Associate Editor @aajtakradio, Podcast: Padhaku Nitin & Sandarbh, Ex @CNBC_awaaz, @TV9Bharatvarsh, @News24tvchannel •Lawyer • Writer of #इतिइतिहास, #नफरतीचिंटू

Joined April 2013
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बेतरतीब दाढ़ी, सितारे लगी टोपी, मुंह में सिगार और पांव में ऊंचे जूते.. ये आदमी कई पीढ़ियों के ज़हन में है। भले नाम तुरंत याद ना आए तो भी कोई नहीं कह सकता कि मैंने इस आदमी को नहीं देखा। किसी का अंदाज़ा है कि ये कोई पॉप स्टार है तो किसी ने इसे अमेरिकी हीरो बताया। अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन अमेरिकी यूथ में आज खूब पसंद किया जाता है। टीशर्ट, जूते, हेलेमेट, लाइटर.. किसी भी चीज़ पर आप उसके चेहरे का दीदार कर सकते हैं। जाने-अनजाने कई पीढ़ियां उससे वाकिफ रही हैं। ये चे है.. अर्नेस्तो चे ग्वेरा। अर्नेस्तो ‘चे’ ग्वेरा ने क्यूबा का ना होकर भी वहां हुई सशस्त्र क्रांति में अहम रोल निभाया था। फिदेल कास्त्रो ने सरकार बनाई तो दूसरे देशों से संबंध स्थापित करने का ज़िम्मा उन्हें ही सौंपा। नेहरू सरकार ने चे को विशेष आमंत्रण भेजा और 30 जून 1959 को वो दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पहुंचे थे। किसी रॉकस्टार सरीखे दिखते चे की अगवानी प्रोटोकॉल ऑफिसर डी एस खोसला ने की थी। 1 जुलाई 1959 को चे और नेहरू की मुलाकात हुई औऱ उन्होंने साथ ही खाना खाया। वो दिल्ली के करीब पिलाना गांव भी गए थे। कमाल ये है कि चे की इस दौरे की जानकारी उन्हें चाहनेवालों को भी नहीं है। लोगों को ये बात हैरान करती है कि वो कभी भारत आए थे। यहां फाइल्स में उनका नाम अर्नेस्ट गेवारा दर्ज है। दिल्ली ही नहीं चे कलकत्ता भी गए और उसके अलावा कई और शहरों में भी। उनके इस दौरे की जानकारियां संजोने का काम किसी ने भी ठीक से नहीं किया। चे को फोटो खींचने का शौक था। उनके संग्रह में वो तस्वीरें भी हैं जो उन्होंने कलकत्ता की सड़कों पर खींची। कुछ उपलब्ध हैं। चे बंगाल के मुख्यमंत्री से भी मिले थे लेकिन ये बात फिर हैरान करती है कि वामपंथियों तक ने चे के दौरे पर कभी विस्तार से लिखना ज़रूरी नहीं समझा। खैर जब चे क्यूबा लौटे तो अपनी रिपोर्ट कास्त्रो को सौंपी। उसमें उन्होंने भारत के बारे में काफी कुछ लिखा है। सबसे अहम ये कि खुद हथियार लेकर क्रांति करनेवाले चे ने गांधी के सत्याग्रह के प्रति आदर का भाव प्रकट किया। ओम थानवी के एक लेख के मुताबिक चे ने रिपोर्ट में लिखा- ‘‘जनता के असंतोष के बड़े-बड़े शांतिपूर्ण प्रदर्शनों ने अंग्रेजी उपनिवेशवाद को आखिरकार उस देश को हमेशा के लिए छोड़ने को बाध्य कर दिया, जिसका शोषण वह पिछले डेढ़ सौ वर्षों से कर रहा था।’’ के पी भानुमति ने ऑल इंडिया रेडियो के लिए उनका साक्षात्कार दिल्ली के अशोका होटल में लिया था जहां वो ठहरे थे। चे ने तब उनसे कहा था - ‘आपके यहां गांधी हैं, दर्शन की एक पुरानी परंपरा है। हमारे लैटिन अमेरिका में दोनों नहीं हैं। इसलिए हमारी मन:स्थिति ही अलग ढंग से विकसित हुई है।’ कमाल देखिए कि चे ग्वेरा भारतीयों को युद्ध से दूर रहनेवाला मानते थे। उन्होंने रिपोर्ट में लिखा था - 'भारत में युद्ध शब्‍द वहां के जनमानस की आत्‍मा से इतना दूर है कि वह स्‍वतंत्रता आंदोलन के तनावपूर्ण दौर में भी उसके मन पर नहीं छाया।' अगर चे आज भारत का दौरा करते तो शायद भारत को लेकर उनकी बहुत सी राय बदल जाती। आज चे का जन्मदिन है। 14 जून 1928 को वो अर्जेंटीना में पैदा हुए थे। मानव को बंधन से आज़ाद कराने के लिए उन्होंने घर, पेशा और देश तक छोड़ दिए थे। आखिरकार बोलीविया में वहां की सरकार और सीआईए से लड़ते हुए वो अपने हिस्से की नौ गोलियां झेलकर मुक्त हो गए। मरते वक्त चे की उम्र महज़ 39 साल थी। #इतिइतिहास
