एक होता है फ्लैग मार्च।
सशस्त्र सेनाएं, अथवा पुलिस अपनी फुल यूनिफॉर्म, पूरे अस्त्र शस्त्र के साथ, बूट गड़गड़ाते हुए शहर की गलियों में चलती है। इस आयोजन का सीधा सपाट उद्देश्य होता है-
दहशत पैदा करना
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फ्लैग मार्च, शो ऑफ स्ट्रेंथ होता है। मान लीजिए कि आपने शत्रु देश के एक शहर में कब्जा कर लिया।
अब वहां की जनता को बताना है कि कब्जा हो गया। हम अब तुम्हारे प्रशासक, भाग्य विधाता, और इलाके के मालिक है। हमारे पास इतने लोग, इतने इतने हथियार हैं। तो विरोध की जुर्रत मत करना, वरना हमारे इतने लोग क्या क्या कर सकते है- समझ जाओ।
पैरामिलिट्री फोर्स, या पुलिस भी फ्लैग मार्च करती है। अमूमन दंगायुक्त, या बागी इलाको में।
ताकि आतंकवादी, दंगाई, समाज विरोधी तत्व देख लें। समझ लें कि सरकार और सत्ता अब खुलकर, हथियार लेकर आपका सर तोड़ने को आ गयी है। तो आप अपनी गतिविधियों से बाज आयें।
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दुनिया मे यह काम सिर्फ ऑफिशियल, प्रोफेशनल, गवरमेंट फोर्सेज को करने की इजाजत होती है।
एक्सेप्ट..!!
जहाँ मिलिशिया हावी हो जाये।
मिलिशिया कहते है उन्हें जो अनट्रेंड, या हल्की फुल्की ट्रेनिंग के साथ, सशस्त्र गुंडा फोर्स हो। भारत मे नक्सली हों, नाजी जर्मनी की SS, या मुसोलिनी की ब्राउन शर्ट्स, वेगनर ग्रुप के भाड़े के लड़ाके- ऐसी मिलिशिया थे।
मिलिशिया, सरकारी नही होती।
वो सबकी नही होती।
एक गुट, कबीला, या विचारधारा की होती है। जिसे अपना वर्चस्व हथियारों के बल पर लागू करने, विरोधियों में दहशत फैलाने के लिए बनाया जाता है। पब्लिक को काबू में रखने के लिए, उन्हें नियम, कानून, मानवता के मानदंडों से अलहदा काम करने की छूट मिली होती है।
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हर जगह गवर्मेन्ट मिलिशियाओ को रोकती है। प्रतिबंधित करती है। लोकतन्त्र में तो मिलिशिया की कोई जगह ही नही होती। सिवाय ऐसी गवर्मेंट, जो फॉसिस्ट हो।
फासिज्म की सबसे बड़ी पहचान, मिलिशिया होती है।जनता के बीच से, अपने प्रचंड समर्थंको के नेतृत्व में, खास विचारधारा के प्रति ब्रेनवाश किये गए लोग भरे जाते हैं।
हल्की फुल्की ट्रेनिंग देकर, भोथरे लोमहर्षक तरीको से- जिसमे गाली, मारपीट, धमकी, दंगा, हत्या सब शामिल है- जनता को काबू में रखने का काम दिया जाता है।
इसलिए, अगर रेजीम, धुर फॉसिस्ट हो। तब वहां की मिलिशिया को सरकार, पुलिस, प्रशासन का संरक्षण मिल जाता है।
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बल्कि अगले चरण मे प्रमुख प्रशासनिक, मिल्ट्री, लॉ ऑर्डर से जुड़े पद भी इसी तरह के तत्वों को मिल जाते है।
सेकेंड वर्ल्ड वॉर में एसएस, जर्मन फौज पर हावी हो गई। एसएस अफसर मेयर, कमिश्नर, गवर्नर बनने लगे। रूस चीन में भी पार्टी के पोलिटिकिल कमिसार हावी हो गए। इटली में फॉसिस्ट पार्टी के सदस्य ही हर सेवा औऱ शक्ति केंद्र में बैठा दिए गए।
इस तरह फॉसिस्ट स्टेट का निर्माण हुआ।
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70 सालो में आई तमाम हिंदुस्तानी सरकारों की सबसे बडी असफलता, भारत मे फासिज्म के बिषबीज संरक्षित रखने वाली नर्सरी को, नेस्तनाबूद करने की नाकाबिलियत रही। अब बहुत देर हो गई है।
यह खरपतवार शहर शहर फैल चुकी है।
मिलिशिया दफ्तरों, यूनिवर्सिटी, और लोकतांत्रिक संस्थानों में बैठ गया है। सड़क पर खुलकर फ्लैग मार्च करता है। पुलिस उसे एस्कॉर्ट करती है। वर्दी लगाए, लाठी पकड़े, इन मतवालों की भीड़ चाहे जहाँ जा रही हो।
और भले ही इसमे आपके प्यारे पिता, भरोसेमंद भाई, शरीफ मित्र शामिल हों। पर वे अनजाने में, (या फिर समझ बूझकर) इस राष्ट्र को तबाही की राह में धकेल चुके हैं। पुलिस उनकी राह साफ कर रही है।
एंड दिस..
इज पॉइंट ऑफ नो रिटर्न!