योद्धन भइल बा बहाल ऊहे बा हाल ! 3- ना जिये दी, ना मरे दी, याद हमरा के दम कबो नाहीं धरे दी, याद हमरा के दिल घवाहिल हो गइल बा चोट खा-खा के घाव दिल के ना भरे दी याद हमरा के भुक-भुका के जरि रहल बा प्रान के बाती ना बुते दी, ना बरे दी याद हमरा के नाव जिनिगी का किनारा आ रहल बाटे पार बाकिर ना करे दी याद हमरा के का करी अब बूढ तन के पेड़ ई रह के ना फरे दी, ना झरे दी याद हमरा के दोष हमरे बा कि कइलीं याद से यारी बेवफाई ना करे दी याद हमरा के 4- आदमी से आदमी अब डर रहल बा जानवर से दोस्ती अब कर रहल बा सिर्फ शक करके पड़ोसी का नियत पर खूब ऊ हथियार से घर भर रहल बा फैसला ऊहे इहाँ अब दे रहल बा कत्ल के धंधा इहाँ जे कर रहल बा रात के दिन हम कबो नाहीँ कहीला ई शिकायत आजु ले उनुकर रहल बा का सुनी ऊ देश-सेवा के कहानी भूख से जब पेट ओकर जर रहल बा का भरोसा आजु के अब जिन्दगी के मौत के जे नित निशाना पर रहल बा 5- अब पीर लिखीं बहुत लिखाइल गीत प्यार के जन-मन के अब् पीर लिखीं । कुछ आम लिखी,कुछ ख़ास लिखीं कुछ थाकल मन के आस लिखीं माटी में अंटकल अझुराइल बचवन के तक़दीर लिखीं । तन-हरन लिखीं,अपहरण लिखीं कुछ भूख-पियास के जलन लिखीं बोझ उठावत सिर पर भारी निर्धन के तक़दीर लिखीं। द्रुपद-सुता के कथा बिसारीं अब लिखीं बुधिया दुखियारी। तन की लाज बचावत ओकर फाटल गुदरी चीर लिखीं । कुछ राम लिखीं ,रहमान लिखीं कुछ हैं वानी पहचान लिखीं । जाति-धर्म के ठेकादारी सत्ता के जागीर लिखीं । बहुत लिखाइल गीत प्यार के जन-मन के अब पीर लिखीं । 6- मरियल के का मारब जी सूखल के का गारब जी अपने से जब बाज़ी बा का जीतब का हारब जी लालच के लुकवारी से कब ले घर के जारब जी महंगाई के आन्ही में कइ से दीया बारब जी छल के तोपा ढाँपी में कतना गेरुआ धारब जी नौवे में जब छेदा बा कइसे पार उतारब जी अपना करिया करनी से कबले पल्ला झारब जी आखर परिवार अपना महान साहित्यकार के जयंती प बेर बेर नमन क रहल बा ।
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भोजपुरी में गद्य-लेखन के बढावा देबे खातिर : भोजपुरी गद्य लेखन 2:0 आखर के ओर से साल 2013 में "भोजपुरी भाषा में गद्य लेखन" नाव से एगो प्रयास भइल रहे जवना में भोजपुरी भाषा में कथा – कहानी, निबंध आ अलग अलग बहुत लेख लिखे खातिर ढेर लोग जु‌टल आ लिखबो कइल । बहुत लोग पहिला बेर भोजपुरी लिखे के शुरुआत 2013 में कइले रहे । कवनो भाषा के विकास में ओह भाषा में लिखाए वाला गद्य के चिन्हासी ठीक ओसहीं होला जइसे आदमी के देहिं में रीढ के हड्डी के होला । मुड़ी से ले के गोड़ तक के जुड़ाव रहेला आ संवसे देहिं के सही आकार आ तरिका से राखे में जइसे रीढ के हाड़ आपन भुमिका निभावे / निबाहे ला ओहिंग, कवनो