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बात दिसंबर 2013 की है। न्यू यॉर्क की एक सड़क पर अमेरिकी एजेंसियों ने भारत की एक सीनियर महिला राजनयिक देवयानी खोबरागड़े को सरेआम गिरफ्तार कर लिया। आरोप था अपनी मेड को तयशुदा न्यूनतम वेतन से कम देने का, लेकिन अमेरिका ने कूटनीतिक मर्यादा की हदें पार की थीं। देवयानी को हथकड़ी लगाई गई, कपड़े उतरवाकर तलाशी ली गई और ड्रग एडिक्ट्स के साथ सेल में डाल दिया गया। जैसे खबर भारत पहुंची, देश में भूचाल आ गया। मनमोहन सरकार पर भारी दबाव था। यूं भी सिंह साहब को प्रो अमेरिकन पीएम माना जाता था और उन दिनों वो विपक्ष के निशाने पर लगातार बने हुए थे। सभी को उम्मीद थी कि कोई मंत्री अंग्रेज़ी में कड़ी आलोचना करेगा लेकिन जो खबरें टीवी पर फ्लैश हुईं उनसे सबको झटका लगा। अपनी इमेज के विपरीत मनमोहन सिंह बड़ी कड़ाई से पेश आए। रातोंरात बिना वक्त गंवाए दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के बाहर बुलडोजर और क्रेन भेजकर कंक्रीट के सारे भारी भरकम बैरिकेड्स उखाड़ फेंके गए। अमेरिकी अफसरों की एयरपोर्ट वाली वीआईपी सुविधाएं छीन ली गईं, उनके क्लबों पर ताले लटका दिए गए और उनकी ड्यूटी फ्री शराब पर पाबंदी लगा दी गई. सीधा संदेश था- अगर तुम हमारे एक राजनयिक का अपमान करोगे, तो हम मजबूर नहीं कि सारे नियम मानें। नतीजा यह हुआ कि ओबामा सरकार को झुकना पड़ा और देवयानी ससम्मान भारत वापस आईं। अमेरिका को बिल्कुल आइडिया नहीं था कि भारत उसे इस तरह जवाब देकर दुनिया में मिसाल कायम करेगा। ये वाकया आज इसलिए याद आ रहा है क्योंकि ओमान के तट पर एक कमर्शियल तेल टैंकर पर अमेरिकी सेना के हवाई हमले में हमारे तीन बेकसूर भारतीय नाविकों - सुरेश, आदित्य और शिवानंद की दर्दनाक मौत हो गई। इसके बाद विदेश मंत्रालय और जहाजरानी मंत्रालय ने इस हमले की सख्त निंदा की और दिल्ली में अमेरिकी दूतावास के शीर्ष अधिकारियों को तलब करके अपनी नाराजगी दर्ज कराई। भारत ने कहा भी है कि व्यापारिक जहाजों पर इस तरह के सैन्य हमले तुरंत रुकने चाहिए। बावजूद इसके हम जैसा हर हिंदुस्तानी इंतज़ार में है कि अमेरिका को कुछ ऐसा जवाब दिया जाना चाहिए कि उसे 2013 याद आए। कमाल ये है कि हाल में उस क्वाड की मीटिंग अटेंड करने अमेरिकी विदेशमंत्री रूबियो खुद दिल्ली पहुंचे थे जो मुक्त समुद्री आवाजाही का समर्थन करता है। भारत इसका मेंबर है और अमेरिका ने क्वाड की दलीलों के उलट काम करने में ज़रा हिचक नहीं दिखाई। ये भी बता दूं कि जिस जहाज पर हमला हुआ वो अंतरराष्ट्रीय कानूनों को मानकर चल रहा था। अफसोस कि चीन से हमको भिड़ाने का ख्वाब रखनेवाला अमेरिका अपनी इस करतूत पर बिल्कुल माफी मांगने के मूड में नहीं दिख रहा। आप सोचिए अगर इस संघर्ष में तीन अमेरिकी मारे जाते तो क्या ट्रंप ऐसे बैठा होता? हमारे लोगों की प्रति व्यक्ति आय भले कम हो लेकिन क्या जान की कीमत भी अमेरिकियों से कम है??? ये सवाल सबको मथता रहा है, ऐसी घटना के बाद और भारी हो जाता है।
