Novelist | Screenwriter | Lyricist | B.Mus. & MPA ( Music ) BHU | Yuva Sahitya Akademi Award winner for debut Hindi Novel चाँदपुर की चंदा |

Joined March 2012
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आज दिल्ली के होटल ली मेरेडियन में दैनिक जागरण द्वारा आयोजित कार्यक्रम में माननीय गृह मंत्री अमित शाह जी और प्रिय लेखक प्रसून जोशी जी द्वारा साहित्य का नवांकुर सम्मान दिया गया। ये सम्मान मेरा नहीं बल्कि चाँदपुर की चंदा के समस्त पाठकों का सम्मान है। आप सबकी शुभकामनाएं बनीं रहें 🙏
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बहुत धन्यवाद भैया.. चांदपुर की चंदा जब लिखकर समाप्त किया तो हनुमान जी से यही कहता था कि हे प्रभु, अगर पाँच सौ प्रतियाँ भी बिक गई तो इज्जत बच जाएगी..क्योंकि एक तो मैं हिंदी साहित्य जगत की मूलधारा का आदमी नहीं हूँ. पढ़ाई भी मैनें संगीत से की है.. दूसरे हमने फेसबुक और ब्लॉग से लेखन शुरू किया था. बनारस में मेरे मित्र मज़ाक़ उड़ाते थे कि उस फेसबुक राइटर के तुमसे ज़्यादा फालोवर्स हैं, उनकी किताब नहीं बिकी तो तुम्हारी किताब क्या बिकेगी…कोई पत्र पत्रिका आलोचक भी तुम्हारे बारे में नहीं लिखेगा..इसको सत्य मानकर मैनें भी कभी प्रयास नहीं किया कि कोई कुछ लिखे. न ही हिंदी के किसी आलोचक को किताब भेजी कि सर पढ़िएगा. इस उपन्यास को लोकप्रिय इसके आप जैसे पाठको ने बनाया..आज फुटपाथ,स्टेशन और मेट्रो के आगे दुनिया के तमाम दिग्गज लेखकों के साथ इसकी पायरेसी बिक रही है तो वो सब पाठकों की देन है. आज हर साल इसकी एक लाख रायल्टी बढ़ जाती है.. तब समझ आता है कि किताबें आज भी खूब बिकती हैं..बस दिल से निकली एक कहानी की जरूरत है. बाक़ी शुभकामनाएं बनीं रहे…दूसरी किताब भी जल्दी आप सबके हाथ में होगी ❤️🙏
जो कुछ किताबें पढ़ी हैं,उनमें पहली किताब है जिसमें किसी फिल्म को इतनी बारीकी से साधा गया कि पाठक को फिल्म का बोझ भी महसूस नही होता पाठक किताब से और अधिक भावनात्मक लगाव महसूस करने लगता है सिर्फ तुम का एक ही आयाम है जबकि उपन्यास गाँव के आम आदमी के जीवन का विस्तृत बहुआयामी चित्रण है
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स्मार्ट वाच की बिक्री में भयानक कमी आई है. वो पुरानी फीते और चेन वाली घड़ियाँ बिकने लगी हैं. वही हाल ईयर बड्स का भी है. एक बड़ी आबादी पुराने तार वाले ईयरफोन प्रयोग में ला रही है. इधर स्किनी फीट चपकउवा जींस का दौर चला गया..अब ढीले-ढाले कपड़े पहनना कूल माना जा रहा है.. कुल मिलाकर आदमी प्रयोग तो खूब करता है लेकिन एक दिन उस प्रयोग से ऊब जाता है, फिर उसे वही चीजें ठीक लगती हैं, जिसे पुराना समझके छोड़ आया था. 😌
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भाई- अभी-अभी हरिहरन जी ने मेरा लिखा गाया है.. 🙈यहाँ एक्स पर मैं अपने काम शेयर नहीं करता..क्योंकि ये मंच बौद्धिक बकलोलियों के लिए हैं.. आप एक बार मेरा स्पोटिफाई एकाउंट चेक करें मेरे लिखे सारे गाने मिल जाएँगे..इस एकाउंट से सारे गानों की क्रेडिट main आर्टिस्ट में एड नहीं है इसलिए एक प्लेलिस्ट होगी लिरिक्स by अतुल कुमार राय वहाँ ज़रूर मिल जाएगा..🙏