भाषा खातिर गद्य के महत्व ह । गद्य लेखन से, लिखाए वाला भाषा के बल मिलेला, ज्ञान आ शिक्षा के राहि ओह भाषा में खुलेला, ओह भाषा में नया-नया शब्दन के रचाए आ गढाए भा आवग के संभावना बेसी रहेला । गद्य लेखन से ओह भाषा, भाषा वाला समाज के इतिहास आ संस्कृति सुरक्षित रहेले, नया-नया विचार आ तार्कीक बात-बतकही के आधार गद्य लेखन से मिलेला आ ओह भाषा के साहित्य के विस्तार होला । एहि कुल्हि के ध्यान में राखत, आखर फेरु से " भोजपुरी में गद्य" लिखे खातिर रउरा सभ से निहोरा क रहल बड़ुवे । असल में " भोजपुरी में गद्य लेखन" के माध्यम से हमनी के मिलि - जुलि के कुछ बेहतर क सकेनी जा अपना भाषा भोजपुरी खातिर, आ एहि से इ निहोरा बा । एह खातिर कुछ साधारण बाकिर जरुरी नियम / कानून बनल बा जवना से रउवा सभ के लिखे आ आपन लेख के भेजे में सुविधा रही । त कुछ जरुरी बात ध्यान रहे : क) रउरा का करे के बा ? 1- लेख राउर लिखल होखे, यानि कि मौलिक होखे, AI के भा केहू अउरी के लिखलका के कॉपी पेस्ट ना होखे । कॉपी पेस्ट लेख भा AI के लिखल लेख जदि रहल त लेख आ लिखे वाला के फेरु कबो मोका ना मिली । 2- भाषा भोजपुरी होखे के चाहीं । भोजपुरी के कवनो रुप (पछिमाहा, आदर्श, मधेसी आदि इत्यादि) में लेख हो सकेला। बाकिर लेख के भाषा भोजपुरी होखे के चाहीं। 3- लेख में असंसदीय शब्दन के प्रयोग ना होखे । फुहर-पातर ना होखे, गारी-गलौज ना होखे, धार्मिक, जातिवाद, क्षेत्रवाद के बढावा ना देत होखे । 4- लेख में शब्दन के संख्या कम से कम 1000 होखे के चाहीं बाकिर 2000 से बेसी ना होखे के चाहीं । 5- लेख के संगे संगे राउर आपन फोटो होखे के चाहीं जवना के प्रयोग पोस्टर आदि खातिर कइल जाई आ 50-100 शब्दन में राउर परिचय होखे के चाहीं । 6- लेख अप्रकाशित होखे के चाहीं, यानि कि आखर के भेजे से पहिले राउर लेख कतहूँ प्रकाशित ना भइल होखे । 7- फॉन्ट के साइज 10-12 के बीच में होखे के चाहीं आ फॉन्ट अइसन रहे कि ओह के फेसबुक / ट्वीटर (एक्स) प लगावल जा सके । 8- वर्ड (word) फाइल में लेख के भेजी, ईमेल से लेख के अटैच क के भेजी, आखर के फेसबुक इनबाक्स में लेख भेज सकेनी । आखर के ईमेल आईडी ह - aakharbhojpuri@gmail.com 9- गद्य लेखन में, कथा, कहनी/कहानी, निबंध, आलोचना, समालोचना, लेख, संस्मरण, रिपोर्ट / रिपोर्ताज, भुमिका, समीक्षा, इतिहास, जीवनी आदि लिखा सकेला । 10- एगो लेखक के एक हफ्ता में ढेर से ढेर दू गो लेख लाग सकेला। ख) आखर का करी ? 1- राउर लेख, आखर के फेसबुक / ट्वीटर (एक्स) प राउर फोटो के संगे लागी । 