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नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी के अगुवा रबी लामिछाने का 5 दिवसीय भारत दौरा 5 जून, 2026 को खत्म हो गया। सब कुल मिलाकर ठीकठाक रहा, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस यात्रा के छिपे हुए कूटनीतिक मायनों को लेकर चर्चाएं तेज़ हैं। सवाल सीधा और बेहद दिलचस्प है- जब नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह ने साफ कह दिया है कि वे कम से कम एक साल तक किसी भी विदेशी दौरे पर नहीं जाएंगे, तो फिर उनकी सत्तारूढ़ पार्टी RSP के अध्यक्ष रबी लामिछाने अचानक दिल्ली क्या करने आए थे? —— अगर 'रीड बिटवीन द लाइंस' करें, तो इसके पीछे दो बहुत बड़े राजनीतिक परिदृश्य समझ आते हैं और ये पूरी तरह मेरा नज़रिया है, जिसके गलत होने के उतने चांस है, जितने सही होने के। पहला- गुड कॉप, बैड कॉप की सोची-समझी रणनीति संभव है कि दौरे के पीछे बालेन शाह और रबी लामिछाने के बीच एक सहमति हो। बालेन शाह नेपाल की घरेलू राजनीति में अपनी 'कट्टर राष्ट्रवादी' और दिल्ली के आगे न झुकने वाली युवा छवि को बनाए रखना चाहते हैं। उनका न आना उनके वोट बैंक को खुश रखता है। लेकिन रबी लामिछाने व्यावहारिक राजनीतिज्ञ हैं। वे जानते हैं कि भारत जैसे अहम पड़ोसी को पूरी तरह नजरअंदाज या नाराज करके नेपाल में न तो सरकार चलाई जा सकती है और न ही आर्थिक स्थिरता आ सकती है। इसलिए शायद दोनों ने मिलकर तय किया- बालेन शाह घरेलू मोर्चे पर 'बैड कॉप' बने रहेंगे, जबकि रबी लामिछाने दिल्ली आकर 'गुड कॉप' की तरह कूटनीतिक डैमेज कंट्रोल करेंगे। —— दूसरा- उभरते आंतरिक मतभेद और राजनीतिक कद बढ़ाने की होड़ नेपाल की राजनीति को करीब से देखने वाले जानते हैं कि बालेन और रबी, दोनों ही युवा और बेहद महत्वाकांक्षी नेता हैं। यह भी पूरी तरह मुमकिन है कि बालेन शाह जब अपने नो फॉरेन ट्रिप वाले स्टैंड पर अड़ गए, तो रबी लामिछाने ने इसे एक बड़े कूटनीतिक अवसर के रूप में देखा। उन्होंने सोचा होगा कि पीएम के न जाने से जो वैक्यूम पैदा हो रहा है, उसका इस्तेमाल वे खुद को नेपाल के सबसे परिपक्व 'इंटरनेशनल स्टेट्समैन' के रूप में स्थापित करने के लिए करें। दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विदेश मंत्री एस जयशंकर और एनएसए अजीत डोभाल के साथ उनकी हाई प्रोफाइल मुलाकातें इस बात का सबूत हैं कि रबी ने काठमांडू में अपना राजनीतिक वजन बालेन शाह के मुकाबले काफी बढ़ा लिया है। दूसरी तरफ दिल्ली ने उनका जैसा स्वागत किया उससे भी साफ हुआ कि बीजेपी और सरकार उन्हें नेपाली प्रधानमंत्री से कम नहीं आंक रहे। फिर ये तथ्य है कि चेहरा भले बालेन हैं लेकिन पार्टी रबी की है। आखिर वो क्यों ना चाहेंगे कि कभी देश की गद्दी उनके पास हो!! पुष्प कमल दहल के कार्यकाल में वो देश के उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के पद तक पहुंच चुके हैं। भारतीय उप महाद्वीप में जिस तरह अमेरिकी प्रभाव बढ़ रहा है और कई विशेषज्ञ बालेन को अमेरिका का समर्थन मानते हैं तो हो सकता है रबी अपने लिए भारत का समर्थन सिक्योर करना चाहते हों! इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इस दौरे को आधिकारिक सरकारी दौरा नहीं बनाया गया। यह भारतीय जनता पार्टी के "Know BJP" अभियान के तहत एक 'पार्टी-टू-पार्टी' आमंत्रण था। इसे अनौपचारिक रखकर बालेन शाह के प्रोटोकॉल और अहं को ठेस पहुँचाने से बचा गया, नेपाल में विपक्ष को उंगली उठाने का मौका भी नहीं मिला, और रबी लामिछाने ने पूरी पारदर्शिता के साथ भारत के सामने नेपाल का पक्ष रखकर रिश्तों में एक बेहतरीन संतुलन भी बना दिया। — ये मेरा विश्लेषण था, आप क्या कहते हैं ज़रूर लिखिए।
