पत्रकार और लेखक।राजनीति पर ख़बरें सुनता और सुनाता हूँ।एक्स - इंडिया टुडे, राजस्थान पत्रिका. राजनीति पर सात किताबें प्रकाशित.

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सौरव शर्मा के साथ देश की राजनीति पर Bharat Ki Khabar | Saurav Sharma: Abhishek के खिलाफ कल्याण बनर्जी का मोर... youtu.be/8ZzIzMXfM1A?si=2tlr… via @YouTube
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मामला दिल्ली के बॉर्डर से जुड़ी एक बेशकीमती जमीन का है।जमीन में थोड़ा विवाद है।ऐसी ही विवादास्पद जमीन को कोडियों में लेकर करोड़ों में बेचने की विशेषयोग्यता बीजेपी दिल्ली सरकार के एक मंत्री रखते हैं। मंत्री बड़े पारखी हैं।मंत्री जी की नजर जमीन पर पड़ी। मंत्रीजी जमीन को दिल दे बैठे।मंत्री जी अकेले नहीं थे , जिनका दिल इस जमीन पर आया।दिल्ली के एक और नेता इस जमीन को दिल दे बैठे। दोनों नेता जमीन को लेकर आमने सामने आ गए।मामला इन दोनों नेताओं से बड़े एक नेता के पास पहुंचा।बड़े नेता बहुत बड़े वाले हैं।बड़े नेता ने दोनों नेताओं को बुलाया।बड़े नेता ने समझाया कि “काम बहुत है और समय कम है, मिलकर काम करो।सबका साथ,सबका विकास के मंत्र पर चलना है। जमीन को लेकर उलझे दोनों नेताओं ने सहमति से सिर हिलाया।मामले का निपटारा हुआ। अब जमीन का बँटवारा तीनों नेताओं के बीच बराबर होगा।
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ममता बनर्जी के एक ओर भरोसेमंद सहयोगी सांसद सुदीप बंदोपाध्याय के बग़ावत का समाचार आ रहा है। ख़बर है कि सुदीप बंदोपाध्याय के साथ उनकी टीएमसी विधायक पत्नी भी बागी गुट में शामिल होगी।मतलब सुदीप बंदोपाध्याय ने एक के साथ एक फ्री का ऑफ़र दिया है।सांसद के साथ विधायक फ्री। सोमवार को टीएमसी के बागी सांसद लोकसभा स्पीकर से मुलाक़ात करेंगे। सोमवार तक ममता से बग़ावत करने वाले सांसदों का आंकड़ा 23 तक पहुंच सकता है। भयानक बग़ावत ममता की पार्टी में हुई है, सूखकर काँटा अखिलेश यादव हो रहे हैं। बंगाल में टूट चुनाव के बाद हुई है,उत्तर प्रदेश में टूट चुनाव से पहले होती नजर आ रही है।
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राजीव गांधी के प्रधानमंत्री के कार्यकाल के बाद भारत पर किसने राज किया यह इस एक बात से तय होता रहा कि धर्म को जिसने एकजुट किया उसे बांटने में जाति का इस्तेमाल करने में कौन कितना सफल रहा। या जाति ने जिसे बांट दिया था उसे धर्म का इस्तेमाल करके एकजुट करने में दूसरा पक्ष कितना सफल रहा। 1989 में केन्द्र में कांग्रेस के पराजय के बाद शुरूआत के 25 सालों तक जाति की ताकतों की जीत होती रही।उसके बाद मोदी का युग आया। उन 25 वर्षो में ही तथा​कथित सेक्युलर राजनीति दिग्भ्रमित हो गई और उसने अपना व्यापक वैचारिक खूंटा गंवा दिया।बीजेपी का मुकाबला करने में वह किसी व्यापक सिद्धांत पर टिके रहने की जगह मुस्लिम वोट जीतने के उपयोगितावादी उपक्रम मे जुटे पक्ष की तरह नजर आने लगी। इसतरह 'सेक्युलर वोट' मुस्लिम वोट का पर्याय बन गया।इसके कारण स्थानीय स्तरों पर मुस्लिम मतदाताओं के लिए मारकाट शुरू हुई। कांग्रेस से क्षेत्रीय दल मुस्लिम वोट लुटते रहे।