As the apex body, we closely monitor and effectively intervene on caste-based inequalities, policy discourses and seek justice. Please support.

Joined December 2019
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We are grateful to Dr G K Jayaram @kasturijayaram #ProfTrilochanSastry, Shri Vijay Mahajan @VijayMahajanRGF and Mohasin for spending some time with our colleagues and activists in Delhi.
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नेशनल कॉनफेडरेशन ऑफ़ दलित एंड आदिवासी ऑर्गेनाइज़ेशंस (नैकडोर) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के इस कदम का सख़्त विरोध करता है। UGC @ugc_india का काम आरक्षण को लागू करना है, उसे बाईपास करना नहीं। नैकडोर इस मामले में जो भी उसकी क्षमता में संभव है, वह कदम उठाएगा। @DalitOnLine
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“सफाई कर्मचारी सुबह घर से निकलते हैं, और शाम को उनके लौटने की कोई गारंटी नहीं होती।” यह ईरान और अमेरिका के बीच जंग की बात नहीं है। यह हमारे देश के उन लाखों दलित सफाई कर्मचारियों के काम की परिस्थितियों की हकीकत है, जो कॉर्पोरेट बिल्डिंगों, हाउसिंग सोसाइटी और हमारे शहरों नालियों, सेप्टिक टैंकों और सीवरों के भीतर उतरकर उस गंदगी को साफ करते हैं, जिसे समाज पैदा करता है — और उसे साफ़ करवाने के लिए दलित समाज के लोगों को बाध्य करता है। जयपुर के सीतापुरा औद्योगिक क्षेत्र में एक जूलरी फैक्ट्री के सेप्टिक टैंक में सोने-चाँदी के कण निकालने के लिए उतारे गए चार मज़दूरों की जहरीली गैस से मौत हो गई। मज़दूर टैंक में उतरने से डर रहे थे, लेकिन कंपनी प्रबंधन ने उन्हें अतिरिक्त पैसों का लालच देकर मजबूर किया। फरवरी 2025 में दिल्ली के नरेला में दो सफाई कर्मचारियों की मौत हुई — एक निजी ठेकेदार द्वारा नियुक्त ये मज़दूर किसी भी सुरक्षा उपकरण के बिना जहरीले गड्ढे में उतारे गए थे। इसके कुछ दिन बाद कोलकाता के बांटला क्षेत्र में तीन और कर्मचारी — फरज़ेम शेख, हाशी शेख और सुमन सरदार — एक नाले की सफाई के दौरान मैनहोल में बह गए। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2017 से अब तक 620 से अधिक सफाई कर्मचारियों की मौत हुई — जिनमें से 539 परिवारों को पूरा मुआवजा मिला, लेकिन 52 परिवारों को एक भी पैसा नहीं मिला। जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे महानगरों में मैनुअल स्कैवेंजिंग और खतरनाक सीवर सफाई पर पूर्ण प्रतिबंध का आदेश दिया। लेकिन इस आदेश के बावजूद फरवरी से मई 2025 के बीच कम से कम 20 और मौतें दर्ज हुईं। विश्व कार्यस्थल पर सुरक्षा और स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ़ दलित एंड आदिवासी ओर्गानाइजेशंस (नैकडोर) मांग करता है: 1.सफाई कर्मचारियों के काम करने के खतरों का तकनीकी हल किया जाए। 2.सफाई कर्मचारियों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के लिए उनकी नियमित अन्तराल पर स्वास्थ्य जाँच का प्रावधान हो। 3.जो भी ठेकेदार, उनके नियोक्ता या नगर निगम के अधिकारी उन्हें बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर, सेप्टिक टैंक, नालियों या सड़कों पर सफाई के काम के लिए बाध्य करे, उनके खिलाफ ऍफ़.आई.आर. दर्ज कर हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज किया जाए; 4.दुर्घटनावश मौत की स्थिति में उनके परिवार को एक करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाए। 5.राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग को सफाई कर्मचारियों के मसलों को और अपने संवैधानिक उद्देश्यों की पूर्ति के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। अशोक भारती @DalitOnLine