2- रउरा लेख के मुल्यांकन - विषय के समझ, प्रस्तुति, भाषा शैली, भाषाई समझ, लोकोक्ति मुहावरा के प्रयोग, लेखन शैली, विचार के गहिराई, लेख आ बात के परोसे वाला भाव आ ओकर गहराई जइसन चीजन के ध्यान में राखि के कइल जाई आ संगे संगे, ओह लेख प आइल पाठक लोगन के प्रतिक्रिया, शेअर कमेंट आदि के ध्यान में राखि के कइल जाई । 3- जदि निकहा आ सैगर लेख भेटा जाई त आखर के ओर से एह कुल्ह चयनित लेख के किताब के आकार दिहल जाई आ किताब के प्रिंट वर्जन प्रकाशित कइल जाई । माने किताब ले आवल जाई । 4- जवना-जवना लेख के चयन कइल जाई, ओह लेख के लिखे वाला लेखक लोगन के आखर के ओर से कुछ उपहार भेजल जाई जवना में भोजपुरी में लिखाइल कुछ खास किताब जरुर रही । ग) एह से का होई ? 1- रउरा सभ के लिखल देख, अउरी लोग, नवहा लोग आ नया नया लोग भोजपुरी में लिखे खातिर जुड़ी । 2- भोजपुरी भाषा आ साहित्य के नेव अउरी बरिआर होई आ भोजपुरी भाषा साहित्य के अउरी परचार होई । 3- अलग अलग लेख आ लेख के माध्यम से जानकारी, भोजपुरी भाषा के ले के एगो नया आ बेहतर माहौल / वातावरण के आकार दिही । 4- भोजपुरी भाषा आ साहित्य में श्री-वृद्धि होई । रउवा सभ के लेख के इंतजार में बानी जा आ जदि एह से जु‌डल कुछ शंका-सुबहा होखे त आखर के ईमेल करीं आखर के फेसबुक भा ट्वीटर (एक्स) के इनबाक्स में लिखीं । राउर आपन आखर परिवार ! नोट- इ कुछ साधारण नियम कानून बा, बाकिर एह नियमन में कुछ बदले जो‌डे घटावे हटावे के अधिकार आखर के जरी बा । ध्यान दिहीं, भोजपुरी भाषा आ साहित्य खातिर नीमन से नीमन लिखल बढिमा गद्य लिखल जरुरी बा हमनी के सब केहू के फोकस एहि प होखे के चाहीं ।
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भरमतुनि के परम्परा वाला ग्रामीण कलाकार आ जेसी माथुर जेसी माथुर जी के लेख " भरतमुनि की परम्परा में ग्रामीण कलाकार : भिखारी ठाकुर" हम बहुत पहिले पढले रहनी आ हमरा इहो मालूम रहे कि इ लेख, जेसी माथुर जी के किताब " जिन्होने जीना जाना " किताब में प्रकाशित भइल रहे । कुछ दिन पहिले इ किताब, हमरा एगो मित्र के लगे चहुंपल त हमार मित्र, कभर फोटो के संगे संगे एह लेख के हर पन्ना के फोटो घींच के भेजले । 1971 में राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित एह किताब में कुल 12 गो लेख बा । जवना में 2 गो राजनेता, 7 गो साहित्यकार , एक विचारक आ दू गो कलाकार प आधारित बा । कलाकार में भिखारी ठाकुर आ अपना समय के सुप्रसिद्ध अभिनेत्री देविका रानी प लेख बा । जेसी माथुर जी के एह बारहो लेख के नाव के चयन आ लेख के बारे में शुरुवाती बात एहि किताब के एगो पाना प लिखल बा । अब जब पिछला कुछ साल से भिखारी ठाकुर के ले के अलग अलग क्लेम / दावा अलग अलग लोगन के बा, त अइसना समय में बिहार के एगो बहुत बड़ अधिकारी, जे भिखारी ठाकुर के समय में बिहार शिक्षा आ कला संस्कृति के बहुत बड़ पद प रहले, आ बिहार के ना रहले, भोजपुरिया ना रहले, एह से उनुकर बात पढल जरुरी बा । जाहिर बा इ किताब अपना समय के सबसे चर्चित प्रकाशन से प्रकाशित रहे आ इ किताबियो बड़ा चर्चित रहे । 