एक कारसेवक की बात सुनो; राम मंदिर के नाम पर क्या क्या हो रहा है; सब पता चल जाएगा!
प्रभु राम के चढ़ावे पर उठे गंभीर प्रश्न: आस्था के नाम पर जांच से परहेज़ क्यों?
अयोध्या का श्रीराम मंदिर केवल ईंट, पत्थर और शिल्प से निर्मित कोई धार्मिक परिसर नहीं है। वह करोड़ों भारतीयों की आस्था, त्याग, संघर्ष और विश्वास का प्रतीक है। देश और दुनिया के असंख्य श्रद्धालुओं ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार वहां धन, सोना, चांदी और बहुमूल्य वस्तुएं अर्पित की हैं। इसलिए मंदिर को प्राप्त होने वाला प्रत्येक रुपया मात्र नकदी नहीं, एक श्रद्धालु द्वारा सौंपा गया पवित्र न्यास है।
ऐसे स्थान के चढ़ावे में चोरी, गबन अथवा वित्तीय अनियमितता का आरोप भी साधारण घटना नहीं माना जा सकता।
राम मंदिर के पूर्व लेखा प्रभारी बताए जा रहे महिपाल सिंह ने अत्यंत गंभीर और विशिष्ट आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि दान की नकदी गिनते समय नोटों की वास्तविक गड्डियों और तैयार किए जाने वाले वाउचरों में अंतर रखा जाता था। उन्होंने दावा किया है कि एक अवसर पर लगभग पांच लाख रुपये की अतिरिक्त राशि पकड़ी गई थी। उनका आरोप यह भी है कि शिकायत करने के बाद कार्रवाई कथित अनियमितता करने वालों पर नहीं, उन्हीं पर हुई और उन्हें पद से हटा दिया गया।
महिपाल सिंह ने सात-आठ महीने के सीसीटीवी फुटेज मिटाए जाने तथा मंदिर में दान के रूप में आने वाले सोने, चांदी और अन्य बहुमूल्य धातुओं का समुचित लेखा उपलब्ध न होने जैसे आरोप भी लगाए हैं। ये आरोप अभी किसी सक्षम न्यायिक अथवा स्वतंत्र जांच एजेंसी द्वारा प्रमाणित नहीं हुए हैं, लेकिन इनकी प्रकृति इतनी गंभीर है कि इन्हें केवल राजनीतिक आरोप बताकर खारिज नहीं किया जा सकता।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने भी इस प्रकरण पर अत्यंत कठोर सवाल उठाए हैं। हम उनके वक्तव्य का वीडियो भी प्रस्तुत कर रहे हैं। दूसरा वीडियो राम मंदिर आंदोलन से जुड़े रहे एक सजग व्यक्ति का है, जो मंदिर की व्यवस्था और चढ़ावे को लेकर गंभीर आरोप लगा रहे हैं।
इन दोनों वीडियो में व्यक्त बातें संबंधित वक्ताओं के आरोप और विचार हैं; हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति को जांच और न्यायिक प्रक्रिया से पहले दोषी घोषित करना नहीं, सार्वजनिक महत्त्व के प्रश्नों को सामने रखना है।
समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी इस मामले में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। यदि यह सूचना सही है, तो इससे स्वयं इस विवाद की गंभीरता प्रमाणित होती है। दूसरी ओर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का कहना है कि समय-समय पर आंतरिक ऑडिट किया जाता है, जिसमें ट्रस्ट और भारतीय स्टेट बैंक के प्रतिनिधि सम्मिलित रहते हैं तथा अब तक कोई उल्लेखनीय अनियमितता सामने नहीं आई है।
लेकिन प्रश्न यह है कि आरोप जब ट्रस्ट की अपनी व्यवस्था और कर्मचारियों से जुड़े हों, तब क्या केवल आंतरिक ऑडिट पर्याप्त माना जा सकता है?
न्याय का सामान्य सिद्धांत है कि कोई व्यक्ति अपने ही मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता। अतः आवश्यक है कि संपूर्ण प्रकरण की जांच किसी ऐसी स्वतंत्र एजेंसी और फॉरेंसिक ऑडिट टीम से कराई जाए, जिसका ट्रस्ट के दैनिक प्रशासन से कोई संबंध न हो।
जांच में कम-से-कम निम्न अभिलेखों को तत्काल सुरक्षित किया जाना चाहिए—दानपात्रों की दैनिक गणना का रिकॉर्ड, मूल वाउचर, बैंक जमा पर्चियां, नकदी परिवहन रजिस्टर, स्ट्रांग रूम और काउंटिंग रूम के प्रवेश अभिलेख, सीसीटीवी बैकअप, कर्मचारियों की ड्यूटी सूची तथा सोने-चांदी और आभूषणों की संपूर्ण सूची।
यदि किसी कर्मचारी, बैंक अधिकारी, एजेंट अथवा पदाधिकारी को सौंपी गई दानराशि का बेईमानी से निजी उपयोग या बंदरबांट जांच में सिद्ध होती है, तो यह केवल “चोरी” नहीं, आपराधिक न्यासभंग और बेईमानी से संपत्ति के दुरुपयोग का गंभीर मामला हो सकता है। यदि किसी अपराध को छिपाने के उद्देश्य से सीसीटीवी या अन्य प्रमाण मिटाए गए हों, तो प्रमाण नष्ट करने से संबंधित आपराधिक प्रावधानों की भी जांच होनी चाहिए।
राम के नाम पर प्राप्त धन का हिसाब मांगना राम का विरोध नहीं है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम से जुड़ी प्रत्येक संस्था से मर्यादा, शुचिता और पारदर्शिता की मांग करना ही सच्ची रामभक्ति है।
जब आरोप इतने गंभीर हों, आरोप लगाने वाले सामने आकर बयान दे रहे हों और मामला प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचने की खबर हो, तब मौन किसी संस्था की प्रतिष्ठा की रक्षा नहीं करता—वह संदेह को और गहरा करता है।
न किसी निर्दोष को आरोपों के आधार पर अपराधी घोषित किया जाना चाहिए, न आस्था की आड़ में संभावित अपराध को जांच से संरक्षण मिलना चाहिए।
निष्पक्ष जांच हो, अभिलेख सुरक्षित किए जाएं, सभी पक्षों को सुना जाए और जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। क्योंकि यह केवल करोड़ों रुपये का प्रश्न नहीं—करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का प्रश्न है।