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पवन सिंह जी से मुलाकात कीजिए लेखनी दमदार है आवाज भी दमदार मिल जाई तो कई ठो रिकॉर्ड टूटी मर्दे
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बता द…😌❤️ #Bhojpuri ( पुरानी डायरी)
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खबर है कि जिस आदमी पर राम मंदिर के चढ़ावे की चोरी का आरोप है, उस आदमी ने कुछ दिन पहले भागवत कथा कहलवाई है. ये पढ़कर लगता है कि भारत के चोर अपना काम बड़े धार्मिक और सात्विक तरीके से करते हैं. भगवान के दरबार से उठाके भगवान के काम में लगा देते हैं..ऐसे सात्विक चोरों को तिजोरी में रखना चाहिए, ये देश की अमूल्य धरोहर बनने की क्षमता रखते हैं. 😌
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भारत में सबसे ज़्यादा लाइब्रेरी महाराष्ट्र में है..कोंकण के गाँवो में मैनें देखा कि गाँव के बाहर लोग बैठकर पढ़ रहे हैं. ये संस्कृति यूपी-बिहार में सबसे ज़्यादा तेज गति से ग़ायब हुई क्योंकि वहाँ लोगों को लगता है कि आदमी को सिर्फ़ नौकरी पाने के लिए ही पढ़ना चाहिए..इसलिए नौकरी पाने वाले लाइब्रेरी हर दूसरे चट्टी-चौराहे पर खुल रही हैं.वहीं राजकीय लाइब्रेरी पर ताले धूल फाँक रहे हैं..
Library India Needs😍: Library India Has😭:
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Atul Kumar Rai retweeted
पहले के हास्य-व्यंग्यकार समाज की विद्रूपताओं पर, कुरीतिओं पर, भ्रष्टाचार, राजनीति पर कटाक्ष करते थे ताकि जनता हँसते हँसते संजीदा हो जाये, जागरूक हो जाये। आज तो पैमाना ही अलग है। पैमाना है अधिक से अधिक रीच बढ़ाना। ऐसे में कॉमेडियंस को सबसे आसान लगता है अश्लील हो जाना।
परसाई और श्रीलाल शुक्ल को पढ़कर भी हँसी आती है, टीस भी उठती है..हास्य का सार्थक रूप यही है.. जो हँसाने के साथ करुणा पैदा करे. साहित्य में उस स्तर का व्यंग्य रहा नहीं. स्टैंडअप कॉमेडी शोज देखकर लगता है कि अगर सेक्स शब्द हटा दिया जाए तो आधे कॉमेडीयन घर बैठ जाएँगे. आज जिस बात पर शर्म आनी चाहिए उस बात पर लोग हँस रहें हैं तो या तो भारत का औसत आईक्यू नीचे जा रहा है, या लोगों के पास हँसने के मौक़े नहीं बचे.
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परसाई और श्रीलाल शुक्ल को पढ़कर भी हँसी आती है, टीस भी उठती है..हास्य का सार्थक रूप यही है.. जो हँसाने के साथ करुणा पैदा करे. साहित्य में उस स्तर का व्यंग्य रहा नहीं. स्टैंडअप कॉमेडी शोज देखकर लगता है कि अगर सेक्स शब्द हटा दिया जाए तो आधे कॉमेडीयन घर बैठ जाएँगे. आज जिस बात पर शर्म आनी चाहिए उस बात पर लोग हँस रहें हैं तो या तो भारत का औसत आईक्यू नीचे जा रहा है, या लोगों के पास हँसने के मौक़े नहीं बचे.