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NACDAOR: दलित एवं आदिवासी समाज के संगठनो का महासंघ retweeted
दलित और समुदायों में टीकाकरण की कमी कोई व्यक्तिगत चुनाव या अज्ञानता का परिणाम नहीं है — यह जाति-व्यवस्था द्वारा उत्पन्न संरचनात्मक असमानता का प्रतिबिंब है। जब तक स्वास्थ्य नीतियाँ जाति को एक सामाजिक निर्धारक के रूप में स्वीकार नहीं करतीं और दलित समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं होती, तब तक “सबके लिए स्वास्थ्य” का नारा ही रहेगा। डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने शिक्षा और स्वास्थ्य को दलित मुक्ति के अनिवार्य आयाम माने थे। उनके इस दृष्टिकोण के आलोक में नैकडोर टीकाकरण को केवल चिकित्सा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न मानता है। राष्ट्रीय शिशु टीकाकरण सप्ताह पर नैकडोर की माँग है: 1. दलित बस्तियों में विशेष टीकाकरण शिविर लगाए जाएँ। 2. दलित समुदाय के स्वास्थ्यकर्मी नियुक्त किए जाएँ। 3. जाति-आधारित स्वास्थ्य डेटा सार्वजनिक किया जाए। 4. स्वास्थ्यकर्मियों को जाति-संवेदनशीलता प्रशिक्षण दिया जाए। नैकडोर के नीतिगत सुझाव है: 1. जाति-वर्गीकृत स्वास्थ्य डेटा का संग्रह और प्रकाशन अनिवार्य किया जाए। 2. दलित बस्तियों में मोबाइल टीकाकरण दल भेजे जाएँ। 3. ASHA कार्यकर्ताओं की जवाबदेही सुनिश्चित हो — विशेषकर दलित क्षेत्रों में। 4. दलित सामाजिक संगठनों को टीकाकरण अभियान में सहभागी बनाया जाए। 5. नैकडोर के नेतृत्व में दलित एवं आदिवासी समुदाय-आधारित निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए। दलित स्वास्थ्य, दलितों की मुक्ति का अभिन्न अंग है। -अशोक भारती DalitOnLine
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NACDAOR: दलित एवं आदिवासी समाज के संगठनो का महासंघ retweeted
धन्ना भगत: आध्यात्मिक साहस और सामाजिक क्रांति के वाहक भक्ति आंदोलन के इतिहास में धन्ना भगत एक ऐसा नाम है जो सामाजिक क्रांति और आध्यात्मिक साहस का प्रतीक है। पंद्रहवीं शताब्दी में राजस्थान की धरती पर जन्मे धन्ना जाट किसान थे — एक ऐसी जाति जो सवर्ण ब्राह्मणवादी व्यवस्था में हाशिये पर थी। उनकी भक्ति ने न केवल ईश्वर को, बल्कि सामाजिक विषमता को भी चुनौती दी। धन्ना भगत की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने भक्ति को उस सरल, देहाती जीवन से जोड़ा जो दलित और वंचित वर्ग जीते हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित उनके पद इस बात के साक्षी हैं कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए न कुलीन जन्म चाहिए, न संस्कृत का ज्ञान — केवल निश्चल प्रेम और सच्ची लगन पर्याप्त है। यह संदेश दलित जनमानस के लिए एक प्रकार की मुक्तिवाणी था। रविदास, कबीर और नामदेव की तरह धन्ना ने भी यह सिद्ध किया कि भगवान किसी जाति विशेष की बपौती नहीं है। उनकी रचनाओं में “अन्न” और “खेती” का जो रूपक है, वह निम्न वर्ग के श्रमजीवी जीवन की गरिमा को प्रतिष्ठित करता है। यह प्रतीकात्मकता आज भी दलित विमर्श में प्रासंगिक है। डॉ. आंबेडकर ने भक्ति आंदोलन की सीमाओं को भी रेखांकित किया था — कि यह आंदोलन जातिव्यवस्था को जड़ से नहीं उखाड़ सका। फिर भी धन्ना जैसे संतों का योगदान यह है कि उन्होंने दलित और पिछड़े वर्गों में आत्मसम्मान का बीज बोया, यह साहस दिया कि वे भी ईश्वर के समक्ष समान हैं। आज जब हम दलित सांस्कृतिक विरासत की बात करते हैं, तो धन्ना भगत उस परंपरा के एक महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं जो ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती देते हुए मानवीय गरिमा की स्थापना के रास्ते पर चलने का सुझाव देते हैं।
