किसी से मोह हो जाना, प्रेम से बिल्कुल भिन्न होता है। यह न तो कोई लगाव होता है, न ही पसंद करने, दया करने या सहायता करने जैसा। कभी-कभी किसी व्यक्ति से आपका संबंध ऐसा बन जाता है जिसमें कोई बंधन नहीं होता, न कोई मोड़ होता है और न ही कोई ठहराव। केवल एक सूक्ष्म-सी स्वीकृति होती है कि वह है, और उसका होना ही सर्वोच्च है।
इसमें न कोई व्यक्तिगत लाभ होता है, न कोई निजी स्वार्थ। उसका होना और निरंतर बना रहना ही मोह कहलाता है।
उस मोह में भक्ति होती है, उपलब्धता होती है, चिंता होती है, और यह समर्पण की एक मिसाल बन जाती है। यह एक उच्चतम पवित्रता है, जिसके आगे व्यक्ति अत्यंत संवेदनशील और कोमल हो जाता है।
उसके लिए किसी का होना इतना महत्वपूर्ण हो जाता है कि वह कहाँ है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मोह किसी से भी हो सकता है ! यह जान-पहचान हो या कोई अजनबी, कोई मित्र, कोई पशु या स्वयं से भी।
बस एक स्वीकृति होती है, जिसके कारण उस व्यक्ति या अस्तित्व की भलाई, उसकी देखभाल, और उसके बने रहने की संभावनाएँ मन के गहरे हिस्से में बस जाती हैं।
यह माया है मन की, पर यह जुड़ाव किसी के अस्तित्व से होता है।