इस बीच भाजपा ने खुद को तेजतर्राट,सुपरिभाषित और बेबाक हिंदू राष्ट्रवादी दल के रूप में निखारती रही। राष्ट्रीय राजनीति की आज जो दशा है उसकी यही व्याख्या हैं। मोदी के 14 साल के शासन में बीजेपी हर तरीके से बेहद मजबूत हो चुकी है। मोदी के सामने कांग्रेस अगर अपनी ताकत बढ़ा ले।एक आधुनिक विचारधारा विकसति कर सके और क्षेत्रीय दलों से अपना वोट बैंक वापस ले सके तो फिर देश दो दलीय राजनीति की ओर मुड़ सकता हैं। क्षेत्रीय दल आज जितने कमजोर हैं, उतने पिछले 36 साल में कभी नहीं रहे।कांग्रेस के लिए क्षेत्रीय दलों के आपदा में अवसर है।कांग्रेस इस अवसर का कितना लाभ उठाएगी यह देखना बाकी है।
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As @AITCofficial crumbles @nistula speak to @SankhadipTweets on the Implications for West Bengal and national politics, the speed of the implosion, reasons thereof and is the beginning of the end for a multiplicity of regional parties- .youtu.be/Kokrk0cBjs4?si… via @YouTube
As @AITCofficial crumbles I speak to @SankhadipTweets on the Implications for West Bengal and national politics, the speed of the implosion, reasons thereof and is the beginning of the end for a multiplicity of regional parties- .youtu.be/Kokrk0cBjs4?si=6PDk… via @YouTube
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अयोध्या का राम मंदिर देश भर के तीर्थयात्रियों को अपनी ओर खींचने वाला विशाल चुंबक हैं क्योकि यह भारत ही नहीं दुनिया भर में फैले हिंदुओं की आस्था और धर्म का सबसे बड़ा प्रतीक है। राम मंदिर इस समय गहन राजनैतिक भावनाओं के बीच एक तरह से बिजली का जलता तार बन गया हैं।जिसे कोई छूना नहीं चाहता हैं।सबसे चुनी हुई चुप्पी चुन ली हैं।धर्म के सबसे बड़े प्रतीक से आ रही अधर्म की खबरों पर गजब की खामोशी अख्तियार कर ली है।मामला जो धर्म का ठहरा,और भारत जैसे अत्यंत धार्मिक देश में धर्म से जुड़ी कोई भी चीज अत्यंत ज्वलनशील पदार्थ होती हैं,और जब राजनीति में धर्म का नशा मिला हो या कहे राजनीति का आधार ही धर्म हो तो इस मामले पर “निल बटे सन्नाटा” होना अचंभित करता हैं। अयोध्या राम मंदिर में आए चढ़ावे में 7 करोड़ रूपये के हेराफेरी के आरोपों ने मन विचलित कर दिया हैं। इस पूरे मामलें पर मंदिर के कर्ताधर्ताओं की सामूहिक चुप्पी ने मामलों को संदेह के घेरे में ला दिया है।आरोप सामान्य नहीं है,इसलिए सामान्य प्रतिक्रिया देकर इससे छुटकारा नहीं पाया जा सकता, इसके लिए असामान्य फैसले लेने होंगे। राम मंदिर के पूर्व लेखा प्रभारी बताने वाले महिपाल सिंह का कहना कि मंदिर में रोज चोरी होती है,इसमें नया क्या हैं।राम मंदिर से आंदोलन से जुड़े भाजपा नेता विनय ​कटियार का उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग करना,हनुमत ​किला पीठाधीश्वर महंत परशुराम दास महाराज का कहना कि धुंआ उठा हैं,तो आग जरूर लगी होगी।महंत कमल नयन दास का कहना कि जांच कौन करेंगा,जांच करने वाले खुद बेईमान हैं।