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मलेरिया और दलित: एक उपेक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट भारत में मलेरिया केवल मच्छर जनित बीमारी नहीं है — यह सामाजिक असमानता का एक जीवंत दस्तावेज़ है। मलेरिया के आँकड़ों को जाति और वर्ग के चश्मे से देखने पर पता चलता है कि दलित और आदिवासी समाज इस बीमारी से सबसे अधिक पीड़ित होते हैं, लेकिन स्वास्थ्य नीतियों में उनकी कोई सुनवाई नहीं होती। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) और नेशनल वेक्टर बोर्न डिज़ीज़ कंट्रोल प्रोग्राम (NVBDCP) के आँकड़े बताते हैं कि मलेरिया के सर्वाधिक मामले उन्हीं ज़िलों में दर्ज होते हैं जहाँ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी सघन है — जैसे ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश और पूर्वोत्तर राज्यों के बस्तर जैसे क्षेत्र। इन क्षेत्रों में दलित बस्तियाँ अक्सर जलभराव वाली निचली ज़मीनों पर बसी होती हैं — जो मच्छर पनपने के लिए आदर्श वातावरण है। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि सदियों पुरानी ज़मीन-वंचना का परिणाम है। दलित परिवारों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) में जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है — यह तथ्य नेशनल कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ दलित एंड आदिवासी ऑर्गेनाइज़ेशंस (नैकडोर) की रिपोर्टों में दर्ज है। मलेरिया का समय पर परीक्षण न होना, दवाओं की अनुपलब्धता, और सरकारी स्वास्थ्यकर्मियों का दलित बस्तियों में न जाना — ये सब मृत्युदर को बढ़ाते हैं। कुपोषण और मलेरिया का गहरा संबंध है। दलित बच्चों में एनीमिया की दर राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है, जो मलेरिया को और भी जानलेवा बना देती है। रोग से लड़ने की क्षमता तब और कमज़ोर हो जाती है जब शरीर पहले से ही अल्पपोषण का शिकार हो। भारत की राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन नीति (2017–2030) में जाति-आधारित डेटा संग्रह का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। जब तक मलेरिया के आँकड़े जाति के अनुसार नहीं तोड़े जाएँगे, तब तक दलित समुदायों के लिए लक्षित हस्तक्षेप संभव नहीं होगा। स्वास्थ्य न्याय के बिना सामाजिक न्याय अधूरा है। मलेरिया का उन्मूलन केवल मच्छरदानी और दवाओं से नहीं होगा — इसके लिए जाति-आधारित स्वास्थ्य असमानताओं को स्वीकार करना और उन्हें नीति का केंद्र बनाना अनिवार्य है। - अशोक भारती @DalitOnLine
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पंचायती राज और अनुसूचित जाति/जनजाति का जमीनी नेतृत्व बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के विचारों के अनुसार ग्राम स्तर पर लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब समाज में समानता, शिक्षा और सामाजिक न्याय हो। पंचायती राज व्यवस्था को वे स्थानीय स्वशासन का महत्वपूर्ण माध्यम मानते थे, लेकिन उनका मानना था कि गांवों में जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता खत्म किए बिना सच्चा लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता। भारत में लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक पहुँचाने का श्रेय भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी को जाता है। उन्होंने संविधान के 73वें संशोधन कानून के जरिये पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक मान्यता दी गई। इसका उद्देश्य ग्रामीण जनता को शासन में भागीदारी देना और विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देना है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को उनकी आबादी के अनुसार प्रतिनिधित्व में आरक्षण का प्रावधान इन पंचायती राज संस्थाओं में किया गया। श्री राजीव गाँधी द्वारा लाये गए इस ऐतिहासिक कानून ने ग्रामीण स्व-शासन में, जो पारंपरिक रूप से केवल ताकतवर सवर्ण जातियों के मर्दों की सनक और हनक पर निर्भर था, दलितों, आदिवासियों और महिलाओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित कर इन समुदायों को स्थानीय प्रशासन में सशक्त करने का काम किया। कमज़ोर वर्गों के लिए पंचायती राज उनके सशक्तिकरण का ताकतवर हथियार बना। भारत में पंचायती राज संस्थाओं में कुल लगभग 24–30 लाख निर्वाचित प्रतिनिधि (पंचायत सदस्य) हैं। इनमें से लगभग 30–35% सदस्य यानि करीब दस लाख सदस्य अनुसूचित जातियों और जनजाति समुदायों से आते हैं, जो कि संवैधानिक आरक्षण प्रावधानों के कारण संभव हुआ है। यह संख्या इस बात का प्रमाण है कि इन समुदायों की भागीदारी अब केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक और प्रभावी है। इससे दलित एवं आदिवासी समाज को न केवल जमीनी स्तर पर राजनीतिक पहचान मिली है, बल्कि वे अपने समुदाय की समस्याओं—जैसे गरीबी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और सामाजिक भेदभाव—को सीधे तौर पर उठाने में सक्षम हुए हैं। उनके प्रयासों से ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वच्छता, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक समावेशन को बढ़ावा मिला है। लेकिन दलितों, आदिवासियों और उनके समर्थक सवर्णों को यह समझाना जरुरी है कि अभी भी दलितों और आदिवासियों के सामने सामाजिक पूर्वाग्रह, प्रशासनिक अनुभव की कमी और संसाधनों की सीमाएँ जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। नैकडोर ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज के क्षेत्र में अपने हस्तक्षेप के जरिये इन्हीं चुनौतियों से निबटने का काम करता है. आप भी नैकडोर से जुड़कर इन चुनौतियों से निबटने में हमारी सहायता कर सकते हैं. अशोक भारती @DalitOnLine
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नेशनल कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ दलित एंड आदिवासी ऑर्गेनाइज़ेशंस (नैकडोर) की ओर से आप समस्त देशवासियों को "विश्व पृथ्वी दिवस" की हार्दिक शुभकामनाएं! "पृथ्वी दिवस पहला पवित्र दिन है जो सभी राष्ट्रीय सीमाओं का पार करता है, फिर भी सभी भौगोलिक सीमाओं को अपने आप में समाये हुए हैं, सभी पहाड़, महासागर और समय की सीमाएँ इसमें शामिल हैं और पूरी दुनिया के लोगों को एक गूँज के द्वारा बाँध देता है, यह प्राकृतिक सन्तुलन को बनाये रखने के लिए समर्पित है। पृथ्वी दिवस का महत्व इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि, इस दिन हमें ग्लोबल वार्मिंग के बारे में पर्यावरणविदों के माध्यम से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का पता चलता है। पृथ्वी दिवस जीवन संपदा को बचाने व पर्यावरण को ठीक रखने के बारे में जागरूक करता है। जनसंख्या वृद्धि ने प्राकृतिक संसाधनों पर अनावश्यक बोझ डाला है, संसाधनों के सही इस्तेमाल के लिए पृथ्वी दिवस जैसे कार्यक्रमों का महत्व बढ़ गया है। पृथ्वी पर रहने वाले तमाम जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों को बचाने तथा दुनिया भर में पर्यावरण के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लक्ष्य के साथ 22 अप्रैल