पहले के हास्य-व्यंग्यकार समाज की विद्रूपताओं पर, कुरीतिओं पर, भ्रष्टाचार, राजनीति पर कटाक्ष करते थे ताकि जनता हँसते हँसते संजीदा हो जाये, जागरूक हो जाये। आज तो पैमाना ही अलग है। पैमाना है अधिक से अधिक रीच बढ़ाना। ऐसे में कॉमेडियंस को सबसे आसान लगता है अश्लील हो जाना।
परसाई और श्रीलाल शुक्ल को पढ़कर भी हँसी आती है, टीस भी उठती है..हास्य का सार्थक रूप यही है.. जो हँसाने के साथ करुणा पैदा करे. साहित्य में उस स्तर का व्यंग्य रहा नहीं. स्टैंडअप कॉमेडी शोज देखकर लगता है कि अगर सेक्स शब्द हटा दिया जाए तो आधे कॉमेडीयन घर बैठ जाएँगे. आज जिस बात पर शर्म आनी चाहिए उस बात पर लोग हँस रहें हैं तो या तो भारत का औसत आईक्यू नीचे जा रहा है, या लोगों के पास हँसने के मौक़े नहीं बचे.