Part 3
Gurudevg siyag sidha yog
सन् १९६८ की सर्दी में प्रारम्भ होने वाली नवरात्रि से जप प्रारम्भ किया था। अतः काफी सर्दी पड़ रही थी। मैं रजाई ओढ़े आँख बंद किए लेटा हुआ था कि क्या देखता हूँ कि मेरे अन्दर नाभि से लेकर कण्ठ तक एक अजीब प्रकार की सफेद रोशनी ही रोशनी दिखाई दी। रोशनी के अलावा शरीर का कोई अंग जैसे लीवर, तिल्ली, फेफड़े, हार्ट (हृदय) आदि कुछ भी दिखाई नहीं दिया। मुझे यह देखकर अचम्भा हो रहा था कि रोशनी आँखों से दिखती है, फिर यह अन्दर कैसी रोशनी है? इसके अतिरिक्त ऐसी भयंकर सफेद रोशनी में भी कोई अंग क्यों दिखाई नहीं देता है?
मैं ज्यों ही उधर अधिक एकाग्र हुआ तो मुझे भँवरे के गुजन की आवाज सुनाई दी, जोकि नाभि में से आ रही थी। मैंने सोचा पेट में भँवरे की आवाज कैसे आ रही है? ज्यों-ज्यों मैं, उस आवाज की तरफ एकाग्र होता गया, मुझे स्पष्ट सुनाई देने लगा कि गायत्री मंत्र अपने आप ही अन्दर जपा जा रहा है। उसको जपने वाला कोई नजर ही नहीं आया, फिर भी वह अबाध गति से निरन्तर चलता रहा। करीब १०-१५ मिनट तक यह सब देखता, सुनता रहा और अपने मन में सोचता रहा कि कैसी विचित्र बात है कि रोशनी आँख से आती है और आवाज कण्ठ से, परन्तु यह सब उन अंगों से बहुत नीचे ही कैसे सुना और देखा जा रहा है? करीब पाँच बजे स्नानघर में नल का पानी जोर से फर्श (आँगन) पर गिरा तो ध्यान भंग हो गया। बच्चों ने शाम को नल खुला छोड़ दिया था।
इसके बाद उठकर, नित्यकर्म से निवृत्त होकर, अपने कार्य पर चला गया। सोचा, इतने लम्बे समय तक एक ही कार्यक्रम चलने और निरन्तर ध्यान उधर ही रहने के कारण, ऐसा ख्याल रह गया होगा। परन्तु इसके बाद एक ऐसा परिवर्तन आ गया कि मैं पान, सिगरेट, चाय आदि का प्रयोग करने में पूर्ण रूप से असमर्थ हो गया। इनके इस्तेमाल का ख्याल आते ही बहुत भयंकर घबराहट होने लगती थी। इस प्रकार चाहते हुए भी इन वस्तुओं का इस्तेमाल करना असम्भव हो गया। किसी के साथ खाना खाते और जीवन के किसी भी क्षेत्र में मुझे थोड़ा सा भी झूठ बोलते हुए भी भारी घबराहट होती थी।
क्योंकि जप पूर्ण रूप से बन्द कर चुका था, अतः धीरे-धीरे यह स्थिति शान्त हो गई और एक साधारण व्यक्ति की तरह, मैं फिर जीवन व्यतीत करने लगा। परन्तु एक विचित्रता शरीर में आ गई कि जीवन के किसी उद्देश्य पर अगर मेरा दिल-दिमाग अधिक एकाग्र होकर सोचने लगता तो उसका स्पष्ट परिणाम टेलीविजन की तरह, बहुत पहले स्पष्ट नजर आ जाता और आगे चलकर वह घटना ठीक वैसे ही घटती, जैसी मुझे दिखी थी। इस प्रकार करीब सालभर तक, मुझे असंख्य प्रमाण निरन्तर मिलते ही गए और सभी भौतिक जगत् में ठीक वैसे ही घटित होते चले गए, जैसे मुझे दिखे थे।
शब्दों के एक पुँज में ऐसी विचित्र सामर्थ्य और शक्ति होती है, उसकी मुझे कल्पना भी नहीं थी। अतः जिज्ञासावश मैंने फिर आराधना करने की सोची। विचार आया सबसे बड़ी शक्ति की आराधना की जाए। बहुत कुछ सोच-विचार के बाद भगवान् श्री कृष्ण की आराधना करने का निर्णय लेकर, आराधना प्रारम्भ कर दी। भगवान् श्री कृष्ण की तस्वीर, गायत्री की तरह सामने रखकर, कृष्ण के एक बीज मंत्र का जप प्रारम्भ कर दिया। इसकी न तो कोई निश्चित संख्या तय की और न कोई विशेष उद्देश्य। इसी जिज्ञासा से कि देखें अब क्या होता है, उसी क्रम से, सुबह-शाम करीब ढाई-तीन साल तक जप चलता रहा।
एक दिन विचार किया कि गायत्री मंत्र से तो एक सौ गुणा से भी अधिक संख्या हो चुकी होगी, फिर अभी तक वैसी ही कोई अनुभूति तो नहीं हुई, ऐसा सोचना था कि एक विचित्र स्थिति पैदा हो गई। हर समय एक परछाई तिरछी नजर से दिखाई देने लगी। जब सीधा देखता तो कुछ नहीं दिखता। सोचा, आँखों की कोई बीमारी हो गई है, डॉक्टरों के पास गया, परन्तु ऐसी कोई बीमारी नहीं निकली। वह क्रम और जप चलता रहा। एक दिन विचार आया कि अपने को इस विद्या का कोई ज्ञान तो है नहीं, कहीं व्यर्थ कष्टों में न फँस जाएँ, यह सोचकर मंत्र जप बन्द कर दिया, परन्तु परछाई दिखनी बन्द नहीं हुई। सोचा, इससे कुछ नुकसान तो नहीं हो रहा है दिखती है तो दिखने दो ।