भाजपा नेता बृजभूषण शरण सिंह का कहना कि अगर मैं सच बोल दूंगा तो परेशानी में पड़ जाऊँगा,क्योकि वे बहुत बड़े लोग हैं।भाजपा नेता डॉ रजनीश सिंह का पीएम को पत्र लिखकर सीबीआई जांच की मांग करना। इन बयानों ने मामलें को बेहद गंभीर बना दिया हैं। मंदिर ट्रस्ट के महामंत्री चंपत राय को बताना चाहिए कि क्या कोई पैसे ले​​कर चंपत हो गया है? भगवान राम मर्यादा और नैतिकता के शिखर पुरूष थे।श्रीमद् भागवत में धर्म के चार मूल्य बताए गए है। सत्य,करूणा,शुचिता और तपस। राम रामराज्य के जनक थे।राम की रखवाली का ठेका जिनके जिम्में है,उन्हें हर तरह से पवित्र और हर विवाद से परे होना जरूरी हैं। राम मंदिर से पैसे के गबन की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी बनाकर अभी तक राम मंदिर को मिले चढ़ावे के एक एक रूपये का हिसाब सार्वजनिक किया जाना चाहिए। हिंदू धर्म के आस्थावान करोड़ों लोगों ने अपनी मेहनत की कमाई से राम मंदिर निर्माण के लिए चंदा दिया था।हर महीने करोड़ों रूपये का चढ़ावा आता हैं।पूरी पारदर्शिता और गहन जाँच आवश्यक हैं।हर बात को रामभक्तों के सामने खुलासा होना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी से उम्मीद है कि वह इस मामले में खुद दखल देंगे और सच को सामने लाएंगे।
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ममता बनर्जी की पार्टी से पलायन जारी है।ममता बनर्जी के 13 राज्यसभा सांसद हैं। 8 जून को सुखेंदु शेखर रे ने राज्यसभा सदस्यता और पार्टी छोड़ी थी।10 जून को सुष्मिता देव ने राज्य सभा से इस्तीफ़ा दिया और पार्टी छोड़ी।आज ममता के राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बड़ाईक ने इस्तीफा दे दिया। ममता बनर्जी को दर्द भी किस्तों पर दिया जा रहा है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल एनडीए की बैठक में अपनी सफलता में एनडीए को भी शामिल किया और कहा उनके इस रिकॉर्ड का श्रेय एनडीए को जाता है। मोदी के मंत्रिमंडल में एनडीए की हिस्सेदारी बताती है कि मोदी और शाह ने एनडीए में सबको उनकी ताक़त और संख्या के हिसाब से बराबर भागीदार बनाया है। एनडीए में भाजपा के अलावा 24 पार्टिया है।इनमें 15 को कोई मंत्री पद नहीं मिला।10 पार्टिया एक भी सीट नहीं जीत सकी।बाकी में भाजपा ने अपने सांसदों की हिस्सेदारी के मुकाबले ज्यादा मंत्री पद हासिल किए। भाजपा के 240 सांसद है,और एनडीए सांसदों में भाजपा की हिस्सेदारी 82 प्रतिशत है।मोदी कैबिनेट में भाजपा की हिस्सेदारी 85 प्रतिशत है। टीडीपी के कुल 16 सांसद है,और एनडीए सांसदों में टीडीपी की हिस्सेदारी 5 प्रतिशत है, मोदी कैबिनेट में टीडीपी की हिस्सेदारी 2 मंत्रियों के साथ कुल मंत्रियों में 3 प्रतिशत है। नीतीश कुमार के जदयू से कुल सांसद 12 है, एनडीए के कुल सांसदों में जदयू की हिस्सेदारी 4 प्रतिशत है,मोदी कैबिनेट में 2 मंत्रियों के साथ जदयू की मोदी कैबिनेट में हिस्सेदारी 3 प्रतिशत है। एकनाथ शिंदे की शिवसेना के कुल 7 सांसद है। शिवसेना सांसदों की एनडीए सांसदों में हिस्सेदारी 2 प्रतिशत है।