अशङ्क्यमपि शङ्केत नित्यं शङ्केत शङ्कितात्।
भयं हि शङ्किताज्जातं समूलमपि कृन्तति॥
जो संदेह करने योग्य हो, उस पर संदेह करके उससे चौकन्ना रहे। जिससे भय की आशंका हो, उससे सदा सब प्रकार से सावधान रहे। जिससे भय की आशंका नहीं है, उससे यदि भय होता है तो वह जड़-मूल सहित नष्ट कर देता है।