वोट चोरी बहुत संगीन मसला है। इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। आरोप लगाने वालों की ज़िम्मेदारी है कि बिना प्रमाण के हल्के आरोप न लगाएँ। जवाब देने वालों की ज़िम्मेदारी है कि दूध का दूध और पानी का पानी करें।
हालिया आरोप अलग हैं — ये विपक्ष के नेता और राष्ट्रीय गठबंधन ने लगाए हैं, भारी-भरकम प्रमाण भी दिए हैं। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार — सब जगह वोटर लिस्ट में गंभीर गड़बड़ी के सबूत हैं।
लोकतंत्र में आस्था रखने वालों के लिए इन आरोपों को नज़रंदाज़ करना मुमकिन नहीं। जाँच की ज़िम्मेदारी चुनाव आयोग की है। अब चुनाव आयोग या फिर सुप्रीम कोर्ट या फिर जनता जनार्दन को कुछ करना होगा। वोट चोरी के राजनीतिक दंगल को हम दर्शक की तरह नहीं देख सकते।चूंकि इसमें किसी भी एक पहलवान की विजय में हमारी पराजय है। अगर सच की तह तक पहुंचे बिना वोट चोरी के आरोप ख़ारिज हो जाते हैं तो लोकतंत्र हारता है। अगर वोट चोरी साबित हो जाए लेकिन कुछ नहीं बदले तो भी लोकतंत्र हारता है।
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