मोदी कैबिनेट में 1 मंत्री के साथ शिवसेना की मोदी कैबिनेट में हिस्सेदारी 1 प्रतिशत है। चिराग पासवान की पार्टी लोजपा (आर) के 5 सांसद है,और एनडीए में चिराग की पार्टी की हिस्सेदारी 1.7 प्रतिशत है।मोदी कैबिनेट में एक मंत्री के साथ चिराग पासवान की पार्टी की मोदी कैबिनेट में हिस्सेदारी 1 प्रतिशत है। देवगौड़ा की जद (एस) के 2 सांसद है और एनडीए के कुल सांसदों में जद एस की हिस्सेदारी 0.7 फीसद है। मोदी कैबिनेट में 1 मंत्री पद के साथ जद (एस) की मोदी कैबिनेट मे हिस्सेदारी 1 प्रतिशत है। अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल (एस) का 1 सांसद है और एनडीए के कुल सांसदों में अपना दल (एस) की हिस्सेदारी 0.3 फीसद है।मोदी कैबिनेट में 1 मंत्री पद के साथ अपना दल एस की हिस्सेदारी 1 प्रतिशत है। राष्ट्रीय लोकदल के 2 सांसद है,और रालोद के सांसदों की एनडीए के कुल सांसदों में हिस्सेदारी 0.7 फीसद है। मोदी कैबिनेट में 1 मंत्री पद के साथ मोदी कैबिनेट में रालोद की हिस्सेदारी 1 प्रतिशत है। जीतन राम मांझी की पार्टी हम एस का 1 सासंद है,और एनडीए के कुल सांसदों में हम पार्टी की हिस्सेदारी 0.3 फीसद है।मोदी कैबिनेट में हम पार्टी से एक मंत्री के साथ मोदी कैबिनेट में हम की हिस्सेदारी 1 प्रतिशत है। रामदास आठवले की आरपीआइ (ए) का एक राज्यसभा सांसद है,और एनडीए के कुल सांसदों में आरपीआइ की हिस्सेदारी 0.3 फीसद है। मोदी कैबिनेट में आरपीआई का एक मंत्री के साथ मोदी कैबिनेट में हिस्सेदारी 1 फीसद है। सबका साथ सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास एनडीए में झलकता है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि “12 साल में देश कांग्रेस के कूचक्र से आजाद हुआ।कांग्रेस ने देश को लाचार बना दिया था।देश को एहसास कराया था कि विकास धीरे-धीरे होता है और इसे हिंदू ग्रोथ रेट का नाम दिया था।विफलता कांग्रेस की थी लेकिन कलंक हिंदू आबादी पर लगाया गया। मोदी का कांग्रेस पर “हिंदू ग्रोथ रेट” और “विफलता कांग्रेस की थी लेकिन कलंक हिंदू आबादी पर” का बयान भविष्य में बीजेपी की रणनीति और राजनीति का खुला संदेश है। तय है हिंदू, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर बीजेपी अब खुल कर खेलेगी।हिंदू और हिंदुत्व बीजेपी के केंद्र में रहने वाला है। विपक्ष को प्रधानमंत्री को गंभीरता से लेना चाहिए। विपक्ष की भविष्य में चुनौतियाँ बढ़ने वाली हैं।
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कांग्रेस कितनी भी कोशिश कर ले।ममता बनर्जी अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस के साथ नहीं करेगी।ममता कांग्रेस से मिले प्रस्ताव पर विचार भी कर रही होगी तो अरविंद केजरीवाल,अखिलेश यादव जैसे कांग्रेस के शुभ चिंतक ममता बनर्जी को ऐसा करने से रोकने में अपनी पूरी ताकत झोंक देंगे। जब शरद पवार अपना सबकुछ लुटाकर और राजनीतिक रूप से बर्बाद होने के बाद भी अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस के साथ नहीं किया,जबकि महाराष्ट्र में कांग्रेस एक बड़ी ताकत है। बंगाल में कांग्रेस के पास ममता बनर्जी को देने के लिए कुछ भी नहीं है। ममता बनर्जी 2029 लोकसभा चुनाव तक इंतिज़ार करेंगी और उसके बाद ही अपना और पार्टी का भविष्य तय करेगी।