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बांग्लादेश और भारत के बीच रिश्तों में गिरावट अभी थमी नहीं है। पिछले एक दशक (2014 से 2024) तक बांग्लादेश अपने सिविल सर्विस अधिकारियों को ट्रेनिंग के लिए भारत के मसूरी भेजता था। इस दौरान करीब 2,500 बांग्लादेशी अधिकारियों ने भारत में प्रशासनिक गुर सीखे लेकिन 2024 में बांग्लादेश में हुए तख्तापलट के बाद दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट आ गई, जिससे यह ट्रेनिंग प्रोग्राम रुक गया। अब बांग्लादेश ने भारत पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए पाकिस्तान का हाथ थाम लिया है। 'पाकिस्तान-बांग्लादेश नॉलेज कॉरिडोर' के तहत मई 2026 में इतिहास में पहली बार बांग्लादेशी अधिकारियों का एक उच्चस्तरीय दल पाकिस्तान के लाहौर स्थित सिविल सर्विसेज एकेडमी में ट्रेनिंग ले रहा है, और इस पूरी ट्रेनिंग का खर्च भी पाकिस्तान सरकार उठा रही है। सिर्फ ब्यूरोक्रेसी ही नहीं, बल्कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते भी बदल रहे हैं। अब पाकिस्तान से बांग्लादेश के लिए सीधी उड़ानें और कराची से चटगांव बंदरगाह तक सीधे समुद्री जहाज भी चलने लगे हैं। सरल शब्दों में कहें तो बांग्लादेश अब अपनी विदेश नीति को बदलने और पाकिस्तान के करीब जाने की कोशिश कर रहा है, जो भारत के लिए एक बड़ा कूटनीतिक बदलाव है। मेरी समझ कहती है इसके पीछे बहुत चीज़ें हैं लेकिन अमेरिका असल सूत्रधार है। वक्त का कमाल, जिन पाकिस्तानियों के जुल्म से तंग आकर बंगालियों ने अलग मुल्क बनाया और जिन अमेरिकियों ने भारत को बीच में पड़ने से रोकने के लिए जंगी बेड़ा भेजा आज वो बांग्लादेशियों के मार्गदर्शक बने हुए हैं।
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Take Right from here.
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भाषा ने अकेले होने के दर्द को ज़ाहिर करने के लिए शब्द रचा “अकेलापन”, अकेले होने को प्रतिष्ठा देने के लिए शब्द दिया “एकांत”. - Paul Tillich
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राघव चड्ढा बीजेपी में चले गए हैं। जिस तरह के मुद्दे वो पिछले दिनों उठा रहे थे लेकिन सरकार पर हमलावर ना दिखते हुए.. उससे साफ है कि स्क्रिप्ट काफी पहले लिखी जा चुकी थी। राघव को अपना करियर उसी तरह बनाने का पूरा हक है जैसे केजरीवाल ने अन्ना से छिटक कर बनाया। राजनीति में किसी का अहसान आप पर सिर्फ तब तक है जब तक आप मानते रहें।
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बालेन शाह हीरो थे। अब आपको उनके विरुद्ध ख़बरें सुनने को मिल सकती हैं क्योंकि उन्होंने भी तेवर दिखाने शुरू कर दिए। नेपाल का भारत विरोधी व्यवहार एक पैटर्न है। पॉलिसी है। ये एक दो फैसलों की बात नहीं। ज़्यादा पहले की घटनाओं का क्या कहें अभी साल दो साल में ऐसा बहुत कुछ घटा जिसे देख नई दिल्ली को अपनी नेपाल नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए था। जैसे- 1. नेपाल सरकार ने 2025 के अंत में सौ रुपए के नए नोट जारी करने का फैसला लिया, जिस पर नेपाल का वो नया नक्शा छपा है जिसमें लिपुलेख, कालापानी और लिंपियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया है। सब जानते हैं कि भारत इन क्षेत्रों को अपना अभिन्न अंग मानता है। 