की स्याही जो दिल पे छाई है, तेरी नजर की शुभाओ में खो भी सकती थी। मगर ये हो ना सका। मगर ये हो ना सका और अब ये आलम है, की तू नहीं तेरा गम तेरी जुस्तजू भी नहीं। गुजर रही है जिंदगी कुछ इस तरह जैसे, इसे किसी के सहारे की आरजू भी नहीं। मैं जानू ताकी रात ना मैंजिल ना रोशनी का सुराग, भटक