🚨 सोचिए, अगर आपकी माँ या बहन इस हालात में होती तो…? 🚨
दरअसल मामला यह है कि एक महिला अपनी आरक्षित AC सीट पर पहुँची तो वहाँ एक अज्ञात व्यक्ति लेटा हुआ मिला।
महिला ने कहा – “यह मेरी सीट है, कृपया उठ जाइए।”
लेकिन सीट खाली करने के बजाय वह व्यक्ति महिला के साथ अभद्र व्यवहार करने लगा और इतना ही नहीं, उसने महिला के सामने कपड़े तक उतारने शुरू कर दिए।
महिला ने घबराकर RPF को बुलाया।
👉 अगला स्टेशन आते ही RPF पहुँची, लेकिन शर्मनाक यह है कि वह व्यक्ति न सीट से हटा, न गिरफ्तारी हुई।
RPF पहुँची तो उन्होंने आरोपी को हटाने की कोशिश की लेकिन हैरानी देखिए—वह आदमी RPF के सामने ही कपड़े उतारने लगा!
इसके बावजूद RPF ने महिला की कोई मदद नहीं की।
महिला बार-बार कहती रही – “कम से कम मेरी सीट तो खाली करवा दीजिए…”
लेकिन RPF ने कोई जवाब नहीं दिया और ट्रेन से उतर गई।
सोचिए, उस महिला की हालत क्या रही होगी?
अगर उस वक्त कोई अनहोनी हो जाती, तो जिम्मेदारी किसकी होती—उस मनचले की या RPF की?
🔴 क्या RPF सिर्फ खानापूर्ति करने आती है?
🔴 क्या महिलाओं की सुरक्षा कागज़ों और भाषणों तक ही सीमित रह गई है?
एक महिला अपनी ही सीट पर सुरक्षित नहीं, तो रेलवे सुरक्षा का मतलब ही क्या है?