2. इसी हफ्ते बालेन शाह सरकार ने भारत से आने वाले सामान पर सख्ती बढ़ा दी है। अब भारत से सौ रुपए से अधिक मूल्य का सामान लाने पर सीमा शुल्क (Customs Duty) अनिवार्य कर दिया गया है। मधेस और तराई क्षेत्र इससे तनाव में हैं। स्थानीय लोग इसे भारत के साथ पारंपरिक रोटी-बेटी के संबंधों और सहज व्यापार पर हमला मान रहे हैं। हाल के दिनों में कई बॉर्डर पॉइंट्स पर झड़पें भी देखी गई हैं। 3. नेपाल की नई युवा पीढ़ी के नेतृत्व वाली पार्टियों और वामपंथी दलों ने 1950 की शांति और मित्रता संधि को 'असमान' बताते हुए इसे रद्द करने या पूरी तरह बदलने की मांग तेज़ कर दी है। इस संधि को दोनों देशों के बीच संबंधों की आधारशिला माना जाता है। यह संधि 31 जुलाई 1950 को काठमांडू में नेपाल के अंतिम राणा प्रधानमंत्री मोहन शमशेर जंग बहादुर राणा और नेपाल में भारत के तत्कालीन राजदूत चन्देश्वर नारायण सिंह के बीच हस्ताक्षरित हुई थी। 4. नेपाल सरकार ने हालिया बयानों में मांग की है कि भारत को नेपाल से नीचे की ओर बहने वाले "रेगुलेटेड वाटर" (सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के लिए) का भुगतान करना चाहिए। यह जल संधियों के पारंपरिक ढांचे से हटकर एक नई और सख्त लाइन है। 5. अग्निवीर योजना पर भी नेपालियों का अड़ियल रुख बरकरार है। मुझे नहीं पता कि इसका कोई समाधान निकला है क्या? निकला हो तो आप बताइए लेकिन ये ऐसा मुद्दा था जिस पर नेपाली युवा भारत सरकार की नीति से सहमत नहीं थे। हमने पढ़ाकू नितिन “वर्ल्ड अफेयर्स” में नेपाल पर कई बार बात की हैं। हर बार एक्सपर्ट्स ने यही कहा कि नेपाल को लेकर हमने जिस आश्वस्ति और फॉर ग्रान्टेडनेस का परिचय अब तक दिया वो छोड़ना पड़ेगा। उम्मीद है सरकार को भी यही राय मिलती हो।
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सुकरात इसलिए सबसे विद्वान था क्योंकि वो जानता था कि वो नहीं जानता, और ये बात उसने तब जानी जब जानने का दावा करनेवालों से मुलाकात की. इन मुलाक़ातों से सुकरात ने जाना कि जानने का दावा करनेवाले कतई नहीं जानते और जब उसने सबको बताया कि जाननेवाले अनजान हैं तो कुपित लोगों ने उसे हेमलॉक पिला दिया। आज हम उसके हत्यारों को नहीं जानते मगर सुकरात को जानते हैं। हम जानते हैं कि सुकरात विद्वान था क्योंकि वो जानता था कि वो नहीं जानता। (एथेंस की जेल जहां सुकरात कैद था)
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एक बार आठ-दस साल का चार्ली चैप्लिन लंदन की दुपहरी में घर के बाहर खड़ा था. बस यूं ही गली की हलचल देख टाइमपास कर रहा था. तभी उसने देखा कि एक आदमी छोटे से मेमने को पकड़े हुए गली से गुज़र रहा है. गली के सिरे पर एक कसाईखाना था. अचानक ही मेमना उस आदमी की पकड़ से छूट गया और जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगा. इधर मेमना छूटा और उधर आदमी ने उसे पकड़ने को दौड़ लगाई. मेमना था कि हाथ ही ना आए.. कभी इधर फुदकता तो कभी उधर. गली-मुहल्ले के बच्चे ये नज़ारा देख पेट पकड़कर हंसने लगे. चार्ली ने भी जब छुटकू से मेमने को उस लंबे-चौड़े आदमी को हलकान करते देखा तो खूब हंसा. पांच-दस मिनट तक ये खेल चलता रहा. आखिरकार मेमना उस आदमी के हाथ लग ही गया. थकान और गुस्से से चूर उस आदमी ने मेमने को बहुत ही क्रूरता से जकड़ा और कंधों पर रखकर चल दिया. हंसी का दौर जैसे ही थमा, अचानक एक ख्याल ने चार्ली को हिलाकर रख दिया. उसे समझ आया कि अभी जो मेमना दौड़ लगा रहा था वो अपनी मौत से बचने की कोशिश कर रहा था. कुछ ही देर बाद मेमना जिबह कर दिया जाएगा. उसकी मुलायम गर्दन को किसी तलवार या बड़े चाकू से काट दिया जाएगा .