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#TeenKaTarkash | 'आज का दिन किसी को छोटा या बड़ा बताने का नहीं है'- समीर चौगांवकर, वरिष्ठ पत्रकार #BJP #PMModi #Congress #Politics @MinakshiKandwal @semeerc
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26 मई 2014 को पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले नरेंन्द्र दामोदरदास मोदी ने 10 जून को कार्यकाल के 4399 दिन पूरे करते हुए देश के सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने का रिकार्ड बना लिया हैं।इसके साथ ही मोदी सीएम और पीएम के रूप में लगातार 9013 दिन सत्ता के शिखर पर रहने वाले देश के एकमात्र नेता बन गए हैं।मोदी 7 अक्टूबर 2001 को पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे। मोदी ने अपनी राजनीतिक से देश की राजनीति में राष्ट्रवाद और धर्म को केन्द्र में ला दिया है।वह मोदी ही हैं,जिनके कारण राष्ट्रवाद और धर्म का विचार अब राजनीति में बेहद मुखर और प्रमुख हो चला है। मोदी की राजनीति को लंबे समय देखने के बाद भी विपक्ष मोदी के राजनीतिक तौर तरीकों से सीख नहीं पाया।विपक्ष ने मुद्दे आधारित विरोध करने के बजाय मोदी पर निजी और व्यक्तिगत हमले करने की रणनीति अपनाई। विपक्षी राजनीतिक दलों को अब तक यह समझ में नहीं आया कि प्रधानमंत्री मोदी पर सीधा हमला करके उसे कुछ हासिल नहीं होगा।विपक्ष के नेताओं को मोदी से सीधे टकराने से बचना चाहिए।केंद्र में लगातार तीन बार बीजेपी की सरकार और 8 राज्यों से बढ़ाकर 22 राज्यों में भाजपा और एनडीए की सरकार बनवाने वाला चेहरा मोदी ही है।पूरे देश में भाजपा की पकड़ एक व्यक्ति की बदौलत ही हैं तो उससे सीधी टक्कर लेना मूर्खता हैं।इसे थोड़ी सभ्य भाषा में कहूं तो यह राजनीतिक समझदारी नहीं हैं। अच्छे राजनीतिक नेता चांदमारी करने वाले पायलट नहीं होते।तब तो बिल्कुल नहीं जब उनका विरोधी नेता लो​कप्रियता के शिखर पर हो।ऐसे नेता के खिलाफ आप छापामार लड़ाई ही लड सकते हैं।विपक्ष पस्त हैं,लेकिन फिर भी नासमझ बन कर राजनीति कर रहा हैं। 4399 दिन से लगातार सत्ता के शीर्ष पर और लोकप्रियता में भी शीर्ष पर विराजमान नेता से विपक्ष सिर्फ आरोपों,आलोचना और व्यक्तिगत हमलों से नहीं लड़ सकता।मोदी से लड़ने के लिए आपके हथियार भी आला दर्जे के होने चाहिए।तमंचे से आप तोप से नहीं लड़ सकते। मोदी से लड़ने के लिए आपकों मोदी से बड़ा या मोदी जैसा बनना होगा।शेर के सामने सवा शेर बनने के लिए विपक्ष को वही राजनीतिक चतुराई, कौशल और तमाम दावपेंच सीखने और उनकी काट ढूंढनी होगी,जिसकी बदौलत मोदी आज यहाँ पहुचे हैं।मोदी बने बिना मोदी को चुनौती देना संभव नहीं है।
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#KahaniKursiKi | चिट्ठी अगर तैयार है तो बागी सांसद सार्वजनिक क्यों नहीं कर रहे सांसदों की सूची? जानिए सीनियर जर्नलिस्ट, समीर चौगांवकर @semeerc से #TMC #MamataBanerjee #KakoliGhosh #KalyanBanerjee #KirtiAzad #WestBengal | @journosaurav
