आज न कल, सबका यही हाल होना है
आप आएँगे अपने पैतृक निवास पर,
अपने डिहवार को प्रणाम करेंगे।
आपकी आँखें नम होंगी,
अगल-बगल के बूढ़े चाचा-दादी
कुछ पुरानी बातें याद दिलाएँगे
वो बचपन की शरारतें, वो त्योहारों की रौनक।
कुछ बच्चे आपको निहारते रहेंगे,
नए चेहरे, अनजान निगाहों से
वहाँ खड़े लोग आपका परिचय देंगे:
"ये फलाना चाचा हैं,
दिल्ली/पंजाब/गुजरात/बेंगलुरु रहते हैं
आज कई सालों बाद
अपने गाँव लौटे हैं।"
कुछ पल बिताने के बाद
आप फिर से चले जाएँगे
अपना घर, गाँव छोड़कर
कदाचित बिहार के हर घर की यही कहानी होगी।
मूलभूत सुविधाओं के अभाव में,
बेहतर भविष्य की तलाश में
आप एक बार बिहार छोड़ देंगे,
फिर आप बिहार नहीं लौट पाएँगे।
आप शायद लौट भी जाएँ,
लेकिन आपका बच्चा नहीं लौटेगा।