उसका संघर्ष कितना दयनीय लेकिन ठीक उसी वक्त कितना हास्यपूर्ण था. नन्हा चार्ली कल्पना करने मात्र से विचलित हो उठा. वो भागकर घर में घुसा और मां की गोद में मुंह छिपाकर रोने लगा. चार्ली को इस हालत में देखकर मां घबरा गई. उसने प्यार से चार्ली के सिर पर हाथ फेरा. उसके रोने की वजह पूछी लेकिन वो बस रोता गया. अपनी आत्मकथा में चार्ली चैप्लिन ने इस घटना का ज़िक्र किया है और बताया है कि कैसे कई बार ज़िंदगी की ट्रेजेडी और कॉमेडी आपस में मिक्स होती हैं. किसी की ट्रेजडी किसी की कॉमेडी बन जाती है, जैसे कोई गिर पड़ा और आप उसे देखकर हंस पड़े। ऐसे ही कोई ट्रेजडी कुछ दिन बाद कॉमेडी हो जाती है, जैसे आप गिरे लेकिन बाद में याद करके हंसे। चार्ली चैप्लिन ने अपनी फिल्मों में भी यही किया. मैंने इस सूत्र को समझने के बाद उनकी फिल्में देखी तो उस दृष्टि और गहराई का कायल हो गया. चार्ली एक फिल्म में श्रमिक बनते हैं। वो एक फैक्ट्री में खड़े हैं जहां उनके सामने एक मेज पर चलनेवाली पट्टी है। उस पट्टी पर एक के बाद एक कुछ सामान चार्ली के पास पहुंचता है और उन्हें उस सामान का पेंच ठीक करना होता है। ऐसा करने के लिए उन्हें दो ही सेकेंड मिलते थे। चलायमान पट्टी पर अगर उन्होंने दो सेकेंड से ज़्यादा लगाया तो अगला सामान इतनी देर में उनके पास पहुंच जाता था। बेचारे चार्ली इतनी तेज़ी से काम नहीं कर पाते और फिर इसी चक्कर में वो पट्टी के साथ चलते-चलते मशीन के बड़े से मुंह में जा फंसते हैं। देखनेवालों को ये बड़ा मनोरंजक लगेगा लेकिन चार्ली चैप्लिन अपनी फिल्म के ज़रिए पूंजीपतियों का वो जानलेवा दबाव दिखा रहे थे जो श्रमिकों पर लगातार बना हुआ था। श्रमिकों को तयशुदा घंटों में ज़्यादा से ज़्यादा उत्पादन करना होता था और ऐसा उनकी जान की परवाह किए बगैर चलता रहता था। इसी तरह चार्ली चैप्लिन एक सर्कस में काम करनेवाले चरित्र को निभाते हैं। वो वहां पर शायद जोकर की नौकरी करते हैं लेकिन उन्हें जो लड़की पसंद है वो एक जानलेवा करतब करनेवाले पर फिदा है। चार्ली चैप्लिन उसे रिझा लेना चाहते हैं। एक दिन अचानक करतब करनेवाला सर्कस के शो पर नहीं पहुंचता। चार्ली को लगता है कि लड़की को प्रभावित करने का यही मौका है। वो बिना सोचे उस करतब करनेवाले की जगह जा पहुंचते हैं। दर्शकों को उनकी ये स्थिति बहुत हंसाती है मगर यदि आप अपनी ज़िंदगी पर नज़र डालें तो वहां भी ऐसा कुछ मिलेगा, पर आप उस पर हंसते नहीं बल्कि अपने बेचारगी पर दुखी होते हैं। तो ऐसा ही कुछ कमाल था उस अभिनेता का जो मुझे पसंद है। वो सिर्फ अभिनेता नहीं था बल्कि कहानी कहने की कला में निपुण संपूर्ण शो मैन था। असल ज़िंदगी में भी चार्ली चैप्लिन ने अपनी संवेदनशीलता की वजह से बहुत कुछ भुगता। एक वक्त तो ऐसा आया कि अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनों ही छोड़कर जाना पड़ा। आज उनका जन्मदिन है। #इतिइतिहास
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Bro, मैच बीस ओवर का हो या 11 का!! जीतेगा कौन?? Rajasthan Royals!