के दिन 'पृथ्वी दिवस' यानी 'अर्थ डे' मनाने की शुरुआत की गई थी। इसकी स्थापना अमेरिकी सीनेटर जेराल्ड नेल्सन ने 1970 में शुरू की थी। इस परंपरा को 192 देशों ने खुली बांहों से अपनाया और आज लगभग पूरी दुनिया में प्रति वर्ष पृथ्वी दिवस के मौके पर धरा की धानी चुनर को बनाए रखने और हर तरह के जीव-जंतुओं को पृथ्वी पर उनके हिस्से का स्थान और अधिकार देने का संकल्प लिया जाता है। आइए, इस अवसर हम सब भी प्राकृतिक वातावरण के प्रति संवेदनशील बनने और धरती को हरा-भरा व स्वच्छ बनाने का संकल्प लें।- अशोक भारती @DalitOnLine
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बाबा साहेब डॉ अंबेडकर जयंती समारोह @संसद भवन, नई दिल्ली। नैकडोर @nacdaor कार्यक्रम में उमड़ा हजारों का हुजूम।
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दिल्ली सरकार @gupta_rekha @DGofficials @CMODelhi ने डॉ अंबेडकर जयंती पर दिल्ली के अख़बारों में 3 विज्ञापन दिए हैं। इसमें से एक भी विज्ञापन डॉ अंबेडकर जयंती का नहीं है। इसमें एक विज्ञापन में सरकार ने @News18India के साथ छपा है, जिसमें दलित मंत्री का फोटो ग़ायब है। #अंबेडकर_प्रेम
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उम्मीद है, आपको डॉ अम्बेडकर का संविधान सभा में दिया गया यह ऐतिहासिक भाषण अवश्य पसंद आएगा. उनके इस भाषण ने कांग्रेस नेतृत्व को डॉ अम्बेडकर की दृष्टि का कायल कर दिया और उन्हें संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमिटी का अध्यक्ष बनाने का रास्ता साफ़ किया.
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“विद्या बिना मति गई, मति बिना नीति गई, नीति बिना गति गई, गति बिना वित्त गया, वित्त बिना शूद्र गए — इतना अनर्थ एक अविद्या ने किया।” - ज्योतिबा फुले महात्मा ज्योतिबा फुले, एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार, आंदोलन और ग़ैर-ब्राह्मणी साहस का प्रतीक है। ऐसे देश में जहाँ अभी भी अत्याचार, शोषण और भेदभाव को धर्म के नाम पर शंकराचार्य और धर्म-प्रवचकों द्वारा न्यायोचित ठहराया जाता ही, उसी देश में दो सौ साल पहले 11 अप्रैल 1827 को पुणे में जन्मे फुले ने उस युग में सामाजिक न्याय की अलख जगाई, जब ब्राह्मणवादी वर्चस्व को ही ईश्वरीय व्यवस्था माना जाता था। फुले ने जाति-व्यवस्था को धर्मशास्त्र की आड़ में छिपे शोषण का औज़ार बताया। अपनी कालजयी रचना ‘गुलामगिरी’ (1873) में उन्होंने बताया कि वर्णव्यवस्था दैवीय विधान नहीं, बल्कि उच्च जातियों द्वारा रचा गया षड्यंत्र है — जिसका उद्देश्य शूद्रों और अतिशूद्रों को सदा के लिए अज्ञान और दासता में जकड़े रखना है। उन्होंने शिक्षा को उन्होंने मुक्ति का हथियार बताया। 19वीं सदी में जब स्त्री-शिक्षा को पाप माना जाता था, उन्होंने 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला, जिसमें उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले सहभागी थीं। दलितों और वंचितों के लिए शिक्षा का द्वार खोलना फुले का सबसे बड़ा कार्य था। 1873 में उन्होंने ब्राह्मण धर्म के विकल्प के रूप में ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की। सत्यशोधक समाज एक ऐसा मंच था जो पुरोहितवाद के बिना, मानवीय गरिमा के आधार पर समाज के पुनर्निर्माण का स्वप्न देखता था। उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और बाल-विवाह का विरोध किया। फुले की आलोचना केवल सामाजिक नहीं, बल्कि वैचारिक और दार्शनिक थी। उन्होंने वेदों और मनुस्मृति की उस व्याख्या को चुनौती दी जो असमानता को धर्मसम्मत बताती थी। बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर उन्हें विचार और दृष्टि में अपना गुरु माना और अपनी राइटिंग्स उन्हें समर्पित कीं हैं। -अशोक भारती @DalitOnLine