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लंकेश, मैं अंततः कहानीकार हूँ..हर चरित्र के गहरे में जाना पड़ता है तब कहीं जाकर आप कुछ ऐसा लिख पाते हैं कि आपकी किताब लोग ख़रीद सकें..उसे पढ़ते हुए रो सकें और हंस सकें..मेरे लिए हर प्रसिद्ध व्यक्ति एक केस स्टडी है..उसका स्याह और सफेद पक्ष जानना कर्तव्य है..इसलिए आज तक मैं किसी से नफ़रत नहीं कर पाता..जबकि कमियाँ हर आदमी में है..हर आदमी अच्छा है.
😭 अपने अतुल भाई भी नेहरूवादी निकले..
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भाषा का अनुवाद भाव का अनुवाद नहीं है…दोनों में बड़ा अंतर है.. इसलिए हिंदी की उत्कृष्ट रचनाएँ भी नोबेल पुरस्कार कमेटी के समझ में नहीं आ पाई क्योंकि उस स्तर के अनुवाद नहीं हुए..टैगोर ने गीतांजलि का स्वयं अंग्रेज़ी अनुवाद किया था.ज़्यादातर लेखक इतने सिद्ध नहीं हैं. अब एक ही एनिमल फ़ार्म के अलग-अलग अनुवाद हैं. कल दोस्तोवस्की के व्हाइट नाइट्स के कुछ किंडल वर्जन पढ़ रहा था, उसमें भी अंतर है. किसी में कहानी का फ्लो रुक जाता है किसी में बढ़ जाता है..सुधिजन साहित्य प्रेमी लोग बताएं कि विदेशी साहित्य का सबसे अच्छा अनुवाद किसने प्रकाशित किया है.. ? 🙏
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जब काशी हिंदू विश्वविद्यालय का निर्माण पूरा हुआ तब मालवीय जी कुछ योग्य लोगों के पास गए और उनको बीएचयू में पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया. जैसे संगीत पढ़ाने के लिए उन्होंने पंडित ओंकारनाथ ठाकुर का चयन किया..हिंदी के लिए बाबू श्यामसुंदर दास के पास गए..गणित और भौतिकी के लिए प्रोफ़ेसर वीवी नार्लीकर को पकड़ा..दर्शन के लिए सर्वपल्ली राधाकृष्णन बुलाए गए. यानी हर डिपार्टमेंट और विषय के लिए उस समय के दक्ष लोग बुलाए गए. संयोग से इन योग्य गुरुओं ने अपने ही जैसे योग्य शिष्य पैदा किए….ओंकारनाथ ठाकुर ने बलवंत राय भट्ट और प्रोफेसर प्रेमलता शर्मा जैसी विदुषी बनाया. श्याम सुंदर दास के बाद पंडित रामचन्द्र शुक्ल और आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने बीएचयू की बगिया में साहित्य का फूल खिलाया. विज्ञान से लेकर चिकित्सा और प्रद्यौगिकी तक ये परंपरा अनवरत चलती रही. महामना ने इन आचार्यों को पकड़ते वक्त ये ध्यान नहीं दिया कि इनके कितने छात्र सफल हैं, कितने अनुयायी दण्डवत रहते हैं. कितने छात्र गुरुजी जिंदाबाद करते हैं..गुरु जी की एक हुंकार पर कितने छात्र गालियाँ देने लगते हैं.. तब एक आदर्श शिक्षक के लिए ज्ञान -शील- धैर्य ही पैमाना था और आज भी वही होना चाहिए…एक शिक्षक में अगर ये तीनों नहीं है, तो वो कुछ भी हो सकता है, शिक्षक नहीं हो सकता. अफ़सोस आज के कुछ डिजिटल गुरु जी लोगों में इन तीनों का घोर अभाव है.. यूट्यूब या डिजिटल माध्यम से शिक्षा देना कोई बुरी बात नहीं है। पेपरलीक की समस्याओं, परीक्षा व्यवस्था की कमियों या छात्रों की परेशानियों पर बात करना भी गलत नहीं है। बल्कि ये तो कर्तब्य है. समस्या