Joined August 2010
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मैं बोलता हूँ तो इल्ज़ाम है बग़ावत का मैं चुप रहूँ तो बड़ी बेबसी सी होती है - बशीर बद्र
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उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए #basheerbadr #poetry
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वो जिन दरख़्तों की छाँव में से मुसाफ़िरों को उठा दिया था उन्हीं दरख़्तों पे अगले मौसम जो फल न उतरे तो लोग समझे ! वो गाँव का इक ज़ईफ़ दहक़ाँ सड़क के बनने पे क्यूँ ख़फ़ा था  जब उन के बच्चे जो शहर जाकर कभी न लौटे तो लोग समझे !! अहमद सलमान
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बैठे बैठे कैसा दिल घबरा जाता है जाने वालों का जाना याद आ जाता है हँसती-बस्ती राहों का ख़ुश-बाश मुसाफ़िर रोज़ी की भट्टी का ईंधन बन जाता है दफ़्तर मंसब दोनों ज़ेहन को खा लेते हैं घर वालों की क़िस्मत में तन रह जाता है ज़ेहरा निगाह
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मुझको तो कोई टोकता भी नही यही होता है ख़ानदान में क्या ।। जॉन एलिया
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हम ने उस को इतना देखा जितना देखा जा सकता था लेकिन फिर भी दो आँखों से कितना देखा जा सकता था !! फर्रुख यार
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कोई मौजूद ना होकर भी मुहैय्या हो जाये ऐसा होता नही लेकिन अगर ऐसा हो जाये ।। जावेद शेख़
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कुछ ऐसी बात न थी तुझसे दूर हो जाना ये बात अलग है कि रह-रह के दर्द होता था — फ़िराक़
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ये तेरे ख़त तिरी ख़ुशबू ये तेरे ख़्वाब-ओ-ख़याल, मता-ए-जाँ हैं तिरे क़ौल और क़सम की तरह.!! ~जॉन एलिया
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कोई मौजूद ना होकर भी मुहैय्या हो जाये ऐसा होता नही लेकिन अगर ऐसा हो जाये ।। जावेद शेख़
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हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस जो तअल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं || अब्बास ताबिश
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अभी अये ज़िन्दगी तुझको हमारा साथ देना है अभी बेटा हमारा सिर्फ शाने तक पहुँचता है !! मुन्नवर राणा
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टहलते फिर रहे हैं सारे घर में तेरी खाली जगह को भर रहे हैं ।। - फहमी बदायुनी
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कमरा खोला तो आँख भर आई ये जो ख़ुशबू है जिस्म थी पहले !!   - फहमी बदायुनी
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बरगद की इक शाख़ हटा कर जाने किस को झाँका चाँद !! परवीन शाकिर
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हम तुझे शहर में यूँ ढूंढते है, जिस तरह लोग सकूँ ढूंढते है !! फरहत अब्बास
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मदरसा मेरा मेरी ज़ात में है ख़ुद मोअल्लिम हूँ ख़ुद किताब हूँ मैं !! साक़ी अमरोहवी #HappyTeachersDay
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वो न आएगा हमें मालूम था इस शाम भी इंतिज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे - परवीन शाकिर
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मैं हूँ दिल है तन्हाई है तुम भी होते अच्छा होता ।। फ़िराक़ गोरखपुरी
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