1) वर्ष 2018 की शुरुआत में जम्मू के कठुआ ज़िला में बकरवाल समुदाय की एक बालिका के साथ बलात्कार हुआ और फिर उसको मार दिया गया।
चूंकि सभी आरोपी राजपूत समुदाय से थे, सो राजपूतों ने अपनी जाति के आरोपियों को बचाने के लिए "हिन्दू एकता मंच" के बैनर तले रैलियां निकाली।
2) वर्ष 2017 के जून मास में उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िला में दलित समुदाय की एक युवती के साथ बलात्कार हुआ। वर्ष 2019 के जुलाई मास में पीड़िता और उसके घरवालों को मारने का प्रयास हुआ। हालांकि पीड़िता बच गई, पर उसके घरवालें मारे गए।
चूंकि आरोपी राजपूत समुदाय से था, सो राजपूतों ने अपनी जाति के आरोपी को बचाने के लिए "क्षत्रिय एकता मंच" के बैनर तले रैलियां निकाली।
3) वर्ष 2020 के सितम्बर मास में उत्तर प्रदेश के हाथरस ज़िला में दलित समुदाय की एक युवती के साथ बलात्कार हुआ और फिर उसको मार दिया गया।
चूंकि सभी आरोपी राजपूत समुदाय से थे, सो राजपूतों ने अपनी जाति के आरोपियों को बचाने के लिए "ठाकुर एकता मंच" के बैनर तले रैलियां निकाली।
सोचो, इक्कसवीं शताब्दी में यह हो रहा हैं, तो पहले क्या होता होगा।
अच्छा, एक और दिलचस्प बात। ऐसा मत सोचिए कि यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि पीड़िताएँ गैर-राजपूत समुदायों से थीं और अपनी जाति की महिलाओं के प्रति कोई विशेष लगाव होगा।
बल्कि आपको ऐसे कई मामले मिल जाएंगे जहाँ पीड़िता स्वयं राजपूत लड़की थी, लेकिन यदि आरोपी राजपूत था तो उसके बचाव में भी लोग खड़े दिखाई दिए।
दूसरी बात, करणी सेना से जुड़े लोगों के खुद राजपूत लड़कियों के बारे में दिए गए वक्तव्य भी सुन लीजिए। उनसे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी अपनी राजपूत लड़कियों के प्रति क्या राय और दृष्टिकोण है।