यह कथा नहीं, एक गहरी सीख है — हर हिंदू को झकझोर देने वाली!
एक अंधेरी रात में सौ ऊँटों का काफिला एक रेगिस्तानी सराय में रुका। 99 ऊँटों को बाँध दिया गया, पर एक ऊँट बिना खूँटी-रस्सी के रह गया। खूँटी-रस्सी कहीं खो चुकी थी। अंधेरे में कुछ न सूझा, तो सरदार ने सराय के बूढ़े से मदद माँगी।
बूढ़ा बोला, “रस्सी-खूँटी नहीं है, पर एक उपाय है— नाटक करो! खूँटी ठोकने का, रस्सी बाँधने का, ऊँट को लगे कि वो बँध चुका है। वो बैठ जाएगा।”
सरदार ने हँसते हुए ऐसा ही किया — गड्ढा खोदा, हवा में खूँटी ठोकी, कल्पना की रस्सी बाँधी — और चमत्कार! ऊँट बैठ गया।
सुबह सब ऊँट उठे, पर वह सौवाँ ऊँट बैठा ही रहा। उसे भी उठाने की लाख कोशिश की, पर वो टस से मस न हुआ। बूढ़े ने कहा — “पहले खूँटी खोलो, रस्सी खोलो — वही जो है ही नहीं!”
जब वैसा ही किया गया, ऊँट भी उठ खड़ा हुआ।
बूढ़ा मुस्कराया — “यह ऊँटों की बात नहीं, हिंदुओं की बात है।”
आज का हिंदू भी उस ऊँट की तरह है — 1947 में स्वतंत्र हुआ, लेकिन मानसिक गुलामी की रस्सी आज भी गले में डाले हुए है।
अंग्रेज़ जा चुके हैं, पर उनकी भाषा, सोच, संस्कृति की खूँटी से आज भी बँधा है।
जो उसे जगाने आता है, वो उसे शत्रु लगता है।
वो अपनी गुलामी को ही अपनी पहचान समझ बैठा है।
अब समय है—खूँटी उखाड़ने का, रस्सियाँ खोलने का।
अब समय है—मूल संस्कृति, अपने धर्म, अपने गौरव को पहचानने का।
अब समय है—खड़े होने का, संगठित होने का, और एक वैभवशाली भारत के निर्माण का।
जय श्री राम | राष्ट्रहित सर्वोपरि |