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भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन सोशल मीडिया एक्स पर 213 लोगों को फॉलों करते है। मजेदार बात यह है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेजिदंर बग्गा को तो फॉलों करते है,लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को एक्स पर फॉलों नहीं करते है। मुख्यमंत्रियों की बात करे तो बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष छत्तीसगढ़,दिल्ली,मध्यप्रदेश,राजस्थान,गोवा,उत्तराखंड,असम और बंगाल के मुख्यमंत्रीयों को तो फॉलों करते है लेकिन यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और महाराष्ट्र के सीएम देवेन्द्र फड़नवीस को फॉलों नहीं करते हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीजेपी के नेशनल एक्स अकाउंट को फॉलों नहीं करते। भाजपा अध्यक्ष संघ प्रमुख मोहन भागवत को तो फॉलो करते है,लेकिन संघ के एक्स अकाउंट से दूरी बनाकर रखी हैं। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को फॉलो ना करना समझ से परे है। अगर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ही पीएम मोदी और शाह को एक्स पर फॉलो नहीं करेंगे तो पार्टी के कार्यकर्ताओं में अच्छा संदेश नहीं जाएगा।
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आज प्रधानमंत्री मोदी के तीसरे कार्यकाल के दो साल पूरे हो रहे हैं।मोदी ने 9 जून 2024 को लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। आज ही के दिन मोदी के अलावा 30 नेताओं ने कैबिनेट मंत्री की, 5 नेताओं ने राज्य मंत्री(स्वतंत्र प्रभार) और 36 नेताओं ने राज्य मंत्री की शपथ ली थी। मोदी कैबिनेट में सामाजिक समीकरण को देखें तो मोदी के तीसरी कार्यकाल में ओबीसी को सबसे अधिक प्रतिनिधित्व दिया गया है।ओबीसी 27 मंत्री है (38 प्रतिशत),एससी 10 (14 प्रतिशत), एसटी 5 (7 प्रतिशत),अल्पसंख्यक 5 (7 प्रतिशत) है। यदि पिछले दो कार्यकालों पर नजर डालें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में सरकार गठन के छह महीने बाद नवंबर 2014 में पहली बार मंत्रिमंडल का विस्तार किया था।इसके करीब डेढ़ साल बाद जुलाई 2016 में दूसरा विस्तार हुआ और सितंबर 2017 में पहले कार्यकाल का अंतिम विस्तार किया गया। दूसरे कार्यकाल में पीएम मोदी ने जुलाई 2021 में यानी सरकार बनने के करीब दो साल बाद पहली बार मंत्रिमंडल का विस्तार किया था, जबकि मई 2023 में विभागों का फेरबदल हुआ था। पीएम मोदी ने 9 जून 2024 को तीसरी बार शपथ ली थी, जिसे आज दो साल पूरे हो रहे हैं। ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।फिलहाल मंत्रिमंडल में 72 सदस्य हैं,जबकि अधिकतम 81 मंत्री बनाए जा सकते हैं। मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल तय है।इसी माह होता है या जुलाई में बस यह देखना बाकी है।