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मटर कुल्चों में पड़ने वाली खटाई बहुत महत्वपूर्ण है। मेरे परिचितों में कोई मटर कुल्चे बनानेवाला नहीं है, लेकिन जो भी किसी मटर कुल्चे बनानेवाले को जानते हों कृपया उन तक मेरी बात पहुंचाएं। थोड़ा पनियल मटर ज़्यादा स्वाद लगते हैं। दिल्ली में तो स्विमिंग पूल वाले मटर कुल्चे बनते हैं क्योंकि अंकल मटरों को गोल गोल साइड लगाकर बीच में खटाई का पानी भर देते हैं। इसके अतिरिक्त मुझे ये भी कहना है कि गोलगप्पे वाले भैया अपनी दुकान तुरंत बढ़ा लिया करें जैसे ही चटनी/सोंठ खत्म हो। ऐसे पानी पतासों का कोई मतलब नहीं जिनमें पानी खट्टा मीठा ना हो। मीठा ना हो तो आदमी गोलगप्पे क्यों खाये वो जलजीरा ही पी ले, या चार हाजमोला पानी में मिलाकर पी जाए! #मनखट्टा फोटो पालकपत्ता चाट का है। ये काफी अंडर रेटेड चल रही है तो लगा दिया।
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बचपन से उसे मेहनत करने की आदत थी। ना करता तो ज़िंदा बच पाना मुश्किल था। वो अपना देश और शहर छोड़कर परदेस में इसलिए जान खपा रहा था ताकि गरीबी के अभिशाप से जान छुड़ा सके। पांच महीने की जी तोड़ मेहनत के बाद वो फिलाडेल्फिया से ऊबने लगा था। एक हफ्ते की छुट्टी पर जाने का मौका मिला तो उसने ज़िंदगी में पहली बार अमीरों की तरह बर्ताव करने की ठानी। अच्छा एक्टर था इसलिए वैसी एक्टिंग करने भी लगा। तुरत-फुरत एक शोरूम में पहुंचा और पाई-पाई बचाने की कंजूसी के उलट महंगा ड्रेसिंग गाउन और 75 डॉलर का शानदार सूटकेस खरीदा। दुकानदार ने प्रभावित होकर सूटकेस घर पर ही भिजवाने का प्रस्ताव रखा तो उसे अचानक अहसास हुआ कि वो किसी पिरामिड के शीर्ष पर खड़ा है। ज़िंदगी उसके साथ ऐसे अदब से कभी पेश नहीं आई थी। इसके बाद उसने शहर के सबसे महंगे होटल का रुख किया। डर्बी टोप पहन शान से छड़ी घुमाते हुए उसने होटल एस्टॉर में प्रवेश किया। अमीरी और शानो शौकत के साथ सहज नहीं था इसलिए जगमगाहट देख थोड़ी देर के लिए घबराहट हुई। डेस्क पर संभलकर अपना नाम दर्ज कराया और जब कमरे का एक दिन का किराया पता किया तो पैसा एडवांस में जमा करने की पेशकश की। अब तक सरायों और सस्ते होटलों में ठहरने का तजुर्बा उसका पीछा कर रहा था। गरीबी का भूत चारों तरफ नाच रहा था और वो था कि दौड़े चला जा रहा था। दमकती लॉबी से गुज़रा तो मन भर आया। कमरे में पहुंचकर बाथरूम के हर आइने और नल का मुआयना करने लगा। हाथों से सब कुछ छूकर देखता रहा। वो अपना हर पैसा वसूल लेना चाहता था। अपने पैसों पर ऐश करने का उसका पहला मौका था। नहा धोकर कुछ पढ़ने की इच्छा हुई लेकिन फोन करके अखबार तक मंगाने का आत्मविश्वास खुद में पैदा नहीं कर सका। कुछ रुक कर कपड़े पहने और बाहर निकल आया। वो किसी सम्मोहन में बंधा डिनर हॉल तक पहुंच गया। वेटर ने एक टेबल तक उसे गार्ड किया और पल भर बाद वो फिर से अदब की दुनिया के पिरामिड पर बैठा था। वेटरों की फौज उसे ठंडा पानी, मेन्यू, मक्खन और ब्रेड पेश कर रही थी। वो बेचारा संभल कर अपनी सबसे उम्दा अंग्रेज़ी बोल रहा था। खा-पी कर उसने एक डॉलर की बड़ी टिप दी। वो कमरे में लौट फिर बाहर निकल आया। उसके भीतर कुछ तो था जो बाहर आने को खदबदा रहा था। समझ वो भी नहीं पा रहा था कि ये ज्वालामुखी आखिर किस वजह से फटना चाहता है। चलते-चलते मेट्रोपॉलिटन ओपेरा पहुंच उसने ना जाने क्यों जर्मन ग्रैण्ड ओपेरा का टिकट खरीदा। उसे ये कभी पसंद नहीं था। जर्मन भाषा में ओपेरा चलता रहा और वो ऐसे ही बैठा रहा। जैसे ही रानी के मरने का दृश्य आया अचानक फूट-फूट कर रोने लगा। आसपास कौन है और क्या सोच रहा है उसे कुछ खबर नहीं थी। वो बस रोये चला जा रहा था। वो तब तक रोया जब तक बदन की ताकत बाहर नहीं निकल गई। आखिरकार निढाल होकर उसे चैन मिला. ये चार्ली चैप्लिन था जिसने बला की गरीबी के बाद पैसे और शोहरत की इंतहां देखी और अगले महीने उनका जन्मदिन है. - नितिन ठाकुर