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“समः समं शमयति — अर्थात् जो पदार्थ स्वस्थ व्यक्ति में रोग के लक्षण उत्पन्न करे, वही सूक्ष्म मात्रा में उस रोग को ठीक कर सकता है।” - डॉ. सैमुअल हैनीमान लीक से हटकर चलने वाले को संकटों का सामना करना ही पड़ता है। होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के जनक डॉ. क्रिश्चियन फ्रेडरिक सैमुअल हैनीमान, जिनका जन्म 10 अप्रैल 1755 को जर्मनी के मेइसेन नगर में हुआ, को भी अपनी चिकित्सा पद्धति की स्थापना के लिए भयंकर कष्टों का सामना करना पड़ा। उनके पिता एक साधारण चीनी मिट्टी के कारीगर थे, और बचपन में आर्थिक संकट के कारण उन्हें विद्यालय छोड़कर एक किराना व्यापारी के यहाँ काम करना पड़ा। गरीबों को केवल अपनी लगन और परिश्रम से ही सफलता मिलती है। लगन और परिश्रम से सैमुअल ने भी चिकित्सा की पढ़ाई पूरी की। आविष्कार किसी ना किसी प्रयोग का परिणाम ही होते हैं। ऐसा ही एक आविष्कार सैमुअल के एक प्रयोग से हुआ। एक दिन उन्होंने सिनकोना (कुनैन) की छाल का स्वयं पर प्रयोग किया और पाया कि इसे लेने से उनमें मलेरिया जैसे लक्षण उत्पन्न हो गए। उन्होंने अपने इस अविष्कार से उन्होंने होम्योपैथी का मूल सिद्धांत प्रतिपादित किया — “समः समं शमयति” — अर्थात् जो पदार्थ स्वस्थ व्यक्ति में रोग के लक्षण उत्पन्न करे, वही सूक्ष्म मात्रा में उस रोग को ठीक कर सकता है। उनके इस आविष्कार ने प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों को चुनौती दी और व्यक्तिगत उपचार तथा न्यूनतम मात्रा में औषधि देने पर बल दिया। उनके इस साहसी कदम का तत्कालीन चिकित्सा जगत ने कड़ा विरोध किया। लेकिन परंपरागत चिकित्सकों ने उनका और उनकी चिकित्सा पद्धति अवैज्ञानिक और नुकसानदायक बताया। तत्कालीन सरकार ने उनके ख़िलाफ़ लगातार कार्यवाहियाँ कीं और उन्हें रोकने के सारे रास्ते अपनाए। यहाँ तक कि उनका अपने शहर लाइपज़िग में उनका जीवन लगभग असह्य बना दिया। अंततः उन्होंने 1821 में औषधि विक्रेताओं ने उन्हें लाइपज़िग छोड़ने पर विवश कर दिया। राजनीतिक दबाव में उन्हें या तो होम्योपैथिक अभ्यास बंद करने या देश छोड़ने का विकल्प दिया गया। लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उनके यहाँ पूरे यूरोप के हजारों लोग इलाज के लिए आते रहे। अंततः उनके अथक संघर्ष और समर्पण ने रंग लाया। उनकी ख्याति सम्पूर्ण यूरोप में फ़ैल गई। सैकड़ों चिकित्सकों ने होम्योपैथी सीखना और अपनाना शुरू किया। उन्होंने 1810 में अपना महान ग्रंथ “ऑर्गेनॉन ऑफ मेडिसिन” प्रकाशित किया, जो आज भी होम्योपैथी का आधार-स्तम्भ है। हैनीमान का निधन 2 जुलाई 1843 को पेरिस में 88 वर्ष की आयु में हुआ। आज उनकी 271वीं जयंती है। उनका जन्मदिन प्रतिवर्ष विश्व होम्योपैथी दिवस के रूप में मनाया जाता है। हैनीमान का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सत्य और विज्ञान की राह पर चलने वाले को कितनी भी बाधाएँ क्यों न हों, वे इतिहास में अपना स्थान अवश्य बनाते हैं।​​​​​​​​​​​​​​​​ भारत में भी उनकी चिकित्सा पद्धति को मान्यता देते हुए होम्योपैथी में कई मेडिकल कॉलेज खोले गए। अनेकों शहरों में उनकी मूर्तियाँ भी स्थापित हैं। लखनऊ में हैनीमान के नाम से एक मशहूर चौराहा है, जहाँ उनकी आदमकद मूर्ति लगी है। -अशोक भारती @DalitOnLine
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यह देश अब तानाशाही के ख़िलाफ़ बोलने लगा है।