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नीतीश कुमार की अगुवाई में मोदी विरोधी 27 पार्टियों ने 23 जून 2023 को पटना में पहली बैठक कर अपने गठबंधन का नाम “इंडियन नेशनलिस्ट डेवलपमेंट इनक्लूसिव एलांयस” रखा था,जिसे सक्षिप्त नाम से 'इंडिया' गठबंधन कहा गया। जब यह गठबंधन बना तब इस गठबंधन की दस राज्यों में सरकारें थी।कांग्रेस के चार राज्यों के साथ,बिहार में नीतीश कुमार,दिल्ली में केजरीवाल,झारखंड में हेमंत सोरेन,पश्चिम बंगाल में ममता बेनर्जी,तमिलनाडु में एम के स्टॉलिन और केरल में पिनाराई विजयन। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश ने इंडिया गठबंधन को छोड़ा और लोकसभा चुनाव के बाद दिल्ली में केजरीवाल,बिहार में तेजस्वी,महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और शरद पवार,पश्चिम बंगाल में ममता और तमिलनाडु में स्टॉलिन विधानसभा चुनाव हार गए।अब कांग्रेस की चार राज्यों में सरकार के साथ सिर्फ हेमंत सोरेन की झारखंड में सरकार हैं। आम आदमी पार्टी,डीएमके गठबंधन से बाहर है। झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन नाराज है।कभी भी गठबंधन से बाहर हो सकते हैं।सीपीएम भी राहुल गांधी से नाराज है और केरल मे सत्ता से बाहर होने के बाद उसका गठबंधन से बाहर होना भी लगभग तय हैं। हारी हुई ममता और तेजस्वी के बाद ममता का हाल देखकर सुख कर कांटा हुए अखिलेश यादव ही इस गठबंधन में बचे हैं। विपक्ष के इस गठबंधन पर यह मुहावरा सटीक बैठता है। 'कही की ईट,कही का रोड़ा,भानुमति ने कुनबा जोड़ा'
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मध्यप्रदेश का राज्यसभा चुनाव दिलचस्प हो गया है।भाजपा ने मध्यप्रदेश से तरूण चुघ और रजनीश अग्रवाल की जीत सुनिश्चित करने के बाद कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के सामने तीसरे उम्मीदवार के रूप में मछुआ कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष महेश केवट को उम्मीदवार बनाया है। मध्यप्रदेश में इस समय प्रभावी विधायक 228 है।एक सीट के लिए 58 विधायक चाहिए।बीजेपी के पास 164 विधायक है। इसका मतलब यह हुआ कि अपने दोनों प्रत्याशी जीताने के बाद बीजेपी के पास अतिरिक्त 48 वोट बचेंगे।ऐसे में बीजेपी को अपने तीसरे उम्मीदवार की जीत के लिए 10 अतिरिक्त वोट की अवश्यकता होगी। वही कांग्रेस के पास प्रभावी वोट 63 है।कांग्रेस के पास 58 वोटों की जरूरत से 5 ज्यादा वोट है।भाजपा को बीना से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे और बीएसपी के एक विधायक का वोट मिलना तय है।दो विधायकों की जुगाड़ के बाद बीजेपी को कांग्रेस के कम से कम 8 विधायकों को तोड़ना होगा।कांग्रेस अपने विधायकों को हार्स ट्रेडिंग से बचाने के लिए तेलंगाना या कर्नाटक भेज सकती हैं। कांग्रेस में आठ विधायकों की टूट आसान नहीं है,लेकिन कांग्रेस का इतिहास को देखते हुए यह असंभव भी नहीं हैं। झारखंड के बाद अब मध्यप्रदेश में कांग्रेस की राज्यसभा सीट संकट में दिख रही हैं।