तब शुरू होती है जब ज्ञान की जगह अहंकार और संवाद की जगह इनकी रोड छाप भाषा ले लेती है। ये भाषा कंटेंट क्रिएटर की हो सकती है, शिक्षक की नहीं. इनके शिष्य भूल जाते हैं कि भारत में गुरु और शिक्षक केवल पेशा नहीं बल्कि परंपरा है. इसलिए इन डिजिटल गुरु जी लोगों को अपना शिक्षक कहने से पहले इनके ज्ञान के साथ-साथ शील और धैर्य को भी चेक करते रहिए. वरना ये तो आपको कोर्स बेचकर निकल जाएँगे, जीवन भर आपके बौद्धिक संस्कार खराब हो जाएँगे. 🙏 अतुल
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भाई साहब, @RamaKRoy इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए और डॉक्टर राही मासूम रजा पर पीएचडी हैं. पीएचडी के बाद बहुत दिनों तक केंद्रीय विद्यालय में हिंदी के अध्यापक थे, उसको छोड़कर यूपी पीजीटी क्वालीफाई किया और इंटर कॉलेज दुद्धी सोमभद्र में हिंदी पढ़ाया..उसके बाद यूपी असिस्टेट प्रोफेसर की परीक्षा में प्रदेश में पहला स्थान पाकर इन दिनों इटावा में पढ़ा रहे हैं. किसी के विचारों से असहमति हो सकती है..लेकिन किसी को जाने बिना बच्चे कह देना, हासिल करो कह देना अहंकार की श्रेणी में आता है और अहंकार मानसिक स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं माना जाता अभिनय सर 😌
Replying to @RamaKRoy
bachhe ho bhai abhi aap....thoda life mai kuch hasil kro tapkar aao ....tb likhne ki himmat kro ....
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लिखना वस्तुतः ध्यान में उतरना है। जब आप अपने विचार पन्ने पर उतारते हैं तो आप भीतर से खाली हो रहे होते हैं। एक रेचन प्रक्रिया चल रही होती है, जिससे रचनात्मक तोष उत्पन्न होता है। यह तोष ही लेखक की असली कमाई और अनुभूति है। #अतुल_कुमार_राय (संदर्भ: एआई लेखन)
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Atul Kumar Rai retweeted
इस विषय पर मेरा एक अलग मत है। लेखन कई तरह से हो सकता है, एक तो जो मौलिक हो। लेखक के हृदय से निकला कोई भाव या विचार, जिसको व्यक्त करने की कला लेखक के पास हो। वह अपने शब्दों में वह बात रखे। दूसरा वह, जब लेखक के पास विचार तो है, लेकिन शब्द नहीं हैं। ऐसे में वह शब्द उधार लेता है।
जागरण में आज..
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जागरण में आज..
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मैं भी दिख रहा हूँ 😍
Hazratganj metro station.
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सरकारी शिक्षक इस भीषड़ गर्मी जनगणना कर रहे हैं.प्राइवेट शिक्षक गोलियां चलवा रहे हैं.. कौन कितना अच्छा पढ़ाता है से ज्यादा बहस इस बात की हो रही है कि किसके ज्यादा सब्सक्राइबर हैं ? किसके वीडियोज पर ज्यादा व्यूज हैं. कुल मिलाकर शिक्षक और कंटेट क्रिएटर का भेद मिट गया है. सौम्य मधुर अध्ययनशील अध्यापकों के दिन लद चुके हैं..अब जो जितना चिल्ला रहा है..उतना ही बड़ा अध्यापक है.
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