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हिंदी यात्रा साहित्य के जनक महापंडित राहुल सांकृत्यायन (1893–1963) महापंडित राहुल सांकृत्यायन (1893–1963) हिंदी साहित्य के महान यायावर, चिंतक और बहुभाषी विद्वान थे। ज्ञान की खोज में उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया और भारत सहित तिब्बत, रूस, श्रीलंका और अनेक देशों की यात्राएँ कीं। उन्हें हिंदी यात्रा साहित्य का जनक माना जाता है। उन्होंने लगभग 150 से अधिक ग्रंथों की रचना की, जिनमें ‘वोल्गा से गंगा’, ‘भागो नहीं, दुनिया को बदलो’ और ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ जैसी कृतियाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। तिब्बत से दुर्लभ बौद्ध पांडुलिपियों को भारत लाकर उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया। राहुल सांकृत्यायन केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि एक प्रगतिशील विचारक भी थे। उन्होंने समाजवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानवतावाद का समर्थन किया तथा जाति और अंधविश्वास के खिलाफ मुखर आवाज उठाई। उनका जीवन ज्ञान, संघर्ष और परिवर्तन का प्रतीक है, जो आज भी नई पीढ़ी को सोचने और समाज को बदलने की प्रेरणा देता है। - अशोक भारती @DalitOnLine
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मैं ब्राह्मणों के तिरस्कार की कड़ी निंदा करता हूँ। राजनैतिक दलों को बसपा से सीखना चाहिए, जिसने ब्राह्मणों के लिए ना केवल पार्टी की विचारधारा को तहस-नहस कर डाला, बल्कि तथागत गौतम बुद्ध के सिद्धांत बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय को धोखा देते हुए उसे सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय कर डाला।😜
तमिलनाडु में किसी भी बड़ी पार्टी ने ब्राह्मण को नहीं दिया टिकट, ज्यादातर प्रत्याशी OBC समुदाय से.
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इससे पहले यूजीसी के मसले पर देश के समस्त दलित, आदिवासी और ओबीसी अगला भारत बंद करने का फैसला लें, सरकार को 2018 के दलितों द्वारा बुलाये गए भारत बंद को याद कर लेना चाहिए। facebook.com/share/v/1H5B7SX…

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We at the National lConfederation of Dalit and Adivasi (NACDAOR) are deeply saddened by the passing of a stalwart of Dalit Movement and our dear friend Ranjit Meshram who was a committed journalist and social activist from Nagpur, whose life was dedicated to speaking truth to power and amplifying the voices of the marginalized. Through his writing and public engagement, Ranjit Meshram consistently highlighted issues of social justice, caste discrimination, and the struggles of Dalits and other vulnerable communities. He believed that journalism must stand with the oppressed and serve as an instrument of democratic accountability. Beyond the newsroom, he remained actively connected with people’s movements and civic initiatives, embodying the values of courage, integrity, and compassion. His work and presence enriched the progressive and Ambedkarite public sphere in Maharashtra. His passing is a profound loss for the community of journalists, activists, and all those committed to equality and justice. We extend our heartfelt condolences to his family, friends, and colleagues. Ranjit Meshram will be remembered for his unwavering commitment to truth and social transformation.
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