राजकुमार माँझी ने अपनी पत्नी और बेटी को इस भगदड़ में खो दिया. बेटा किसी तरह बच तो गया, लेकिन भीड़ में बिछड़ गया,अब न जाने वो कहाँ होगा.
अब सोचिए, राजकुमार माँझी जैसे कितने ही लोग होंगे, जिन्हें यह तक नहीं पता कि उनकी ट्रेन का नंबर क्या है, वह किस प्लेटफार्म पर आएगी. वे लाइव ट्रैकिंग जैसी तकनीकों से अनजान हैं.
ऐसे लोगों के लिए कितनी व्यवस्था है, कितने वालंटियर ऐसे लोगों की मदद के लिए स्टेशन पर होते हैं.
ऊपर से अंतिम समय में प्लेटफॉर्म को बदल देना अपराधिक कृत्य है.
ऐसे हजारों लोग रोज़ सिर्फ एक सामान्य टिकट के सहारे रेलवे स्टेशन पहुंचते हैं, इस भरोसे के साथ कि भारतीय रेल उन्हें उनकी मंज़िल तक पहुँचा देगी. लेकिन इस हादसे ने कई परिवारों से उनकी मंज़िल ही छीन ली-कुछ ने अपनों को हमेशा के लिए खो दिया, तो कुछ अपनों से बिछड़ गए.