नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी के अगुवा रबी लामिछाने का 5 दिवसीय भारत दौरा 5 जून, 2026 को खत्म हो गया। सब कुल मिलाकर ठीकठाक रहा, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस यात्रा के छिपे हुए कूटनीतिक मायनों को लेकर चर्चाएं तेज़ हैं।
सवाल सीधा और बेहद दिलचस्प है- जब नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह ने साफ कह दिया है कि वे कम से कम एक साल तक किसी भी विदेशी दौरे पर नहीं जाएंगे, तो फिर उनकी सत्तारूढ़ पार्टी RSP के अध्यक्ष रबी लामिछाने अचानक दिल्ली क्या करने आए थे?
——
अगर 'रीड बिटवीन द लाइंस' करें, तो इसके पीछे दो बहुत बड़े राजनीतिक परिदृश्य समझ आते हैं और ये पूरी तरह मेरा नज़रिया है, जिसके गलत होने के उतने चांस है, जितने सही होने के।
पहला- गुड कॉप, बैड कॉप की सोची-समझी रणनीति
संभव है कि दौरे के पीछे बालेन शाह और रबी लामिछाने के बीच एक सहमति हो। बालेन शाह नेपाल की घरेलू राजनीति में अपनी 'कट्टर राष्ट्रवादी' और दिल्ली के आगे न झुकने वाली युवा छवि को बनाए रखना चाहते हैं। उनका न आना उनके वोट बैंक को खुश रखता है।
लेकिन रबी लामिछाने व्यावहारिक राजनीतिज्ञ हैं। वे जानते हैं कि भारत जैसे अहम पड़ोसी को पूरी तरह नजरअंदाज या नाराज करके नेपाल में न तो सरकार चलाई जा सकती है और न ही आर्थिक स्थिरता आ सकती है। इसलिए शायद दोनों ने मिलकर तय किया- बालेन शाह घरेलू मोर्चे पर 'बैड कॉप' बने रहेंगे, जबकि रबी लामिछाने दिल्ली आकर 'गुड कॉप' की तरह कूटनीतिक डैमेज कंट्रोल करेंगे।
——
दूसरा- उभरते आंतरिक मतभेद और राजनीतिक कद बढ़ाने की होड़
नेपाल की राजनीति को करीब से देखने वाले जानते हैं कि बालेन और रबी, दोनों ही युवा और बेहद महत्वाकांक्षी नेता हैं। यह भी पूरी तरह मुमकिन है कि बालेन शाह जब अपने नो फॉरेन ट्रिप वाले स्टैंड पर अड़ गए, तो रबी लामिछाने ने इसे एक बड़े कूटनीतिक अवसर के रूप में देखा।
उन्होंने सोचा होगा कि पीएम के न जाने से जो वैक्यूम पैदा हो रहा है, उसका इस्तेमाल वे खुद को नेपाल के सबसे परिपक्व 'इंटरनेशनल स्टेट्समैन' के रूप में स्थापित करने के लिए करें। दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री एस जयशंकर और एनएसए अजीत डोभाल के साथ उनकी हाई प्रोफाइल मुलाकातें इस बात का सबूत हैं कि रबी ने काठमांडू में अपना राजनीतिक वजन बालेन शाह के मुकाबले काफी बढ़ा लिया है। दूसरी तरफ दिल्ली ने उनका जैसा स्वागत किया उससे भी साफ हुआ कि बीजेपी और सरकार उन्हें नेपाली प्रधानमंत्री से कम नहीं आंक रहे। फिर ये तथ्य है कि चेहरा भले बालेन हैं लेकिन पार्टी रबी की है। आखिर वो क्यों ना चाहेंगे कि कभी देश की गद्दी उनके पास हो!! पुष्प कमल दहल के कार्यकाल में वो देश के उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के पद तक पहुंच चुके हैं।
भारतीय उप महाद्वीप में जिस तरह अमेरिकी प्रभाव बढ़ रहा है और कई विशेषज्ञ बालेन को अमेरिका का समर्थन मानते हैं तो हो सकता है रबी अपने लिए भारत का समर्थन सिक्योर करना चाहते हों!
इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इस दौरे को आधिकारिक सरकारी दौरा नहीं बनाया गया। यह भारतीय जनता पार्टी के "Know BJP" अभियान के तहत एक 'पार्टी-टू-पार्टी' आमंत्रण था। इसे अनौपचारिक रखकर बालेन शाह के प्रोटोकॉल और अहं को ठेस पहुँचाने से बचा गया, नेपाल में विपक्ष को उंगली उठाने का मौका भी नहीं मिला, और रबी लामिछाने ने पूरी पारदर्शिता के साथ भारत के सामने नेपाल का पक्ष रखकर रिश्तों में एक बेहतरीन संतुलन भी बना दिया।
—
ये मेरा विश्लेषण था, आप क्या कहते हैं ज़रूर लिखिए।