1954 से ले के आ भिखारी ठाकुर के निधन से पहिले तक, भिखारी ठाकुर से ऑफिस में मुलाकात, 1954 में पहिलका प्रस्तुति आ फेरु एह के बाद अउरी क गो मंचन के देखला के बाद जेसी माथुर जी एह 7-8 पन्ना के लेख के लिखले बानी । रउवा सभ के जानकारी खातिर बता दिहीं कि एह लेख / किताब के प्रकाशित होखे से पहिले, भिखारी ठाकुर प एगो किताब आ चुकल रहे जवना के लिखले रहनी "महेश्वर प्रसाद यानि महेश्वराचार्य जी" आ इहां के भिखारी ठाकुर प पहिला लेख 1934 में लिखले रहनी । चुकि एह लेख के हम एक हाली फेरु से पढि के खतम कइनी ह त सोचनी ह एह कुल्ह जानकारी के एक हाली फेरु से तनि अलग तरिका से रउवा सभ के सोझा राख दिहीं । काहें कि भिखारी ठाकुर के 8-10 गो गीत गा के भा एकाध दू गो नाटकन के मंचन क के लोगन के दिमाग में इ बात आ जाता कि उहे भिखारी ठाकुर के जानत बा आ ओकरे वजह से लोग भिखारी ठाकुर के जाने लागल बा। इ चीज ओह व्यक्ति के ना बलुक हमनी के कमी के देखावत बा काहें कि हमनी के अपना नायकन के ना जाने के कोशिश कइनी जा आ ना कोशिश करत बानी जा । एकाध गो गीतन के पसन क के ओहि प आहि - वाह क के हमनी के " be Solid " हो जात बानी जबकि जानकारी सीखे बुझे के सबसे जरुरी state ह " be liquid" जवना से रउवा भीतरी आकार लेबे सीखे बुझे जाने के अवसर रही । हमरा से अक्सर लोग पुछे ला कि भिखारी ठाकुर के व्यक्तित्व आ कृतित्व के बारे में जाने खातिर जरुरी किताब कवन - कवन बाड़ी स त हम कहब कि - भिखारी ठाकुर ग्रंथावली - भोजपुरी साहित्यांगन प मिल जाई, भिखारी ठाकुर आश्रम वाल अलो के पहल ह । भिखारी ठाकुर रचनावली - बिहार राष्ट्रभाषा परिषद जनकवि भिखारी ठाकुर - महेश्वराचार्य भिखारी - महेश्वराचार्य तैयब हुसैन पिड़ीत जी के किताब (इहां के भिखारी ठाकुर प शोध वाली किताब, भोजपुरी भाषा में प्रकाशित दू गो किताब आ राजकमल से प्रकाशित अनगढ हीरा वाली किताब) एह किताबिन के पढि के रउवा सभ भिखारी ठाकुर जी के व्यक्तित्व आ कृतित्व प ठोस राय बनावे के स्थिति में आ सकेनी । संजीव के सुत्रधार चुकि उपन्यास ह ड्रामेटिक बा त उ फैक्ट से भरल नइखे, बाकिर ड्रामेटिक अंदाज में बढिया लिखाइल बिआ, आ इ किताब रउवा के भिखारी ठाकुर के अउरी जरी ले, ले के जाई । बाकिर हं, इ कुल्ह खातिर रउवा पढे के परी, अकिल लगावे के परी, बुझे आ गुने के परी । खाली कान में सुना के मुह से आहि-आहि कहि के काम ना फरिआई । बाकि के रउवा बुझीं । - नबीन कुमार
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