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अब ईरान वाली वॉर का फॉलोअप लेते ठीकठाक वक्त हो गया है। कई पॉडकास्ट भी हो गए। जितना समझ आ रहा है वो ये कि इस जंग को खत्म करने का सौभाग्य ट्रंप को नहीं मिलेगा। उसने खामेनेई को सद्दाम या गद्दाफी समझ लिया था जो अपने देशों में पर्याप्त अलोकप्रिय हो चुके थे। वहां विरोध में खड़े होनेवाले संगठन अमेरिका को मिल गए थे। ईरान की स्क्रिप्ट में ये सब गायब है। फिर ईरान की आबादी, ताकत, तंत्र सब कुछ क्रूर नेता में तब्दील हो चुके सद्दाम और अय्याशी के पर्याय के तौर पर देखे जानेवाले गद्दाफी के मुकाबले बड़े और बेहतर रहे। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूज़ को अमेरिका के गले की घंटी बनाने का विकल्प भी उनके पास नहीं था जो ईरानियों के पास है। अब हालत ये है कि ट्रंप दुनिया को बातचीत का आश्वासन देकर स्थितियां सामान्य बनाने का प्रयास कर रहे हैं, ईरानी मीम बनाकर ट्रंप का मज़ाक उड़ा रहे हैं। ईरान के पड़ोसी विचार करने लगे हैं कि अमेरिका के अड्डे अपने यहां रखना सुरक्षा की जगह नुकसान का कारण बनने लगा है तो क्या अब वक्त है कि अपनी सिक्योरिटी के लिए कहीं और देखना चाहिए? नेतन्याहू की बात अलग है। उनके लिए ये इतिहास सही करने का अवसर है। अपना राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने का भी। उनकी किस्मत से एक अमेरिकी राष्ट्रपति मोसाद के तर्कों पर राज़ी होकर जंग को तैयार हो गया लेकिन नतीजे जैसे आए हैं उसके बाद सोच विचार इज़रायल में चल रहा है। हिज़बुल्ला और हमास बस संगठन थे मगर ईरान एक राष्ट्र है। सारे गणित उलटा सकने की क्षमता दिखानेवाला राष्ट्र। भारत सरकार की फॉरेन पॉलिसी थोड़ी भ्रम का शिकार रही। जंग के एक दिन पहले नेतन्याहू की बगल में खड़े दिखना कोई रणनीति नहीं हो सकती। ये सिर्फ गलत सलाहकारों की सलाह का नतीजा कहा जा सकता है। हालांकि अच्छा ये है कि ईरान को लेकर जो कुछ जनसमर्थन और मीडिया का भाव दिखा उसके चलते ईरानी सरकार ने समझा होगा कि भारत इस जंग के पक्ष में नहीं है। पिछले कुछ दिनों में जो तटस्थता सरकार ने दिखाई वो भी ठीक थी। हां कुछ लोग भारत सरकार से स्टैंड की मांग कर रहे हैं लेकिन मुझे नहीं लगा कि अभी किसी स्टैंड का कोई वक्त है। जितना हो सके अमेरिका से दूर दिखना चाहिए। इज़रायल से दोस्ती व्यवहारिक ज़रूरत है पर उन्होंने हमें कभी वेस्ट एशिया की लड़ाई में नहीं खींचा सो अपने को दूरी रखनी चाहिए। वैसे भी जिनके घरों में सिलेंडर और तेल की कमी का खतरा हो उनको ज़्यादा चैंपियन नहीं बनना चाहिए। हमारे पास वेनेजुएला या इराक का तेल नहीं है। बेसिकली ज़रूरत है कि पहले हम अंदर से मज़बूत बनें। बिन मज़बूती स्टैंड लेकर नुकसान उठाने का कोई फायदा नहीं। ये कोई नैतिक युद्ध भी नहीं। दूर से “लड़ो मत लड़ो मत” पहले भी किया है अब भी जारी रखें। खामेनेई की हत्या और बच्चियों की मौत पर शोक ज़ाहिर करनेवाला टाइम तो पहले ही गंवा दिया, सो अब जो है वो है। अगर तब किया होता तो हम ट्रंप को एम्बेरेस करके उस हरकत का बदला लेते जो उसने भारत पाकिस्तान वाली झड़प के दौरान सीज़फायर का क्रेडिट लेने के लिए की थी।
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