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राज्यसभा के लिए सबसे रोचक चुनाव झारखंड में देखने को मिल रहा हैं। झारखंड से राज्यसभा की दो सीटों के लिए चुनाव हैं।कांग्रेस से प्रणव झा और झारखंड मुक्ति मोर्चा से बैजनाथ राम मैदान में है।भाजपा के गौरव वल्लभ ने भी चुनाव लड़ने के लिए पर्चा खरीद लिया है।सोमवार को नामांकन का अंतिम दिन है।हालांकि भाजपा ने गौरव वल्लभ को अभी अधिकारिक उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। ​ राज्यसभा की लड़ाई को मुकेश अंबानी के करीबी परिमल नाथवानी और वाईएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी के करीबी साई विजय रेड्डी की निर्दलीय लड़ने की घोषणा ने रोचक बना दिया है। महागठबंधन के पास कुल 56 विधायक है और महागठबंधन के दोनो उम्मीदवारों की जीत के लिए 56 ही विधायक चाहिए।एक भी विधायक के इधर से उधर होने पर कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा की हार तय है। राज्यसभा उम्मीदवार को प्रस्तावक के लिंए दस विधायक ​के हस्ताक्षर होने चाहिए।निर्दलीय परिमल नथवानी और साई विजय रेड्डी को दस दस विधायक प्रस्तावक तभी मिल सकते है,जब किसी पार्टी ने पर्दे के पीछे से सहमति दी हो या दूसरी संभावना यह है कि किसी राजनीतिक दल में बड़ी टूट होने वाली हो। बीजेपी गौरव वल्लभ को मैदान में उतारेगी या किसी निर्दलीय का समर्थन कर कांग्रेस की हार सुनिश्चित करेंगी यह कल सोमवार को तय होगा। फिलहाल कांग्रेस झारखंड में बेहद मुश्किल लड़ाई में उलझ गई है।
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मोदी की भाजपा ने 2014 के बाद अपनी राजनीति जिस मूल अवधारणा पर आधारित की थी,वह हैं हिंदू धर्म और राष्ट्रवाद। धर्म और राष्ट्रवाद का मेल अधिकतर लोकतांत्रिक देशों के लिए मारक साबित होता है,बशर्ते प्रतिद्धंद्धी दल इस पर ज्यादा प्रभावी दावा न कर सके।कांग्रेस ने तो इस मामले में जैसे भाजपा को खुला मैदान दे दिया हैं। राहुल गांधी ने कई मौकों पर भाजपा के हिंदू धार्मिक भावनाओं पर एकाधिकार को हास्यास्पद तरीके से चुनौती देने की कोशिश की है। राहुल मंदिर मंदिर घुमें,धार्मिक अनुष्ठान किए,कांग्रेस ने राहुल के जनेऊ और ब्राम्हण गोत्र के हवाले दिए।लेकिन यह सब उपरी दिखावे के रूप में दिखा,जैसे राहुल कह रहे हो,देखो मैं भी हिंदू हूं।लेकिन इससे मोदी के लिए हिंदुओं का आकर्षक कम होने के बजाय बढ़ा ही हैं। मोदी ने भाजपा को हिंदुत्व का सबसे बड़ा ब्रांड एंबेसडर बना दिया है।कांग्रेस के साथ ही पूरे विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती हिंदुत्व और राष्ट्रवाद पर मोदी और बीजेपी के एकाधिकार को तोडने की है। बिहार में तेजस्वी की बुरी हार,बंगाल में ममता के सूपड़ा साफ होने के बाद अब अखिलेश यादव उत्तरप्रदेश में हिंदू को साधने की कोशिश कर रहे हैं। अखिलेश यादव का मंदिर बनाना,भंडारा लगाना और डिंपल यादव का शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के सामने नतमस्तक होना यही बता रहा है। धर्म,हिंदुत्व और राष्ट्रवाद राजनीति के केंद्र में है।कांग्रेस के साथ पूरा विपक्ष यही आकर औंधे मुंह गिरता है।अखिलेश यही आकर फिसलने से बचना चाहते हैं।
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