श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 2, श्लोक 22 🌼
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्य्
अन्यानि संयाति नवानि देही॥
🪔 अर्थ:
जैसे मनुष्य पुराने और जीर्ण-शीर्ण कपड़ों को छोड़कर नए कपड़े धारण करता है,
उसी प्रकार आत्मा पुराने और नष्ट हो चुके शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करती है।
(Bhagwad Gyan):
👉 आत्मा कभी नहीं मरती… वह केवल शरीर बदलती है।
👉 इसलिए मृत्यु का डर नहीं, बल्कि आत्मा के सत्य को समझना जरूरी है।
👉 जो इस सत्य को जान लेता है, उसके जीवन में भय और मोह कम हो जाते हैं।